हजूर 👉वन निगम में ‘कछुआ छाप’ पारदर्शिता👉जब एक ही आदमी जंगल में कुल्हाड़ी भी चलाए और फैक्ट्री में मशीन भी!

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जंगल जासूस 👉

हजूर 👉वन निगम में ‘कछुआ छाप’ पारदर्शिता👉जब एक ही आदमी जंगल में कुल्हाड़ी भी चलाए और फैक्ट्री में मशीन भी!

हजूर 👉उत्तराखंड वन विकास निगम में भ्रष्टाचार के मस्टर रोल का ऐसा तिलस्मी खेल सामने आया है कि अलिफ-लैला की कहानियां भी फीकी पड़ जाएं। सरकारी खजाने से मजदूरों के नाम पर करोड़ों रुपये का भुगतान तो तीन-चार साल पहले से ही हर महीने दर्ज होता रहा है, लेकिन जैसे ही कोई जागरूक नागरिक इन मजबूत कंधों वाले मजदूरों के नाम और पते पूछ बैठता है, वैसे ही पारदर्शिता की गाड़ी में अचानक ब्रेक लग जाते हैं। सूचना देने के नाम पर वन निगम के अफसर कछुए की चाल चलकर ऐसा बर्ताव करने लगते हैं मानो उनसे कोई गुप्त रक्षा सौदे का दस्तावेज मांग लिया गया हो।

हजूर 👉इस पूरे फर्जीवाड़े का सबसे मजेदार पन्ना उन सुपरमैन मजदूरों की दास्तान है, जो एक ही समय में दो अलग-अलग जगहों पर मौजूद रहकर पसीना बहा रहे थे। वन निगम के सरकारी कागजात गवाही दे रहे हैं कि अमुक मजदूर घने जंगलों में सागौन आदि के भारी-भरकम लट्ठे ढो रहा था। लेकिन वहीं जब शहर की एक निजी फैक्ट्री का हाजिरी रजिस्टर खंगाला गया, तो पता चला कि वही इंसान ठीक उसी तारीख और उसी शिफ्ट में फैक्ट्री के भीतर मशीन पर काम कर रहा था। अब सवाल यह नहीं है कि मजदूर कितना मेहनती था, सवाल यह है कि एक ही हाड़-मांस का पुतला एक ही वक्त पर जंगल की बीहड़ झाड़ियों में और शहर की फैक्ट्री में एक साथ कैसे उपस्थित हो सकता है?

हजूर 👉या तो वह मजदूर कोई चमत्कारी सिद्ध पुरुष है जो एक साथ दो रूपों में प्रकट हो सकता है, या फिर वन निगम के कागजों पर चल रही है भूतिया मजदूरों की फौज। यानी इंसान कहीं और काम कर रहा है, और उसके नाम का मस्टर रोल भरकर पूर्व में वन निगम में तैनात रहे साहब लोग अपनी जेबें गर्म कर चुके हैं।

हजूर 👉जब आरटीआई के तहत इन चमत्कारी मजदूरों का सच पूछा जाता है, तो अफसरों को अचानक निजता का कानून याद आने लगता है। दलील दी जाती है कि मजदूरों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। अरे साहब, जनता किसी मजदूर के घर का गुप्त पता या उसकी व्यक्तिगत जिंदगी का हाल नहीं पूछ रही! जनता बस यह जानना चाहती है कि जिस सरकारी खजाने में उसका टैक्स जमा होता है, उस खजाने से निकला पैसा असली मजदूर के पेट में गया या किसी बड़े अफसर के स्विस बैंक जैसे गुप्त लॉकर में? बैंक खाता नंबर के गोपनीय अंक छिपाकर (मास्क करके) भी यह बताया जा सकता है कि मस्टर रोल संख्या फलां पर कितनी रकम स्वीकृत हुई और किसे दी गई।

हजूर 👉कहानी सिर्फ दोहरी हाजिरी तक सीमित नहीं है। धरातल पर जांच करने पहुंचिए तो पता चलता है कि जहां कागजों पर तीस-चालीस मजदूरों की पूरी सेना तैनात दिखाई गई थी, वहां मौके पर सिर्फ दो-चार स्थानीय लोग ही काम करते मिले। कागजी पन्नों पर मजदूरों की लंबी-चौड़ी लिस्ट बनाकर लाखों का बजट डकार लिया गया और जब काम की नाप-जोख की बात आई, तो माप पुस्तिका (एमबी बुक) पर भी आंख मूंदकर दस्तखत पेल दिए गए।

हजूर 👉शिकायतकर्ताओं ने जब सबूतों के साथ फाइलों का पुलिंदा आला अधिकारियों के सामने पटका, तो जांच का नाटक शुरू हुआ। लेकिन यह जांच भी अजीब है👉फाइल एक मेज से उठकर दूसरी मेज पर जाती है, फिर तीसरी मेज पर जाकर सो जाती है। ऐसा लगता है मानो जांच अधिकारियों का मुख्य मकसद सच खंगालना नहीं, बल्कि फाइल को घुमा-घुमाकर मामले को ठंडा करना है।

हजूर 👉अब वन निगम के हुक्मरानों को शीशे के सामने खड़े होकर इस सीधे सवाल का जवाब देना ही होगा कि पिछले दो सालों में जिन करोड़ों रुपयों का मजदूरी भुगतान हुआ था, उनके असली हकदार कौन थे? उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि जिन अधिकारियों ने फर्जी मस्टर रोल पर अपने दस्तखत की मुहर लगाई, उन पर कार्रवाई कब होगी और क्या निगम में बैठे जिम्मेदार अधिकारी उन संदिग्ध मजदूरों और फैक्ट्री के हाजिरी रजिस्टरों का आमने-सामने मिलान कराने की हिम्मत दिखाएंगे?

हजूर 👉अगर कागजात पूरी तरह साफ हैं, तो फिर इन्हें अलमारी में बंद रखने का डर कैसा? और अगर कागजों का यह तिलस्म यूं ही बना रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब जंगल के जानवर भी वन निगम के दफ्तर के बाहर तख्ती लेकर खड़े नजर आएंगे कि ‘साहब, इंसानों का तो पता नहीं, जरा यह बता दो कि दो जगह हाजिरी लगाने वाली यह कौन सी सरकारी ड्यूटी है!’

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