हजूर 👉आई.पी.आर. गायब, एपेक्स स्केल हाजिर! तबादले की जंग के बाद अब पूर्व प्रमुख वन संरक्षक रंजन मिश्रा की पदोन्नति पर ‘कानूनी हथौड़ा’?

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉आई.पी.आर. गायब, एपेक्स स्केल हाजिर! तबादले की जंग के बाद अब पूर्व प्रमुख वन संरक्षक रंजन मिश्रा की पदोन्नति पर ‘कानूनी हथौड़ा’?

हजूर 👉 उत्तराखंड वन विभाग की फाइलें भी कमाल का खेल दिखाती हैं👉कहीं तबादले पर हाईकोर्ट की घंटी बजती है, तो कहीं पदोन्नति पर कानूनी नोटिस दस्तक दे देता है! अभी तबादले से जुड़े विवाद की गूंज थमी भी नहीं थी कि अब वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा की लेवल-17 यानी एपेक्स स्केल पदोन्नति को लेकर बड़ा विधिक सवाल खड़ा हो गया है। 24 अगस्त 2026 को आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की ओर से मुख्य सचिव को भेजे गए कानूनी नोटिस ने सवाल सीधा फाइल के सीने पर रख दिया है👉जिस संपत्ति विवरण की पारदर्शिता नियमों में जरूरी बताई जाती है, वह रिकॉर्ड में कहां है और पदोन्नति के वक्त उसकी जांच कैसे हुई?

हजूर 👉 मामला इसलिए मसालेदार है क्योंकि कानूनी नोटिस में केंद्रीय आई-प्रॉपर्टी मॉड्यूल के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए 2017 से 2026 तक आई.पी.आर. दाखिल किए जाने को लेकर गंभीर आपत्ति उठाई गई है। नोटिस में संबंधित भारतीय वन सेवा नियमों और केंद्रीय दिशा-निर्देशों का हवाला देकर सवाल किया गया है कि यदि अनिवार्य संपत्ति विवरण लंबित था, तो उच्च पद पर पदोन्नति के लिए अधिकारी की पात्रता और अभिलेखों का परीक्षण किस तरह किया गया? यानी सवाल यह नहीं कि फाइल चली या नहीं👉सवाल यह है कि फाइल में नियमों की घंटी बजी या नहीं?

हजूर 👉 और अब आता है कहानी का सबसे तगड़ा मोड़! नोटिस में दिसंबर 2025 की विभागीय पदोन्नति समिति की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दावा किया गया है कि कथित आई.पी.आर. गैर-दाखिले का मुद्दा समिति के सामने प्रभावी ढंग से नहीं आया और इसके बावजूद सत्यनिष्ठा प्रमाणन की प्रक्रिया पूरी हुई। अगर आधिकारिक रिकॉर्ड इन दावों की पुष्टि करता है तो सवाल केवल एक अधिकारी की पदोन्नति तक सीमित नहीं रहेगा👉फिर सवाल उठेगा कि चयन समिति के सामने कौन-कौन से कागज रखे गए, किसने जांचे और किस आधार पर हरी झंडी दी? सरकारी फाइल में एक कागज कम हो तो बाबू की भौंहें तन जाती हैं, लेकिन यहां मामला कथित तौर पर वर्षों के संपत्ति विवरण का है!

हजूर 👉 कानूनी नोटिस ने जांच की दिशा भी दूर तक खींच दी है। इसमें पदोन्नति से जुड़े अभिलेख सुरक्षित रखने, निर्णय की पुनर्समीक्षा और जिम्मेदारी तय करने की मांग के साथ केंद्रीय जांच एजेंसियों से संपत्तियों की जांच का अनुरोध किए जाने की बात सामने आती है। मगर जंगल जासूस यहां एक जरूरी ब्रेक भी लगाता है👉जांच की मांग का मतलब दोष सिद्ध होना नहीं है। रंजन कुमार मिश्रा के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि या खंडन मूल सरकारी रिकॉर्ड, संबंधित विभाग की कार्रवाई और यदि मामला अदालत तक जाता है तो न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा।

हजूर 👉 अब असली परीक्षा सरकार और वन विभाग की है। केंद्रीय आई-प्रॉपर्टी मॉड्यूल खोलिए, वर्षवार रिकॉर्ड देखिए, पदोन्नति समिति की कार्यवाही सामने रखिए और बताइए👉आई.पी.आर. क्या कहता है, चयन समिति की फाइल क्या कहती है और एपेक्स स्केल की मुहर किस आधार पर लगी? यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो दस्तावेज सवालों का जवाब दे देंगे; यदि कोई चूक हुई है तो वही दस्तावेज जिम्मेदारी तक पहुंचने का रास्ता भी दिखाएंगे। जंगल जासूस का सवाल बस इतना है👉फाइल में स्याही किसकी थी, कलम किसकी थी और नियमों की किताब उस वक्त खुली थी या बंद?

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