पहाड़ जल रहे हैं, और वन विभाग हर साल आग के पीछे दौड़ रहा है!

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हजूर👉उत्तराखंड के पहाड़ों में गर्मी आते ही जंगलों का धुआं उठना अब कोई नई बात नहीं रही, लेकिन 580 आग की घटनाएं और 500 हेक्टेयर से अधिक जंगल का प्रभावित होना यह जरूर पूछ रहा है कि आखिर हमारी तैयारी में कमी कहां है। सबसे ज्यादा चिंता चीड़ के जंगलों को लेकर है, जहां सूखा पिरूल आग को फैलाने का काम करता है। आग लगते ही मौसम, कम बारिश, तेज हवा और ग्रामीणों की लापरवाही को कारण बता देना आसान है, लेकिन जनता का सवाल इससे बड़ा है👉जब विभाग को हर साल पहले से पता है कि गर्मियों में किन जंगलों में आग का खतरा सबसे ज्यादा रहता है, तो फिर आग लगने के बाद ही मशीनरी क्यों जागती है? आग बुझाने की व्यवस्था जरूरी है, लेकिन आग को भड़कने से पहले रोकने की तैयारी उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।

हजूर 👉हाल में सामने आए वैज्ञानिक अध्ययन ने इस पूरे मामले को एक अलग नजरिये से देखने का मौका दिया है। ‘जब रोपे गए जंगल, रोपे हुए जंगल जैसे दिखना बंद कर देते हैं’ शीर्षक वाला अध्ययन यह संकेत देता है कि समय के साथ पुराने रोपे गए वन देखने में प्राकृतिक जंगल जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनकी संरचना और पारिस्थितिक भूमिका अलग हो सकती है। उत्तराखंड के जंगलों को समझते समय अंग्रेजी शासन की वन नीति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उस दौर में जंगलों को बड़े पैमाने पर लकड़ी और राजस्व की जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया गया। आज अंग्रेजी शासन नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हमने जंगलों को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल लिया है? अगर जंगल सिर्फ पेड़ों की संख्या और हरित क्षेत्र के आंकड़ों से मापा जाएगा, तो उसकी जैव-विविधता, प्राकृतिक पुनर्जनन और आग के खतरे को कौन मापेगा?

हजूर 👉आग के लिए सिर्फ चीड़ को दोष देना भी आधा सच है। चीड़ का सूखा पिरूल निश्चित रूप से आग के फैलाव में बड़ी भूमिका निभाता है, लेकिन असली खतरा जमीन पर जमा सूखी पत्तियों, घास, टहनियों और दूसरी ज्वलनशील सामग्री का है। कम नमी, तेज हवा और पहाड़ की ढलान इस सूखे ईंधन को चिंगारी मिलते ही दावानल में बदल देते हैं। सवाल यह है कि जिन क्षेत्रों में विभाग को पहले से पता है कि सूखा ईंधन ज्यादा जमा है, वहां समय रहते उसका प्रबंधन क्यों नहीं होता? हर साल आग लगने के बाद कर्मचारियों को जंगल में भेजने से बेहतर क्या यह नहीं होगा कि आग लगने से पहले ही संवेदनशील क्षेत्रों को तैयार किया जाए? अगर रोकथाम मजबूत होगी तो आग बुझाने की नौबत भी कम आएगी।

हजूर 👉ग्रामीणों को लेकर भी विभाग को अपनी रणनीति पर थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा। आगजनी करने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन हर आग के बाद पूरे ग्रामीण समाज को शक की निगाह से देखना भी उचित नहीं। पहाड़ी ग्रामीणों का जंगल से रिश्ता केवल लकड़ी और चारे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पीढ़ियों से वे जंगल की परिस्थितियों को सबसे करीब से देखते आए हैं। कई क्षेत्रों में चारा, घास और सूखी लकड़ी के पारंपरिक उपयोग से जमीन पर जमा जैविक सामग्री भी कम होती थी। आज अगर जंगल और गांव के बीच दूरी बढ़ी है तो वन विभाग को यह भी देखना होगा कि स्थानीय लोगों को आग रोकने की व्यवस्था में साझेदार कैसे बनाया जाए। केवल आरोप लगाने से जंगल नहीं बचेंगे, लोगों को साथ लेकर चलना पड़ेगा।

हजूर 👉जलवायु परिवर्तन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बढ़ता तापमान, लंबे सूखे दौर और वर्षा के बदलते स्वरूप ने जंगल की आग का खतरा बढ़ाया है। लेकिन मौसम को हर समस्या का जवाब बना देना भी ठीक नहीं। वन विभाग की असली परीक्षा आग लगने के बाद नहीं, आग लगने से पहले होनी चाहिए। संवेदनशील क्षेत्रों में सूखी सामग्री का प्रबंधन कितना हुआ, अग्नि रेखाएं कितनी तैयार हैं, निगरानी व्यवस्था कितनी मजबूत है, गांवों को कितनी जिम्मेदारी दी गई और आग की सूचना मिलने के बाद शुरुआती समय में कार्रवाई कितनी तेज होती है👉इन सवालों के जवाब जमीन पर दिखाई देने चाहिए। जनता यह भी जानना चाहेगी कि आग बुझाने पर होने वाले खर्च और आग रोकने की तैयारी पर होने वाले खर्च में कितना अंतर है। आखिर हर साल आग का मौसम आता है तो तैयारी भी हर साल उससे पहले क्यों नहीं पूरी होती?

हजूर 👉अब सरकार के सामने असली चुनौती सिर्फ आग बुझाने की नहीं, जंगल की संरचना सुधारने की है। बांज, बुरांश और दूसरी स्थानीय चौड़ी पत्ती वाली प्रजातियों का संरक्षण और प्राकृतिक पुनर्जनन जरूरी है, लेकिन हर जगह चीड़ हटाना भी समाधान नहीं। जहां चीड़ का अत्यधिक फैलाव आग के खतरे को बढ़ाता है, वहां वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर स्थानीय और मिश्रित वन संरचना विकसित की जा सकती है। पौधारोपण के आंकड़े और तस्वीरें अपनी जगह हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि लगाए गए पौधों में से कितने वर्षों बाद जीवित हैं और कितने वास्तव में जंगल का हिस्सा बने। जंगल जासूस का सवाल सरकार और वन विभाग से बस इतना है👉जब 580 आग की घटनाएं और 500 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल का नुकसान सामने आ चुका है, तो क्या अगली गर्मी का इंतजार किया जाएगा या इस बार आग से पहले ही जंगल की असली सफाई और तैयारी शुरू होगी? क्योंकि हर साल आग बुझाने के बाद सफलता का दावा करना आसान है, लेकिन आग को पहले ही रोक देना ही असली सफलता होगी।