जंगल जासूस 👉
हजूर 👉93 की उम्र में 5 एकड़ का घना जंगल खड़ा करने वाली जिद्दी दादी की कहानी पढ़कर बड़े-बड़े सुरमाओं के पसीने छूट जाएंगे
हजूर 👉 जिस उम्र में लोग खाट पकड़कर अपनी पुरानी बीमारियों का रोना रोते हैं, उस उम्र में केरल के अलप्पुझा जिले के मुतुकुलम गांव की 93 साल की देवकी अम्मा हाथ में कुल्हाड़ी और फावड़ा लेकर 5 एकड़ के जंगल की रखवाली करती हैं। चार दशक पहले एक भीषण सड़क हादसे के बाद डॉक्टरों ने उन्हें ताउम्र बिस्तर पर रहने और भारी काम न करने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने डॉक्टरों की हिदायत को ठेंगे पर रखकर अपने आंगन में पहला पौधा रोप दिया। गांव वाले उन्हें पागल समझकर ताने मारते थे कि बिस्तर पर आराम करने के बजाय यह औरत गोबर और मिट्टी में हाथ क्यों गंदे कर रही है, पर अम्मा ने उन्हीं तानों को अपनी खाद बनाया और देखते ही देखते 3,000 से ज्यादा पेड़ों का ऐसा हरा-भरा साम्राज्य खड़ा कर दिया जहाँ आज दिन में भी सूरज की किरणें ज़मीन को छूने के लिए तरसती हैं।
हजूर 👉 इस 5 एकड़ के जंगल का मिज़ाज भी बड़ा दिलचस्प है, जहाँ न तो कभी बाज़ार की कोई रासायनिक खाद डाली गई और न ही कोई कीटनाशक छिड़का गया। देवकी अम्मा के इस ‘कावु’ यानी पवित्र जंगल में सागौन, महोगनी और चंदन के विशाल पेड़ों के साथ-साथ ऐसी-ऐसी दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियाँ मौजूद हैं जिन्हें ढूँढने में वैज्ञानिकों की चप्पलें घिस जाएँ। मजे की बात यह है कि अम्मा ने इस जंगल से एक भी फल या लकड़ी बेचकर कभी अपनी जेब भरने की कोशिश नहीं की। उनका सीधा फंडा है कि जब पेड़ परिंदों और बेजुबानों के लिए लगाए हैं, तो इंसानी लालच के लिए इन्हें क्यों बेचना? आज उनके इस जंगल में सौ से ज़्यादा प्रजातियों के देसी और विदेशी पक्षी रोज़ रंग-बिरंगी महफ़िल सजाते हैं।
हजूर 👉 असली तमाशा तो तब देखने लायक हुआ जब भीषण गर्मी के दिनों में पानी की बूंद-बूंद को तरसते गांव वालों को यह अहसास हुआ कि जिस महिला को वे सिरफिरी औरत कहकर हंसते थे, उसने अकेले दम पर पूरे इलाके के गिरते जलस्तर को बचा लिया है। जहाँ आसपास के कुएँ सूख रहे थे, वहीं अम्मा का यह 5 एकड़ का इलाका एक ठंडे टापू की तरह लबालब भरा हुआ था। इसके बाद तो प्रशासनिक गलियारों में भी हड़कंप मच गया और जब वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च ‘नारी शक्ति पुरस्कार’ से नवाजा, तो वही ताने मारने वाले गांव वाले राष्ट्रपति भवन की तस्वीरें देखकर तालियां बजा रहे थे। हालांकि, अम्मा को इस सरकारी तामझाम से कोई खास फर्क नहीं पड़ा👉वे दिल्ली से लौटते ही सबसे पहले अपने पेड़ों को पानी देने पहुँच गईं, क्योंकि वे जानती हैं कि तमगों से हवा साफ नहीं होती।
हजूर 👉 आज के दौर में जब पर्यावरण संरक्षण के नाम पर केवल पौधारोपण के आंकड़े चमकाए जाते हैं और बड़े-बड़े सम्मेलनों में लंबे भाषण दिए जाते हैं, तब देवकी अम्मा की यह मेहनत हर किसी के लिए एक कड़ा सबक है। हर साल लाखों पौधे कागजों और तस्वीरों में तो लग जाते हैं, लेकिन उनमें से कितने पेड़ बन पाते हैं, इसका हिसाब कोई नहीं रखता। अम्मा ने दुनिया को दिखाया कि पौधा लगाना तो बस एक आसान शुरुआत है, असली परीक्षा उसे वर्षों तक किसी अपने बच्चे की तरह सींचकर वन का स्वरूप देने वाले धैर्य में होती है। उन्होंने अपनी पेंशन और जमापूंजी का बड़ा हिस्सा इसी हरियाली की सुरक्षा में लगाकर यह साबित किया कि नीयत साफ हो तो संरक्षण के लिए किसी बड़े बजट की जरूरत नहीं होती।
हजूर 👉 आज नब्बे का आंकड़ा पार करने के बाद भी जब शरीर कमजोर पड़ने लगता है और घुटने जवाब दे जाते हैं, तब भी यह शेरदिल दादी हर सुबह अपनी लकड़ी के सहारे जंगल की गश्त पर निकलती हैं। वे हर विशाल पेड़ को छूकर उसका हालचाल ऐसे पूछती हैं जैसे कोई मां अपने बच्चों की खैरियत ले रही हो। देवकी अम्मा का यह तेवर उन तमाम लोगों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो पर्यावरण बचाने का ढोंग तो करते हैं, पर एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करना भूल जाते हैं। इस जिद्दी दादी ने यह साबित कर दिखाया कि अगर कलेजे में कुछ कर गुजरने का जुनून हो और कुदरत से बेपनाह मोहब्बत हो, तो उम्र सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाती है और एक अकेला इंसान भी धरती की तकदीर बदल सकता है।



