जंगल जासूस स्पेशल
हजूर 👉आखिर कब खुलेगा लकड़ी नीलामी के घपले का काला राज!
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के डिपो संख्या चार और पांच (लालकुआं) में लकड़ी की नीलामी से जुड़ा कथित घोटाला अब केवल एक विभागीय जांच का विषय नहीं रहा, बल्कि यह सरकारी तंत्र की लीपापोती और प्रशासनिक अनदेखी की पराकाष्ठा बन चुका है। अगस्त 2023 में पहली बार सामने आए लाखों रुपये के फर्जीवाड़े से शुरू हुआ यह मामला आज दस करोड़ रुपये से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितता के विशालकाय आंकड़ों तक पहुंच चुका है। लेकिन सरकारी महकमों की सुस्त चाल, गोलमोल जवाबों और फाइलों में उलझे सवालों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही तैर रहा है कि आखिर इस विशालकाय घोटाले का असली सूत्रधार कौन है और सरकारी खजाने से लूटे गए एक-एक रुपये का हिसाब जनता के सामने कब सार्वजनिक होगा।
हजूर 👉 इस चर्चित प्रकरण की परतें उधेड़ें तो पूरी कहानी 17 जून 2023 को हुई लकड़ी की नीलामी से शुरू होती है। डिपो संख्या पांच में आयोजित इस नीलामी में वास्तविक बिक्री राशि, लकड़ी के खरीदारों को भेजे गए सरकारी अनुमोदन पत्र और विभागीय बिलों के बीच भारी हेरफेर सामने आया था। प्राथमिक जांच और रिपोर्टों के अनुसार, 17,94,500 रुपये की लकड़ी की बिक्री के मुकाबले महज 9,17,000 रुपये का बिल तैयार किया गया और पलक झपकते ही 8,77,500 रुपये का सीधा राजस्व घाटा सरकारी खाते में दर्ज कर दिया गया। जब मामला उछला तो पुलिस ने विभागीय तहरीर के आधार पर तीन कर्मचारियों के खिलाफ धोखाधड़ी और अमानत में खयानत की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन यह तो महज एक छोटी सी चिंगारी थी जिसके पीछे का पूरा जंगल सुलगना बाकी था।
हजूर 👉 आगे चलकर जब इस मामले में जांच की परतें उधेड़नी शुरू हुईं तो लालकुआं डिपो के भीतर चल रहे संगठित सिंडिकेट की पोल खुलने लगी। नीलामी के दौरान पांच लाख रुपये की बोली वाली लकड़ी को कागजों पर महज तीन लाख रुपये में दर्ज कर दिखाया जा रहा था। मामला तूल पकड़ते ही आनन-फानन में चार अधिकारियों और कर्मचारियों के निलंबन की संस्तुति हुई तथा संविदा कंप्यूटर ऑपरेटरों व छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़े अफसरों को बचाने का खेल शुरू हुआ। नीलामी की वास्तविक रकम, काटे गए बिल, हुए भुगतान और डिपो के फाटकों से बाहर निकली लकड़ी के ट्रकों के बीच का तालमेल पूरी तरह से टूटा हुआ मिला, जिससे यह साफ हो गया कि यह कोई अनजाने में हुई चूक नहीं बल्कि सोच-समझकर रचा गया बड़ा वित्तीय षड्यंत्र था।
हजूर 👉 नवंबर 2023 आते-आते इस घोटाले का दायरा डिपो संख्या पांच से बाहर निकलकर डिपो संख्या चार तक फैल गया। मामले की गंभीरता और लगातार उठते जन सवालों को देखते हुए जांच का जिम्मा विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपने का फैसला किया गया। दिसंबर 2023 में एसपी सीआईडी हल्द्वानी सेक्टर के नेतृत्व में चार सदस्यीय एसआईटी टीम का गठन हुआ। हालांकि, विभागीय लीपापोती का आलम यह रहा कि महीनों बीत जाने के बाद भी एसआईटी की रिपोर्ट कहां धूल फांक रही है और उसने क्या निष्कर्ष निकाले, इसका कोई स्पष्ट जवाब न तो जनता को मिला और न ही मीडिया के सामने लाया गया। किसी भी जांच का असली महत्व कागजी गठन से नहीं बल्कि उसमें तय की गई जिम्मेदारी और दोषियों पर हुई सख्त कार्रवाई से होता है, लेकिन यहां जांच की आड़ में मामले को ठंडे बस्ते में डालने की पूरी कोशिश की गई।
हजूर 👉 मई 2024 में जब विशेष आंतरिक ऑडिट की रिपोर्ट बाहर आई तो वन निगम के भीतर हड़कंप मच गया। डिपो संख्या चार में 25 अगस्त से 21 सितंबर 2023 के बीच के अभिलेखों की गहन जांच में चौकाने वाले तथ्य उजागर हुए। नीलाम लाटों के रिकॉर्ड, लेजर, जीएसटी और बिक्री मूल्यों के साथ-साथ क्रेडिट धनराशि के समायोजन में भारी धांधली पाई गई। विक्रय लाट रजिस्टर में खुलेआम ओवरराइटिंग की गई थी। एक लाट के संबंध में 26,800 रुपये के वास्तविक नीलामी मूल्य पर कटिंग करके उसे 1,98,000 रुपये दर्शाया गया और 70,000 रुपये का सीधा डाका डाला गया। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि ऑडिट में बिना पूरी धनराशि प्राप्त किए ही 1.79 करोड़ रुपये से अधिक के बिल जारी करने और 27 लाख रुपये से अधिक की क्रेडिट धनराशि को दबाने का खुलासा हुआ।
हजूर 👉 मई 2024 में कर्मचारियों के निलंबन और चार्जशीट का दिखावा जरूर हुआ, लेकिन असली सवाल जस का तस बना रहा कि क्या इस गबन की वसूली उन अफसरों और ठेकेदारों की जेब से हुई जिन्होंने मिलकर यह खेल रचा था। फरवरी 2026 में वन निगम कर्मचारी संघ ने जब लालकुआं डिपो में 10 करोड़ रुपये से अधिक के महाघोटाले का विस्फोटक आरोप लगाया तो पूरे महकमे में खलबली मच गई। 2023 के लाखों रुपये के प्राथमिक फर्जीवाड़े से लेकर 2026 के 10 करोड़ से अधिक के आरोपों तक का यह सफर साफ बताता है कि लालकुआं डिपो में सिस्टम को दीमक की तरह चाटा जा रहा था।
हजूर 👉 सरकारी लकड़ी किसी अधिकारी या ठेकेदार की निजी जागीर नहीं बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई और राष्ट्रीय संपत्ति है। लालकुआं डिपो संख्या चार और पांच का यह पूरा खेल तभी बेनकाब होगा जब नीलामी के सारे रिकॉर्ड, रजिस्टर, गेट पास और बैंक खातों का पाई-पाई का हिसाब सार्वजनिक मंच पर लाया जाएगा। कितनी लकड़ी कटी, कितने में नीलाम हुई, कितना पैसा निगम के खजाने में आया और कितना बिचौलियों की जेब में गया, इसका हिसाब देना ही होगा। यदि आरोप सही हैं तो दोषी अधिकारियों को सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए और अगर कोई निर्दोष है तो उसे भी अपनी सफाई का हक मिलना चाहिए। लालकुआं की ये बदरंग फाइलें अब केवल कागज का पुलिंदा नहीं हैं, बल्कि वे उत्तराखंड वन विकास निगम की साख और उसकी प्रशासनिक ईमानदारी का सबसे बड़ा इम्तिहान बन चुकी हैं।



