जंगल जासूस 👉
हजूर 👉उत्तराखंड के बच्चों के लिए खुला जंगल का ‘फ्री हॉस्टल’ दरवाजा, संजीव चतुर्वेदी के प्रयासों से अब प्रकृति बनेगी असली शिक्षक?
हजूर 👉 देवभूमि उत्तराखंड की असली रूह सिर्फ उसके भव्य मंदिरों में नहीं, बल्कि उसकी सांझ-सवेरे लहलहाती हरी-भरी वादियों, नदियों, पहाड़ों और घने जंगलों की जैव विविधता में बसती है। अब इसी कुदरत की अनमोल पाठशाला से उत्तराखंड के नौनिहालों को जोड़ने की एक बेहद शानदार और अनूठी पहल हुई है। हल्द्वानी स्थित ‘उत्तराखंड वन प्रशिक्षण अकादमी’ ने सरकारी संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए अपने छात्रावास का दरवाज़ा 15 दिनों के लिए एकदम मुफ़्त खोल दिया है। सीधा सा हिसाब है👉अब हमारे बच्चे जंगल का पाठ सिर्फ श्यामपट पर रटेंगे नहीं, बल्कि खुली हवा में रहकर उसे महसूस भी करेंगे!
हजूर 👉 ज़रा सोचिए👉जिस पेड़ की उपयोगिता बच्चा किताबों के चंद पन्नों में पढ़कर भूल जाता था, उसी पेड़ की छांव में खड़े होकर अब वह देखेगा कि उस पर परिंदों का आशियाना कैसे बनता है। तितलियों की रंगीन दुनिया, बहती नदियों का जंगल से अटूट रिश्ता और पहाड़ों की हरियाली कैसे इंसानी जीवन की डोर को संभाले हुए है👉ये सब अब उनके सामने सीधा होगा। यहां कोई खड़िया और झाड़न नहीं, बल्कि दूर तक फैली कुदरत ही बच्चों की शिक्षक बनेगी।
हजूर 👉 इस खूबसूरत शुरुआत के पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। हुआ यूं कि ‘वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय’ के छात्र जब शैक्षणिक भ्रमण पर आए, तो उनसे छात्रावास का शुल्क लिया जा रहा था। तभी अकादमी के भीतर यह जायज़ सवाल उठा कि आखिर अपनी जेब से पढ़ाई करने वाले मासूम छात्रों और भारी-भरकम वेतन पाने वाले सरकारी अफ़सरों को एक ही तराजू में क्यों तोला जाए? बस, यही टीस एक नया बदलाव ले आई और छात्रों के लिए मुफ़्त छात्रावास का प्रस्ताव पटल पर आ गया।
हजूर 👉 उत्तराखंड वन प्रशिक्षण अकादमी के निदेशक संजीव चतुर्वेदी की दूरदर्शी सोच और सार्थक प्रयासों की बदौलत 9 सितंबर को यह प्रस्ताव भेजा गया, जिसे 16 सितंबर को मंज़ूरी की मुहर भी मिल गई। उनके इन्हीं प्रयासों के चलते अब अकादमी के नए ‘मयूरी छात्रावास’ में छात्र 15 दिन तक मुफ़्त रहकर पर्यावरण के गूढ़ रहस्य समझ सकेंगे। फिलहाल यह एक प्रयोग है, लेकिन अगर बच्चों का उत्साह ज़बरदस्त रहा, तो इस योजना का दायरा और समय दोनों बढ़ाने की पूरी तैयारी है।
हजूर 👉 असली क्रांति तो तब आएगी जब दूर-दराज के गांवों और पहाड़ों के बच्चे यहां आकर अपनी आंखों से इस विशाल वन-संपदा को देखेंगे। उन्हें समझ आएगा कि ये जंगल सिर्फ इमारती लकड़ियों का ढेर नहीं, बल्कि हमारी सांसों की पूंजी हैं। यही 15 दिन का अनुभव शायद कल को किसी बच्चे में देश का बड़ा पर्यावरणविद, जांबाज वन अधिकारी या एक बेहद संवेदनशील नागरिक जगा दे👉जो पेड़ कटने पर सिर्फ वीडियो बनाने के बजाय पुरज़ोर आवाज़ उठाकर कहे कि “पेड़ हैं तो हम हैं!”
हजूर 👉 यही इस शानदार कदम की असली जीत है। उत्तराखंड के बच्चे सिर्फ इस राज्य का कल नहीं, बल्कि हमारी इन ख़ूबसूरत वादियों के भावी रखवाले भी हैं। इससे पहले 2022 में भी राज्य के 26 जैव विविधता केंद्रों को छात्रों के लिए मुफ़्त किया गया था, और अब यह मुफ़्त छात्रावास की सुविधा उसी कड़ी में एक मील का पत्थर है। जब बच्चा जंगल को दिल से जान जाएगा, तो नक्शे का वह हरा रंग उसके लिए सिर्फ एक रंग नहीं, बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ी का वजूद बन जाएगा।



