जंगल जासूस 👉
हजूर 👉पहाड़ का ‘काला सोना’ नीलाम और नींद में सोता महकमा!
हजूर 👉 उत्तराखंड राज्य को बने जल्द ही 26 साल पूरे होने जा रहे हैं। जब पहाड़ों को काटकर इस नए सूबे की नींव रखी गई थी, तब राज्य की जनता ने यह उम्मीद लगाई थी कि चीड़ के जंगलों से निकलने वाला ‘लीसा’ उत्तराखंड के विकास में सोना उगलेगा, सरकार का राजस्व बढ़ाएगा और इस राजस्व का असर राज्य के कोने-कोने में खुशहाली के रूप में दिखेगा। जनता को आस थी कि अवैध लीसा तस्करों की कमर तोड़ दी जाएगी और पहाड़ी संसाधनों की डकैती बंद होगी। लेकिन 26 साल बाद भी धरातल पर तस्करों के हौसले पूरी तरह बुलंद हैं। हालत यह है कि लीसा जहां से चोरी-छिपे निकल रहा है या अधिकारियों की मिलीभगत से गायब हो रहा है, उस सोर्स तक पहुंचने में वन विभाग के सूरमा आज भी पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।
हजूर 👉 बीते दो महीनों के आंकड़े इस पूरे तंत्र की पोल खोलने के लिए काफी हैं। 22 जुलाई से लेकर 23 सितंबर के बीच पुलिस और वन विभाग की नाकेबंदी में कुल 1,218 कनस्तर अवैध लीसा पकड़ा गया। 22 जुलाई को बन्नाखेड़ा रेंज में कैंटर से 480 टिन बरामद हुए, 26 अगस्त को बाजपुर में टूरिस्ट बस से 348 कनस्तर मिले और फिर 23 सितंबर की रात रामनगर में कैंटर से 390 टिन लीसा पुलिस के हत्थे चढ़ा। तस्कर कभी बसों की सीटें उखाड़कर फर्श के नीचे माल छिपा रहे हैं, तो कभी मालवाहक गाड़ियों में तिरपाल के नीचे गुप्त केबिन बना रहे हैं। गाड़ियां और पैंतरे भले बदल रहे हों, लेकिन रानीखेत, भिकियासैंण, द्वाराहाट, अल्मोड़ा और बेतालघाट जैसे पहाड़ी अंचलों से माल निकालकर तराई के मैदानी कारखानों तक पहुंचाने का मुख्य रूट जस का तस बना हुआ है।
हजूर 👉 यह पूरा खेल वन महकमे की उस निगरानी प्रणाली पर सीधा हमला है, जिस पर हर साल करोड़ों रुपये बजट का पानी की तरह बहाया जाता है। पहाड़ों के दुर्गम जंगलों से सैकड़ों टिन लीसा टपककर कनस्तरों में भर जाता है, गाड़ियों में लोड होता है और दर्जनों विभागीय चौकियों को पार करते हुए मैदानी सड़कों तक आ पहुंचता है। लेकिन जंगल के दावों वाले रखवालों को इसकी कानों-कान भनक तक नहीं लगती। कागजों में चौकियां मुस्तैद दिखाई जाती हैं, गश्ती टीमों की फाइलें दौड़ती हैं और डिजिटल क्रॉस-वेरिफिकेशन के लंबे-चौड़े दावे किए जाते हैं, मगर हकीकत यह है कि सरकारी खजाने पर बेखौफ डाका डाला जा रहा है और वन कर्मी सिर्फ तमाशबीन बने हुए हैं।
हजूर 👉 जब भी सड़कों पर कोई गाड़ी पकड़ी जाती है, तो पुलिस चालक और परिचालक को गिरफ्तार कर अपनी पीठ थपथपा लेती है और वन विभाग कागजी खानापूर्ति कर ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन जरा सोचिए कि क्या स्टेयरिंग थामने वाला ड्राइवर या डिग्गी में कनस्तर भरने वाला क्लीनर इस पूरे सिंडिकेट का असली मालिक है? असली गुनहगार वे चेहरे हैं जो जंगलों में अवैध कटान और टैपिंग करवाते हैं, जो फर्जी परिवहन पास तैयार करवाते हैं और जो तराई की फैक्ट्रियों में बैठकर इस ‘काले सोने’ की मोटी बोली लगाते हैं। जब तक जांच की आंच इन सफेदपोश सरगनाओं तक नहीं पहुंचेगी, तब तक 1,218 कनस्तरों की यह जब्ती महज एक रूटीन कार्रवाई बनकर रह जाएगी।
हजूर 👉 इस पूरे घटनाक्रम में अगर किसी की साख बची है, तो वह सड़कों पर रात-दिन गश्त कर रही पुलिस टीम है। तस्करों के नित-नए पैंतरों और मॉडिफाइड गाड़ियों के बावजूद पुलिस का सूचना तंत्र जिस तरह काम कर रहा है और गाड़ियों को नाकेबंदी में दबोच रहा है, वह काबिले-तारीफ है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जंगलों की सुरक्षा का पूरा जिम्मा अब सिर्फ पुलिस के हवाले है? अगर पुलिस सड़क पर गाड़ी न रोके, तो क्या पहाड़ का पूरा जंगल यूं ही ट्रकों में भरकर मैदानों में खाली हो जाएगा? वन महकमे को अब अपनी उस गहरी नींद से जागना ही होगा, जिसने तस्करों के हौसलों को पंख दे रखे हैं।
हजूर 👉 26 साल के इस सफर में उत्तराखंड की जनता अब कागजी दावों से ऊब चुकी है। वन प्रेमियों का सवाल बिल्कुल सीधा और तीखा है👉जब तीन बार में 1,218 कनस्तर लीसा सड़क पर पकड़ा जा सकता है, तो फिर जंगल के भीतर सुरक्षा के दावे करने वाले जिम्मेदार अधिकारी और बीट कर्मी कहां गायब हैं? अगर विभाग सचमुच इस अवैध कारोबार की कमर तोड़ना चाहता है, तो उसे चालकों से आगे बढ़कर उस पूरी सप्लाई चेन पर प्रहार करना होगा जो पहाड़ के जंगलों से शुरू होकर तराई के गोदामों तक फैली है। वरना 26 साल बीत गए हैं, आने वाले सालों में भी पहाड़ का यह खजाना यूं ही लुटता रहेगा और राजस्व का नुकसान पूरा सूबा भुगतने के लिए मजबूर हमेशा रहेगा।



