जंगल जासूस 👉
हजूर 👉कुर्सियों पर अंगद का पांव 👉देहरादून से अल्मोड़ा तक सरकारी हुक्म ठेंगे पर!
हजूर 👉 उत्तराखंड के वन महकमे की आबो-हवा में इन दिनों प्रशासनिक खींचतान और अंदरूनी खलबली का तीखा शोर सुनाई दे रहा है। जून 2026 में रेंजर, डिप्टी रेंजर, वन दरोगा, वन आरक्षी और दफ्तरी कर्मचारियों के जो भारी-भरकम तबादला आदेश जारी हुए थे, वे ढाई से तीन महीने का समय बीत जाने के बाद भी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाए हैं। देहरादून के प्रांतीय मुख्यालय से लेकर प्रादेशिक दफ्तरों तक, सरकारी कागजों में भले ही अफसरों और कर्मचारियों के ठिकाने बदल चुके हों, लेकिन जमीन पर हर कोई अपनी पुरानी गद्दी पर अंगद के पांव की तरह जमा बैठा है। स्थानांतरण अधिनियम 2017 के तहत वार्षिक स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी कर आदेश जारी होने के बावजूद पुरानी कुर्सियों से चिपके रहने का यह जिद्दी खेल साफ चुगली करता है कि दफ्तरों में हुक्म का राज कम और पसंदीदा मसनद का मोह ज्यादा भारी पड़ रहा है।
हजूर 👉 देहरादून मुख्यालय से जारी इन हुक्मनामों की अनसुनी और विभागीय कार्यप्रणाली पर अब गंभीर तथा तीखे सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर लंबे समय से एक ही स्थान पर तैनात रहने का क्या कारण है? क्या उस स्थान पर तैनाती किसी तरह के विशेष आर्थिक अथवा अन्य लाभ से जुड़ी हुई है, जिसके चक्कर में नए तैनाती स्थल की राह भुला दी गई है? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर किसके संरक्षण में अधिकारी-कर्मचारी स्थानांतरण आदेशों की खुलेआम अवहेलना कर रहे हैं? जब मामला हद से गुजरने लगा तो देहरादून स्थित प्रमुख वन संरक्षक (एचओएफएफ) को खुद कड़े तेवर अपनाने पड़े। प्रमुख वन संरक्षक ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि किसी भी सूरत में समय सीमा विस्तार (एक्सटेंशन) नहीं दिया जाएगा, आदेश न मानने वालों का वेतन रोका जाएगा और यदि किसी प्रभागीय वनाधिकारी या आहरण-वितरण अधिकारी के स्तर से आदेशों की पालना में संरक्षण या ढिलाई पाई गई, तो उनकी भूमिका की भी जांच कर विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
हजूर 👉 देहरादून से जारी इसी कड़े रुख की गूंज अब कुमाऊँ तक पहुंच गई है। अल्मोड़ा स्थित कार्यालय वन संरक्षक, उत्तरी कुमाऊँ वृत्त के वन संरक्षक चंद्र शेखर जोशी का 3 सितंबर 2026 को जारी कड़ा आदेश सामने आने से विभाग की कलई पूरी तरह खुल गई है। वन संरक्षक चंद्र शेखर जोशी ने उत्तरी कुमाऊँ वृत्त के समस्त प्रभागीय वनाधिकारियों (डीएफओ) को सख्त निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि स्थानांतरण सत्र 2026 के दौरान विभिन्न स्तरों से निर्गत आदेशों का शत-प्रतिशत और त्वरित अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में ताकीद की है कि तबादला आदेशों के अनुपालन में अत्यधिक विलंब करना और कार्यमुक्ति व कार्यभार ग्रहण की कार्यवाही समय पर न करना सर्वथा अनुचित तथा विभागीय अनुशासन के बिल्कुल प्रतिकूल है।
हजूर 👉 अल्मोड़ा से जारी इस शासकीय आदेश ने टालमटोल करने वाले कर्मचारियों के साथ-साथ उन्हें अभयदान देने वाले अफसरों की भी नींद उड़ा दी है। पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि यदि स्थानांतरण आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो संबंधित प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) तत्काल प्रभाव से ऐसे कार्मिकों का वेतन आहरण रोकते हुए उनका अंतिम वेतन प्रमाण-पत्र (एलपीसी) निर्गत कर दें। इतना ही नहीं, अनुपालन न करने वाले कार्मिक का नाम, पदनाम, आदेश संख्या, दिनांक और अनुपालन न किए जाने का ठोस कारण अनिवार्य रूप से वन संरक्षक कार्यालय को भेजने के कड़े आदेश दिए गए हैं। ढिलाई बरतने वालों को सख्त चेतावनी दी गई है कि इस विषय को अत्यंत गंभीरता से लिया जाए और किसी भी प्रकार की शिथिलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हजूर 👉 प्रमुख वन संरक्षक (एचओएफएफ) द्वारा स्थानांतरण आदेशों की पालना के लिए 30 सितंबर की अंतिम समय-सीमा (डेडलाइन) निर्धारित की गई है, जो अब देहरादून से लेकर अल्मोड़ा तक पूरे विभाग के लिए एक बड़ी प्रशासनिक परीक्षा बन चुकी है। 30 सितंबर की इस अंतिम समय-सीमा और वन संरक्षक के 3 सितंबर के सख्त लिखित अल्टीमेटम के बाद पूरे महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। अब देखना यह होगा कि 30 सितंबर के बाद विभाग लंबे समय से जमे कर्मचारियों और उन्हें संरक्षण देने वाले अफसरों के खिलाफ कितना सख्त चाबुक चलाता है। क्या सरकारी आदेशों का इकबाल जंगल तक पहुंचेगा और कुर्सियों से चिपके चेहरे अपनी जगह से हिलेंगे, या फिर यह पूरी कसरत भी कागजी चेतावनियों के फेर में फाइलों की धूल में दफन होकर रह जाएगी?



