हजूर 👉देहरादून की वातानुकूलित फाइलों से निकला यक्ष प्रश्न👉आखिर आर.के. सुधांशु की ‘टूर डायरी’ में ऐसा क्या है?

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जंगल जासूस 👉

हजूर 👉देहरादून की वातानुकूलित फाइलों से निकला यक्ष प्रश्न👉आखिर आर.के. सुधांशु की ‘टूर डायरी’ में ऐसा क्या है?

हजूर 👉 देहरादून की वातानुकूलित फाइलों से निकला एक ऐसा यक्ष प्रश्न इन दिनों उत्तराखंड वन विभाग के गलियारों में तैर रहा है, जिसका जवाब आने वाले दिनों में प्रशासनिक व्यवस्था की कई परतें खोल सकता है👉आखिर प्रमुख सचिव वन आर.के. सुधांशु की वित्तीय वर्ष 2024-25 की टूर डायरी में ऐसा क्या दर्ज है, जिसे अब केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण यानी कैट के सामने पेश किए जाने की बात सामने आ रही है? मामला वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की एसीआर/कार्य निष्पादन रिपोर्ट से जुड़ा है। उपलब्ध दावे के मुताबिक उनकी ग्रेडिंग 9.74 से घटाकर 9.30 की गई। मामला कैट तक पहुंच चुका है और संबंधित रिकॉर्ड तलब किए जाने के बाद अब विवाद केवल अंकों का नहीं, बल्कि उस मूल्यांकन के आधार और पूरी प्रक्रिया का बन गया है।

हजूर 👉 असली पेंच अब ‘टूर डायरी बनाम सरकारी फाइल’ का है। किसी अधिकारी के पूरे साल के काम का मूल्यांकन हुआ तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि उस मूल्यांकन के पीछे जमीन की जानकारी कितनी थी। क्या संबंधित वन क्षेत्रों, निर्माण कार्यों, योजनाओं और विवादित मामलों का मौके पर जाकर निरीक्षण किया गया? क्या रिपोर्टों की वास्तविकता को धरातल पर परखा गया? या फिर देहरादून की फाइलों, नोटशीट और अधीनस्थ अधिकारियों की रिपोर्टों के आधार पर ही तस्वीर तैयार कर ली गई? टूर डायरी में दर्ज तारीखें और स्थान इस सवाल का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। यदि संबंधित मामलों से जुड़े स्थलीय निरीक्षण दर्ज हैं तो एक तस्वीर सामने आएगी👉 यदि नहीं हैं तो यह सवाल जरूर उठेगा कि मूल्यांकन का जमीनी आधार आखिर क्या था।

हजूर 👉 जिन प्रकरणों का इस विवाद के संदर्भ में उल्लेख किया जा रहा है, उनमें मुनस्यारी का लगभग 1.7 करोड़ रुपये का ईको हट निर्माण, मसूरी वन प्रभाग में बड़ी संख्या में सीमा स्तंभों के कथित रूप से गायब होने का मामला तथा बाहरी नर्सरियों से पौध खरीद और मियावाकी रोपण जैसे विषय शामिल बताए जा रहे हैं। इन मामलों की वास्तविकता का अंतिम निष्कर्ष संबंधित सरकारी जांच और न्यायिक रिकॉर्ड से ही निकलेगा, लेकिन सवाल बड़ा है👉क्या इन मामलों की जमीनी हकीकत को मौके पर जाकर भी परखा गया था? क्योंकि फाइल में दर्ज निर्माण और जमीन पर खड़ा निर्माण एक ही चीज नहीं होते, कागज पर दर्ज पौधरोपण और जंगल में बची हरियाली भी हमेशा एक जैसी नहीं होती और रिकॉर्ड में दर्ज सीमा स्तंभों तथा मौके पर मौजूद सीमा स्तंभों के बीच का अंतर भी केवल फाइल देखकर नहीं समझा जा सकता।

हजूर 👉 उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह सवाल और ज्यादा गंभीर हो जाता है। यहां जंगलों की दुर्गमता, पहाड़ी भूगोल और विशाल वन क्षेत्र किसी भी अधिकारी के लिए चुनौती हैं। लेकिन यही कारण है कि जमीन पर जाकर निरीक्षण का महत्व भी बढ़ जाता है। सचिवालय की फाइल किसी योजना की लागत, स्वीकृति और रिपोर्ट बता सकती है, मगर जंगल की पगडंडी यह बताती है कि योजना वास्तव में जमीन पर कितनी उतरी। इसलिए अगर किसी अधिकारी की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन ऐसे मामलों से प्रभावित हुआ है, तो यह जानना जरूरी होगा कि मूल्यांकनकर्ता के पास उपलब्ध जानकारी केवल कागजी थी या उसमें प्रत्यक्ष स्थलीय निरीक्षण का भी ठोस आधार शामिल था।

