कुर्सी बदली, चार्ज संभाला, फिर 5 अगस्त की बंद कमरे की बैठक ने बढ़ाया सस्पेंस, सीसीटीवी फुटेज पर टिकीं निगाहें?

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हजूर👉 जरा दिल थामकर और कुर्सी के हत्थे कसकर थाम लीजिए। उत्तराखंड वन विभाग में तबादलों की हलचल के बीच तराई पूर्वी वन प्रभाग का मामला अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। सरकारी दफ्तरों में तबादला आदेश कोई नई बात नहीं, लेकिन यहां चर्चा इस बात की है कि नई तैनाती पर पहुंचकर चार्ज संभालने के बाद भी पुरानी कुर्सी को लेकर कथित तौर पर मामला आगे बढ़ा। विभागीय सूत्रों के दावों पर भरोसा करें तो तबादला आदेश के बाद शुरू हुई कहानी अब राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चाओं तक पहुंच चुकी है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।

हजूर👉तराई पूर्वी वन प्रभाग में हुए फेरबदल में डॉली रेंज के नवीन पंवार को रंसाली, रंसाली के महेंद्र रैकुनी को किशनपुर, किशनपुर के घनानंद चन्याल को बाराकोली, बाराकोली के कैलाश गुणवंत को किलपुरा और किलपुरा के मनोज पांडे को हल्द्वानी चिड़ियाघर भेजे जाने की बात सामने आई। वहीं प्रदीप पंत को डॉली रेंज का प्रभार दिए जाने की चर्चा है। तबादलों की यह पूरी कवायद सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी या इसके पीछे कोई और कहानी थी, यही सवाल अब दफ्तरी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

हजूर👉कहानी का असली ट्विस्ट यहां से शुरू होता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक घनानंद चन्याल ने बाराकोली पहुंचकर नई तैनाती का कार्यभार संभाल लिया। इसके बाद सूत्रों की ओर से दावा किया जा रहा है कि पुरानी तैनाती को लेकर मामला फिर सक्रिय हुआ और राजनीतिक स्तर पर संपर्क किए जाने की चर्चा सामने आई। यहां यह साफ करना जरूरी है कि राजनीतिक दबाव या किसी व्यक्ति की भूमिका के संबंध में अभी कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए सवाल उठाना अलग बात है और किसी पर आरोप साबित कर देना अलग।

हजूर👉5 अगस्त की तारीख इस पूरी कहानी को और दिलचस्प बना देती है। हल्द्वानी स्थित वन संरक्षक, पश्चिमी वृत्त कार्यालय में उस दिन कथित रूप से अधिकारियों और संबंधित लोगों के बीच बैठक होने की चर्चा है। सूत्रों का दावा है कि बैठक में स्थानांतरण और पुरानी तैनाती से जुड़े विषय पर बातचीत हुई। अब सवाल यह है कि बैठक में कौन-कौन मौजूद था, बातचीत किस विषय पर हुई और क्या उसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है। यदि कार्यालय परिसर में सीसीटीवी कैमरे सक्रिय थे, तो उनकी रिकॉर्डिंग उस दिन की गतिविधियों की वस्तुनिष्ठ पुष्टि कर सकती है। यही वजह है कि 5 अगस्त की सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है।

हजूर👉 मामला यहीं खत्म नहीं होता। सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि संबंधित रेंजर के विरुद्ध आरोप-पत्र तैयार करने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की संभावना है। लेकिन जब तक कोई आधिकारिक आदेश या आरोप-पत्र सामने नहीं आता, इसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। सवाल यह है कि यदि वास्तव में विभागीय कार्रवाई की तैयारी हो रही है तो उसका आधार क्या है, किस नियम के तहत कार्रवाई प्रस्तावित है और संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा या नहीं। प्रशासनिक पारदर्शिता का तकाजा यही है कि कार्रवाई हो तो नियम के मुताबिक हो और उसका रिकॉर्ड भी स्पष्ट हो।

हजूर👉अब इस पूरे मामले में तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण हो गई हैं। एक तरफ बाराकोली का कार्यभार संभालने का रिकॉर्ड, दूसरी तरफ 5 अगस्त की कथित बैठक और तीसरी तरफ उस दिन की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग। इन तीनों कड़ियों से काफी हद तक यह स्पष्ट हो सकता है कि घटनाक्रम वास्तव में क्या था। जंगल जासूस का सवाल सीधा है👉5 अगस्त को बंद कमरे में आखिर हुई क्या बातचीत? यदि सब कुछ सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा था तो तथ्य सामने आने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। और यदि कोई शिकायत, दबाव या नियमों से जुड़ा विवाद था तो उसका फैसला अफवाहों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, सीसीटीवी और विभागीय रिकॉर्ड से होना चाहिए। आखिर जंगल का कानून हो या दफ्तर का नियम, सच वही मजबूत होता है जिसे रिकॉर्ड की रोशनी में जांचा जा सके।!