जंगल जासूस 👉
हजूर 👉वन विभाग के संविदा कर्मियों के हक और अदालती अवमानना पर बड़ा प्रशासनिक मोड़
हजूर 👉 उत्तराखंड के प्रशासनिक और न्यायिक हलकों में वन विभाग के संविदा तथा आउटसोर्स कर्मचारियों की लंबित मांगों का प्रकरण इस समय अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर है। वर्ष 2014-15 से निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे कर्मचारियों का यह मामला केवल आर्थिक देयकों अथवा वेतन विसंगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था में अवसर की समानता, संस्थागत पारदर्शिता और न्यायिक आदेशों के समयबद्ध अनुपालन की मूल भावना से भी सीधा संबंध रखता है।
हजूर 👉 कर्मचारियों का मुख्य पक्ष यह है कि वे एक लंबी अवधि से विभाग की विविध और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें उन बुनियादी सुविधाओं और सेवा लाभों से वंचित रखा गया है, जिनके वे स्वयं को हकदार मानते हैं। इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘समान कार्य के बदले समान वेतन’ का सिद्धांत और कर्मचारी भविष्य निधि का अधिकार है। कर्मचारियों के दृष्टिकोण से ईपीएफ केवल कोई कागजी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उनकी बरसों की निष्ठापूर्ण सेवा के बाद सामाजिक और वित्तीय सुरक्षा की एक अनिवार्य गारंटी है।
हजूर 👉 कर्मचारियों द्वारा अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए पूर्व में उच्च न्यायालय की शरण ली गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने 19 मार्च 2026 को एक स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किया था। अदालत ने कर्मचारियों को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपना विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया था, साथ ही संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को यह निर्देशित किया था कि वे नियत समयसीमा के भीतर कानून के प्रावधानों के अनुसार इस पर न्यायसंगत निर्णय लें।
हजूर 👉 हालाँकि, कर्मचारियों का आरोप है कि अदालत द्वारा निर्धारित समयसीमा समाप्त हो जाने के उपरांत भी प्रशासनिक स्तर पर उनके प्रत्यावेदन पर कोई ठोस कार्रवाई या निर्णय नहीं लिया गया। इसी प्रक्रियात्मक विलंब के कारण कर्मचारियों को अवमानना याचिका दायर करने का मार्ग चुनना पड़ा। याचिकाकर्ताओं ने 16 अगस्त 2017 के शासकीय आदेश का विशेष उल्लेख किया है, जिसमें उपनल और अन्य आउटसोर्स माध्यमों से तैनात कर्मियों के मध्य निष्पक्षता और एक समान नीति अपनाए जाने का प्रावधान निहित है।
हजूर 👉 प्रकरण की सुनवाई न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ के समक्ष संपन्न हुई। न्यायिक आदेश के अनुपालन में हुए विलंब को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने उत्तराखंड वन विभाग के प्रमुख सचिव आर.के. सुधांशु तथा प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) कपिल लाल को अवमानना नोटिस जारी कर दिया है। न्यायालय ने अधिकारियों को 28 अक्टूबर तक अपना आधिकारिक पक्ष और हलफनामा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
हजूर 👉 अब संपूर्ण विषय की जवाबदेही विभागीय तंत्र पर निर्भर है। आगामी 28 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई के दौरान विभाग को न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि 19 मार्च के आदेश के अनुपालन में क्या प्रशासनिक कदम उठाए गए, निर्णय प्रक्रिया में विलंब के क्या कारण रहे, और कर्मचारियों की वेतन समानता तथा ईपीएफ संबंधी मांगों पर शासन का वास्तविक और वैधानिक रुख क्या है।

