हजूर ​👉 कुर्सी के घमासान पर नैनीताल हाईकोर्ट की नजीर​👉 रेकुनी बनाम चन्याल ट्रांसफर केस ने उत्तराखंड वन विभाग में लिखा नया प्रशासनिक अध्याय!

जंगल जासूस 👉

हजूर ​👉 कुर्सी के घमासान पर नैनीताल हाईकोर्ट की नजीर👉रेकुनी बनाम चन्याल ट्रांसफर केस ने उत्तराखंड वन विभाग में लिखा नया प्रशासनिक अध्याय!

हजूर 👉 तराई पूर्वी वन प्रभाग की किशनपुर रेंज की हॉट-सीट को लेकर छिड़ा घमासान अब सिर्फ दो अधिकारियों के बीच कुर्सी की खींचतान नहीं रह गया है। रेकुनी साहब बनाम चन्याल साहब के इस हाई-प्रोफाइल ट्रांसफर विवाद में नौ सितंबर 2026 को नैनीताल हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ से जो आदेश निकला है, उसने उत्तराखंड वन विभाग के इतिहास के पन्नों में एक नया अध्याय दर्ज कर दिया है। मामला रेंजर महेंद्र सिंह रेकुनी का है, जिन्हें सात जुलाई को रनसाली राजि से किशनपुर राजि की जिम्मेदारी मिली और महज 48 दिन बाद 24 अगस्त को वहां से हटाकर बाराकोली भेजने का फरमान जारी हुआ। पूर्व स्वीकृति के झोल और डीएफओ दीपक कुमार सिंह के प्रशासनिक अधिकारों को लेकर हाईकोर्ट में जोरदार बहस हुई, लेकिन अदालत ने मेरिट्स पर अंतिम फैसला न देकर पूरे मामले को एक ऐतिहासिक प्रशासनिक मोड़ पर ला खड़ा किया है।

हजूर 👉 सरकारी पक्ष ने न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की पीठ के सामने पूरी मजबूती से तर्क रखा कि यह किसी अधिकारी को प्रभाग से बाहर भेजने का मामला नहीं, बल्कि तराई पूर्वी वन प्रभाग के भीतर ही रेंज फेरबदल का मामला है। विभागीय व्यवस्था के तहत प्रभाग के भीतर सुरक्षा और कार्य👉संतुलन की जरूरतों के अनुसार डीएफओ दीपक कुमार सिंह को अधिकारियों को अलग-अलग रेंजों में जिम्मेदारी सौंपने का पूरा अधिकार होता है। 2023 के एक पूर्व न्यायिक निर्णय का हवाला देते हुए यह पक्ष भी रखा गया कि एक ही वन प्रभाग के भीतर कार्यक्षेत्र परिवर्तन को हर परिस्थिति में सामान्य ‘तबादला’ नहीं माना जा सकता। हालांकि, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस सरकारी पक्ष को आदेश में दर्ज तो किया, लेकिन इस पर कोई अंतिम मुहर नहीं लगाई।

हजूर 👉 अब जरा जंगल की जमीनी हकीकत और फील्ड कमांडर के नजरिए से देखिए। जंगल कोई वातानुकूलित दफ्तर नहीं है, जहां फाइलें आराम से सरकती रहें। जब किसी रेंज में अवैध कटान की शिकायतें बढ़ें, सागौन या खैर के तस्कर सक्रिय हो जाएं या वन्यजीव सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगे, तो डीएफओ दीपक कुमार सिंह जैसे प्रशासनिक प्रमुख के लिए फील्ड व्यवस्था को तुरंत चुस्त-दुरुस्त करना और अधिकारियों की कमान बदलना बेहद जरूरी हो जाता है। जंगल बचाने के लिए प्रशासनिक नियंत्रण कड़ा होना ही चाहिए, क्योंकि अगर फील्ड में कमान जरा भी ढीली पड़ी, तो तस्कर फाइलों की रफ्तार से कहीं ज्यादा तेज भागते हैं।

हजूर 👉 लेकिन इसके साथ ही कानून और नियमों की सीमा भी उतनी ही मजबूत लकीर खींचती है। यदि किसी विशेष परिस्थिति में विभागीय नियमावली के तहत सक्षम अधिकारी की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है, तो उसका पालन करना भी उतना ही अनिवार्य है। डीएफओ दीपक कुमार सिंह के पास प्रशासनिक अधिकार होना और उन अधिकारों का इस्तेमाल तय कानूनी प्रक्रिया के तहत होना👉ये दोनों पहलू एक साथ चलेंगे। अधिकार चाहे कितने भी बड़े हों, अगर प्रशासनिक रिकॉर्ड और प्रक्रियात्मक नियम मजबूत नहीं होंगे, तो फैसला अदालत की कसौटी पर टिकना मुश्किल हो जाता है।

हजूर 👉 नैनीताल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस विवाद पर खुद फैसला सुनाने के बजाय गेंद वापस प्रशासनिक मेज पर ला गिराई है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की पीठ ने याचिकाकर्ता को डीएफओ दीपक कुमार सिंह के समक्ष अपना आधिकारिक प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करने का अवसर दिया और निर्धारित समयसीमा के भीतर उस पर एक तार्किक निर्णय लेने का निर्देश दिया है। साथ ही निर्णय होने तक ‘स्टेटस क्यो’ यानी यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया गया है। उत्तराखंड वन विभाग के इतिहास में दर्ज होने वाला यह आदेश किसी पक्ष की सीधी जीत या हार नहीं, बल्कि यह संदेश है कि जंगल की सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारों का संतुलन हमेशा कानून के दायरे में ही तय होगा।

 

 

 

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