जंगल जासूस
हजूर 👉देहरादून वन विभाग का बड़ा एक्शन👉कंडोली में 1015 वर्गमीटर वनभूमि से हटा कब्जा, डीएफओ वैभव कुमार सिंह ने दी भू-माफियाओं को सख्त चेतावनी?
हजूर 👉 देहरादून के झाझरा रेंज में बसे कंडोली-1 क्षेत्र में उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब बरसों पुराने अवैध निर्माण पर आखिरकार वन विभाग का चाबुक चल ही गया। आरक्षित वनभूमि को मुक्त कराने के लिए जब राजस्व विभाग और वन विभाग की संयुक्त प्रशासनिक टीम मैदान में उतरी, तो 1015 वर्गमीटर में फैला अवैध ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह गया। जिस जमीन पर बरसों से निजी संपत्ति का ताना-बाना बुना जा रहा था, वह अब पूरी तरह से दोबारा वन विभाग के नियंत्रण में आ चुकी है।
हजूर 👉 इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2006-07 से जुड़ी हैं, जब हरी-भरी आरक्षित वनभूमि पर अनधिकृत निर्माण की शुरुआत की गई थी। जब महकमे की नींद खुली तो कब्जा हटाने का आदेश 7 अगस्त 2009 को जारी हुआ। इसके खिलाफ संबंधित पक्ष ने विभागीय स्तर पर अपील दाखिल की, जिसे 4 सितंबर 2009 को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद मामला नैनीताल हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंचा। सालों तक चली लंबी कानूनी लड़ाई में 20 सितंबर 2017 को हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी। इसके बावजूद कब्जेदारों ने हार नहीं मानी और विशेष अपील (संख्या 1083/2017) दाखिल कर दी। अंततः 9 जून 2025 को हाईकोर्ट ने इस विशेष अपील को भी खारिज कर वन विभाग के पक्ष में अंतिम मोहर लगा दी।
हजूर 👉 अदालती आदेश मिलते ही देहरादून वन प्रभाग ने एक्शन मोड में आते हुए मौका-ए-वारदात पर बुलडोजर चला दिया और जमीन को वापस अपने कब्जे में ले लिया। इस पूरी कार्रवाई पर देहरादून के डीएफओ वैभव कुमार सिंह ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि वन क्षेत्र की जमीन को अतिक्रमण मुक्त रखना विभाग की शीर्ष प्राथमिकता है। आरक्षित वनभूमि पर किसी भी तरह का अवैध निर्माण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सीमाओं की सुरक्षा के लिए ऐसी सख्त कानूनी कार्रवाई आगे भी निरंतर जारी रहेगी।
हजूर 👉 हालांकि इस सफल कार्रवाई के बाद तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठना लाजमी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब 2006-07 में आरक्षित जंगल में पहली ईंट रखी जा रही थी, तब गश्त लगाने वाली टीम और जिम्मेदार अधिकारी कहां सो रहे थे? एक हजार वर्गमीटर से अधिक आरक्षित जमीन पर पक्का निर्माण खड़ा हो गया और महकमा सालों तक अदालती तारीखों के पीछे छिपता रहा। यदि अतिक्रमण को शुरुआती दौर में ही रोक दिया जाए, तो न तो जंगलों का विनाश होगा और ना ही दो दशकों तक कानूनी जंग लड़नी पड़ेगी। देहरादून की यह कार्रवाई भू-माफियाओं के लिए चेतावनी जरूर है, लेकिन जंगल की असली सुरक्षा सिर्फ बुलडोजर चलाने से नहीं, बल्कि समय पर सीमांकन और नियमित पहरेदारी से ही मुमकिन होगी।



