हरा-भरा धोखा और भूखा पेट, जब रास्ता ही छिन गया तो गांव नहीं तो कहां जाएगा हाथी?

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हजूर👉12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ गजराज की गिनती गिनने और संरक्षण की उपलब्धियां गिनाने का दिन नहीं, बल्कि यह पूछने का दिन भी है कि जिन रास्तों पर हाथियों की पीढ़ियां चलती आईं, वे रास्ते आज कितने सुरक्षित बचे हैं। उत्तराखंड में हाथियों की मौजूदगी निश्चित रूप से संरक्षण की उम्मीद जगाती है, लेकिन मौतों के आंकड़े इस उम्मीद के साथ एक गंभीर सवाल भी खड़ा करते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2001 से 2023 के बीच राज्य में 508 हाथियों की मौत दर्ज हुई। इनमें 184 मौतें प्राकृतिक कारणों से, 96 आपसी संघर्ष में, 78 विभिन्न दुर्घटनाओं में, 43 बिजली के करंट से और 23 रेल दुर्घटनाओं में दर्ज की गईं। आंकड़े अपने आप में कोई आरोप नहीं लगाते, लेकिन वे व्यवस्था के सामने सवाल जरूर रखते हैं।

हजूर 👉रेल की पटरियां हाथियों के लिए विकास की सबसे कठिन परीक्षा बनकर सामने आती हैं। उपलब्ध आंकड़ों में 23 हाथियों की मौत ट्रेन की चपेट में आने से दर्ज है, जिनमें 16 मौतें देहरादून हरिद्वार रेल मार्ग से जुड़ी बताई गईं। हाथी अपनी पीढ़ियों पुरानी राह पर चलता है, उसे यह मालूम नहीं होता कि जंगल के बीच इंसान ने लोहे की पटरी बिछा दी है। उसके लिए रास्ता वही है, लेकिन उस रास्ते पर दौड़ती ट्रेन उसके लिए मौत बन सकती है। विकास रुकना नहीं चाहिए, लेकिन विकास ऐसा भी नहीं होना चाहिए जिसमें जंगल के निवासी को अपनी ही जमीन पर रास्ता बदलना पड़े। असली चुनौती यही है कि रेल की रफ्तार और गजराज की सुरक्षा दोनों साथ चलें।

हजूर 👉बिजली के तारों ने भी गजराज के लिए खतरे की अलग कहानी लिखी है। वर्ष 2001 से 2023 तक उपलब्ध आंकड़ों में 43 हाथियों की मौत बिजली के करंट से दर्ज हुई। यह आंकड़ा किसी एक घटना की कहानी नहीं, बल्कि लंबे समय से सामने आ रहे जोखिम का संकेत है। हाथी की ऊंचाई, उसका विशाल शरीर और जंगल से गुजरती बिजली की लाइनें कई संवेदनशील स्थानों पर गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। वहीं 96 हाथियों की मौत आपसी संघर्ष में दर्ज हुई है। इन मौतों को सीधे मानवीय लापरवाही कहना उचित नहीं होगा, लेकिन यह जरूर बताता है कि हाथियों की आबादी, उनका आवास, भोजन और आपसी क्षेत्रीय व्यवहार सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। संरक्षण की तस्वीर तभी पूरी होगी जब संख्या के साथ मौतों के कारणों को भी गंभीरता से समझा जाए।

हजूर 👉सड़क और बस दुर्घटनाओं को लेकर भी एक बात साफ रखना जरूरी है। उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों में 78 हाथियों की मौत विभिन्न दुर्घटनाओं की श्रेणी में दर्ज है, लेकिन सड़क, बस और दूसरी दुर्घटनाओं का अलग-अलग राज्यव्यापी विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी अनुमान को आंकड़ा बनाकर पेश करना उचित नहीं होगा। यही पत्रकारिता की असली कसौटी है। सनसनी के लिए संख्या बढ़ाई जा सकती है, लेकिन सच की ताकत हमेशा प्रमाणित आंकड़े में होती है। जनता को यह जानना जरूरी है कि हाथी की मौत कहां हुई, किस कारण हुई और उस स्थान को भविष्य के लिए सुरक्षित बनाने के क्या उपाय किए गए। हर मौत सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि भविष्य की किसी मौत को रोकने का सबक भी हो सकती है।

हजूर 👉मौतों की कहानी का दूसरा सिरा हाथियों के घटते और बंटते रास्तों से जुड़ा है। तराई भाबर में आबादी का विस्तार, सड़कें, रेल लाइनें, बिजली की संरचनाएं और दूसरी विकास गतिविधियां वन क्षेत्रों की कनेक्टिविटी के सामने चुनौती खड़ी कर रही हैं। हाथी किसी छोटे से जंगल में बंद होकर रहने वाला वन्यजीव नहीं है। उसे भोजन और पानी की तलाश में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। जब उसका पारंपरिक रास्ता बाधित होता है तो वह नया रास्ता तलाश सकता है और वही नया रास्ता कभी खेत, कभी सड़क और कभी आबादी तक पहुंच जाता है। फिर कहानी का दूसरा दृश्य शुरू होता है, जहां इंसान हाथी को समस्या मानता है। लेकिन सवाल थोड़ा पीछे जाकर पूछना होगा कि समस्या हाथी ने पैदा की या उसके रास्ते में पैदा हुई परिस्थितियों ने। यही सवाल मानव हाथी संघर्ष की जड़ तक पहुंचता है।

हजूर 👉विश्व हाथी दिवस पर इसलिए केवल यह कहना काफी नहीं कि गजराज की संख्या बढ़ रही है। असली उपलब्धि तब होगी जब उसकी संख्या के साथ उसके रास्ते भी सुरक्षित हों, जंगल में पर्याप्त प्राकृतिक भोजन और पानी उपलब्ध हो, रेल मार्गों के संवेदनशील हिस्सों पर प्रभावी सुरक्षा हो, बिजली की जोखिम वाली लाइनों की नियमित निगरानी हो और हाथी गलियारों की स्थिति केवल कागजों में नहीं बल्कि जमीन पर भी सुरक्षित दिखाई दे। किसी अधिकारी या संस्था पर आरोप लगाना इस सवाल का उद्देश्य नहीं है। सवाल व्यवस्था से है, सवाल नीति से है और सवाल उस विकास मॉडल से है जिसमें जंगल भी चाहिए और जंगल के वन्यजीवों के रास्ते भी। गजराज की गिनती बढ़ना अच्छी खबर है, लेकिन उसकी हर मौत का कारण समझना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। क्योंकि हाथी सिर्फ जंगल का निवासी नहीं, जंगल की चलती-फिरती धड़कन है। रास्ते बचेंगे तो हाथी बचेगा, हाथी बचेगा तो जंगल की सांस भी चलती रहेगी।