हजूर 👉 अब सवाल सीधे 9.74 बनाम 9.30 पर आ टिकता है। देखने में यह केवल कुछ अंकों का अंतर है, लेकिन एसीआर/कार्य निष्पादन रिपोर्ट किसी अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इसलिए ग्रेडिंग में बदलाव का आधार, कारण और प्रक्रिया तीनों महत्वपूर्ण हैं। कैट के समक्ष यदि संबंधित पत्रावलियां आती हैं तो यह देखना अहम होगा कि ग्रेडिंग में बदलाव किन तथ्यों के आधार पर किया गया, किन रिपोर्टों को महत्व दिया गया, कौन-सी टिप्पणियां निर्णायक रहीं और क्या संबंधित अधिकारी के कार्यों के बारे में उपलब्ध सामग्री की स्वतंत्र पुष्टि की गई थी। सवाल किसी को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह जानने का है कि प्रशासनिक निर्णय की नींव कितनी मजबूत और दस्तावेजी थी।

हजूर 👉 इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ टूर डायरी की तारीखों और फाइलों की तारीखों का मिलान हो सकता है। मान लीजिए किसी मामले में स्थलीय निरीक्षण या समीक्षा को आधार बनाया गया👉तो टूर डायरी में उसका दौरा, स्थान और अवधि क्या दर्ज है? संबंधित निरीक्षण रिपोर्ट कब बनी? रिपोर्ट किस अधिकारी ने तैयार की? एसीआर में उससे जुड़ी टिप्पणी कब दर्ज हुई? इन तारीखों की कड़ी अगर एक-दूसरे से जुड़ती है तो प्रशासनिक प्रक्रिया की तस्वीर मजबूत होगी। लेकिन यदि कहीं तारीखें आपस में मेल नहीं खातीं या किसी महत्वपूर्ण प्रकरण का जमीनी निरीक्षण रिकॉर्ड ही सामने नहीं आता, तो वह अपने आप में किसी गड़बड़ी का अंतिम प्रमाण नहीं होगा, मगर निश्चित रूप से जवाब मांगने वाला प्रशासनिक सवाल जरूर बनेगा।

हजूर 👉 इसलिए अब जरूरत किसी आरोप की नहीं, बल्कि रिकॉर्ड को आमने-सामने रखकर सच पढ़ने की है। टूर डायरी, एसीआर की मूल प्रविष्टियां, ग्रेडिंग में बदलाव से जुड़े कारण, जांच रिपोर्ट, नोटशीट, पत्राचार और निरीक्षण संबंधी दस्तावेज👉इन सबका एक साथ अध्ययन ही बताएगा कि फैसला किस आधार पर लिया गया। उत्तराखंड की जनता को किसी अधिकारी के पक्ष या विपक्ष में फैसला सुनाने की जरूरत नहीं है; उसे सिर्फ यह जानने का अधिकार है कि सरकारी निर्णय पारदर्शी प्रक्रिया से हुआ या नहीं। अगर रिकॉर्ड साफ है तो सवालों का जवाब भी साफ होना चाहिए और अगर रिकॉर्ड में विरोधाभास है तो उसकी जांच भी उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।

हजूर 👉 अब नजर कैट के सामने आने वाले रिकॉर्ड पर है। यही दस्तावेज बताएंगे कि मामला महज 9.74 और 9.30 के बीच की ग्रेडिंग का है या इसके पीछे प्रशासनिक मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। अगर टूर डायरी, निरीक्षण रिपोर्ट और एसीआर एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी; लेकिन अगर फाइल कुछ और कहती है और दौरे का रिकॉर्ड कुछ और, तो फिर सवालों की अगली कड़ी स्वाभाविक रूप से सामने आएगी। आखिर देहरादून की वातानुकूलित फाइलों में जंगल कितना था और जंगल की जमीन पर देहरादून कितना पहुंचा? इस यक्ष प्रश्न का जवाब किसी बयान से नहीं, बल्कि दस्तावेजों से निकलेगा। जब रिकॉर्ड खुलेगा, तब तारीखें बोलेंगी, दौरे बोलेंगे, निरीक्षण बोलेंगे और शायद वह प्रशासनिक सच भी सामने आएगा, जिसकी तलाश आज पूरे उत्तराखंड को है।

 

उपरोक्त आर्टिकल का दमदार चित्र बना दीजिये 220 kb का संजीव चतुर्वेदी कि फोटो सम्ययोजित कर लीजिये

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