हजूर👉सरकारी खजाने पर सवाल👉विदेश यात्रा के बिलों का खेल कब तक?

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जंगल जासूस👉

हजूर👉सरकारी खजाने पर सवाल👉विदेश यात्रा के बिलों का खेल कब तक?

हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के पूर्व प्रबंध निदेशक गिरिजा शंकर पांडेय की अप्रैल 2025 की विदेश यात्रा से जुड़े दस्तावेजों ने सरकारी व्यवस्था के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सात दिन की यात्रा, सरकारी खाते से आवास-भोजन और स्थानीय यात्रा का खर्च, उसके बाद दैनिक भत्ते को लेकर चार गुना अधिक भुगतान का आरोप👉अगर दस्तावेजों में यह सब दर्ज है तो मामला साधारण यात्रा खर्च कहकर फाइल में दबाने वाला नहीं है। सरकारी पैसा खर्च हुआ है तो हिसाब भी पूरा देना पड़ेगा।

हजूर 👉 आरटीआई से सामने आए दस्तावेजों के आधार पर सबसे बड़ा सवाल दैनिक भत्ते का है। जब यात्रा के दौरान रहने, खाने और स्थानीय आवागमन की व्यवस्था का खर्च निगम द्वारा उठाए जाने की बात सामने आ रही है, तब निर्धारित दैनिक भत्ते से चार गुना अधिक भुगतान कैसे हुआ? किस नियम के तहत हुआ? किसने गणना की? किसने सत्यापन किया और किसने भुगतान स्वीकृत किया? फाइल पर हस्ताक्षर करने वालों की जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

हजूर 👉 अब होटल के बिलों का हिसाब देखिए। एक ही समयावधि में दो अलग-अलग होटलों से जुड़े भुगतान सामने आने का दावा है। सवाल सीधा है👉एक ही समय में दो होटल क्यों? यदि दोनों भुगतान सही हैं तो यात्रा कार्यक्रम और मूल अभिलेख इसकी वजह बताएंगे। और यदि किसी भुगतान में गड़बड़ी मिली तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। सरकारी फाइल में तारीखें बहुत कुछ कह सकती हैं, लेकिन आदमी एक समय में दो कमरों में तो नहीं ठहर सकता!

हजूर 👉 करीब 45 हजार रुपये की निजी सामान की खरीद का सवाल भी कम गंभीर नहीं है। यदि निगम के खाते से ऐसी खरीद हुई है तो उसका नियम, स्वीकृति और भुगतान आधार सामने आना चाहिए। जनता के पैसे से निजी सामान खरीदा गया या नहीं👉इसका फैसला बयान नहीं, मूल बिल और भुगतान अभिलेख करेंगे।

हजूर 👉 इसके बाद करीब 3.5 लाख रुपये के क्रूज खर्च का सवाल सामने आता है। उपलब्ध खबर के अनुसार 4 और 5 अप्रैल 2025 को क्रूज में ठहरने से संबंधित भुगतान का उल्लेख है, जबकि उसी अवधि में होटल का खर्च भी सामने आया। यदि दोनों खर्च सरकारी खाते से हुए तो सवाल स्वाभाविक है👉एक ही अवधि में क्रूज भी और होटल भी, तो सरकारी खजाना आखिर कितने ठिकानों का खर्च उठाएगा?

हजूर 👉 अब सरकार के अपने मंत्री का बयान भी सुन लीजिए। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा है कि उन्हें यात्रा की जानकारी है, लेकिन यह मामला उनके संज्ञान में नहीं था। उन्होंने कहा कि यदि कहीं गलत भुगतान हुआ है तो जांच कराई जाएगी और प्रबंध निदेशक को इसके निर्देश दिए जाएंगे, ताकि सही बात सामने आ सके। उनका यह भी कहना है कि यदि गड़बड़ी मिली तो कार्रवाई होगी, चाहे संबंधित अधिकारी सेवानिवृत्त ही क्यों न हो गए हों।

हजूर 👉 मंत्री जी का बयान अब इस मामले को और गंभीर बना देता है। क्योंकि सरकार खुद कह रही है कि यदि गलत भुगतान हुआ है तो जांच होगी और गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई होगी। तो फिर इंतजार किस बात का? यात्रा की पूरी पत्रावली खोलिए👉दैनिक भत्ता, होटल, क्रूज, निजी खरीद, टिकट, भुगतान वाउचर और स्वीकृति की पूरी श्रृंखला की जांच कराइए।

हजूर 👉 जांच केवल पूर्व एमडी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बिल किसने तैयार किया, सत्यापन किसने किया, लेखा शाखा ने क्या देखा, भुगतान किसने स्वीकृत किया और नियमों की जांच किस स्तर पर हुई👉हर कड़ी की पड़ताल होनी चाहिए। अगर कहीं गलत भुगतान हुआ है तो केवल रकम की वसूली नहीं, जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

हजूर 👉 जंगल जासूस का सीधा सवाल 👉 जब मंत्री खुद कह रहे हैं कि गड़बड़ी मिली तो कार्रवाई होगी, तो अब जनता यह देखना चाहती है कि जांच कब होगी और रिपोर्ट कब सामने आएगी? विदेश यात्रा सरकारी थी तो खर्च भी सरकारी नियमों के मुताबिक होना चाहिए। दैनिक भत्ता, होटल, क्रूज, निजी खरीद और भुगतान—हर पन्ना खुले, हर बिल की जांच हो और हर रुपये का हिसाब सामने आए। सरकारी खजाना जनता का है👉किसी की निजी सुविधा का एटीएम नहीं।

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