जंगल जासूस 👉
हजूर 👉आखिर कब मिलेगी 67 मेडलवीरों की प्रोत्साहन राशि? मैदान जीत गए, फाइल कब जीतेगी?
हजूर 👉उत्तराखंड के वनकर्मी जंगल की पगडंडी पर गश्त करें या खेल के मैदान में उतरें, अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाते हैं। 28वीं अखिल भारतीय वन क्रीड़ा प्रतियोगिता में राज्य के खिलाड़ियों ने 21 स्वर्ण, 26 रजत और 20 कांस्य सहित कुल 67 पदक हासिल कर प्रदेश का नाम रोशन किया। पिछली प्रतियोगिता के 52 पदकों के मुकाबले यह प्रदर्शन बेहतर रहा और उत्तराखंड पदक तालिका में छठे स्थान पर पहुंचा। लगभग 14 साल बाद राज्य को इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता की मेजबानी का अवसर मिला था। मंच पर खिलाड़ियों की उपलब्धि की सराहना हुई, पीठ थपथपाई गई और बधाई संदेश जारी किए गए। लेकिन आयोजन संपन्न होने के बाद अब खिलाड़ियों के सामने सबसे मुख्य सवाल यही है कि उनके लिए प्रस्तावित प्रोत्साहन राशि की प्रक्रिया वर्तमान में किस चरण में है।
हजूर 👉मैदान में खिलाड़ियों ने सेकेंडों के फासले से जीत दर्ज की, लेकिन पुरस्कार राशि की प्रशासनिक प्रक्रिया अभी भी प्रगति पर है। उपलब्ध प्रकाशित जानकारियों के अनुसार, वन मुख्यालय द्वारा पदक विजेताओं के लिए स्वर्ण पदक पर 25 हजार रुपये, रजत पर 15 हजार रुपये और कांस्य पर 10 हजार रुपये की नकद प्रोत्साहन राशि का प्रस्ताव शासन को भेजा गया था। यदि इन दरों के आधार पर 21 स्वर्ण, 26 रजत और 20 कांस्य पदकों का हिसाब लगाया जाए, तो कुल संभावित राशि 11.15 लाख रुपये बैठती है👉जिसमें स्वर्ण के लिए 5.25 लाख, रजत के लिए 3.90 लाख और कांस्य के लिए 2 लाख रुपये शामिल हैं। यह गणना केवल चर्चित एवं प्रस्तावित दरों पर आधारित है, इसे वास्तविक भुगतान का विवरण नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि, कर्मचारियों और खिलाड़ियों के बीच मुख्य सवाल यही बना हुआ है कि इस प्रस्ताव पर प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति की अद्यतन स्थिति क्या है।
हजूर 👉उत्तराखंड वन रेंजर संघ के अध्यक्ष नवीन पवार ने भी खिलाड़ियों को समयबद्ध प्रोत्साहन दिए जाने का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि पदक विजेताओं को सम्मान राशि के साथ-साथ मानक स्पोर्ट्स किट और नियमित अभ्यास के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। पवार ने वर्ष 2012 का उदाहरण देते हुए कहा है कि तत्कालीन वन प्रमुख आर.बी.एस. रावत और तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (नैनीताल) परमजीत सिंह पम्मा के समय एफटीआई में कार्यरत कई वनकर्मियों को खेलों में बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई थी। यह दावा विभागीय अभिलेखों के अवलोकन से सत्यापित हो सकता है। पवार का तर्क है कि यदि पूर्व में खेल प्रोत्साहन की व्यवस्थाएं संचालित थीं, तो वर्तमान पदक विजेताओं के लिए भी स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
हजूर 👉मामला खेल कोटे से नियुक्त वनकर्मियों की कार्य व्यवस्था से भी जुड़ा है। नवीन पवार के अनुसार, जिन कर्मचारियों की भर्ती खेल प्रतिभा के आधार पर की गई है, उन्हें प्रतियोगिताओं की तैयारी के लिए आवश्यक संसाधन और अभ्यास के लिए अलग से समय दिया जाना जरूरी है। वर्तमान में वनकर्मियों के सामने जंगल की सुरक्षा, गश्त, वन अपराध नियंत्रण और वन्यजीव निगरानी जैसी मैदानी जिम्मेदारियां रहती हैं। ऐसे में यदि खेल कोटे के कर्मियों को भी निरंतर केवल सामान्य विभागीय ड्यूटी में व्यस्त रखा जाएगा, तो राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए उनकी तैयारी प्रभावित हो सकती है। इसलिए विभाग द्वारा ड्यूटी और खेल अभ्यास के बीच एक सुव्यवस्थित संतुलन बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
हजूर 👉प्रशासनिक स्तर पर खिलाड़ियों की उत्सुकता इस बात को लेकर है कि क्या प्रस्ताव को वित्तीय मंजूरी मिल चुकी है या फाइल अभी विचाराधीन है। यदि प्रक्रिया जारी है, तो भुगतान की संभावित समयसीमा क्या होगी? विभाग की ओर से इस संबंध में स्थिति स्पष्ट किए जाने से खिलाड़ियों का अनिश्चितता का माहौल समाप्त हो सकेगा।
हजूर 👉इसके साथ ही, आयोजन के कुल बजट और वित्तीय निष्पादन का विवरण भी प्रशासनिक पारदर्शिता की दृष्टि से प्रासंगिक है। इस आयोजन में 42 टीमों के लगभग 3,390 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिसके लिए परिवहन, भोजन, आवास, खेल ढांचा, मीडिया और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं हेतु विभिन्न समितियां गठित की गई थीं। उपलब्ध ई-टेंडर दस्तावेजों में परिवहन व्यवस्था के टेंडर में 8 लाख रुपये की ईएमडी का उल्लेख है, जबकि टेंडर वैल्यू ‘NA’ प्रदर्शित है। अतः इसे वास्तविक व्यय नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार, कैम्पा (कैम्पा ) के एक आधिकारिक रिकॉर्ड में इस आयोजन के लिए 20 लाख रुपये का प्रस्ताव दर्ज दिखता है, जिसके सामने नोट अप्रूव्ड अंकित है। इसलिए इसे भी स्वीकृत व्यय बताना तथ्यात्मक नहीं होगा। वास्तविक स्थिति स्पष्ट होने के लिए आयोजन पर हुए कुल स्वीकृत बजट, मदवार भुगतान और अंतिम वित्तीय विवरण का आधिकारिक बही-खाता सामने आना आवश्यक है।
हजूर 👉प्रतिस्पर्धात्मक परिदृश्य को देखें तो 150 पदकों के साथ छत्तीसगढ़ ने ओवरऑल चैंपियनशिप हासिल की, जबकि उत्तराखंड छठे स्थान पर रहा। राज्य की इस उपलब्धि को बनाए रखने और भविष्य में सुधार करने के लिए संस्थागत ढांचा मजबूत करना होगा। इसमें वार्षिक खेल कैलेंडर का निर्माण, प्रभाग व सर्किल स्तर पर प्रतिभाओं का चयन, नियमित फिटनेस कैंप, मानक खेल किट और अभ्यास के लिए समय का आवंटन शामिल है। जहां तक अन्य राज्यों द्वारा दी जाने वाली व्यक्तिगत नकद प्रोत्साहन राशि का सवाल है, आधिकारिक राज्यवार दस्तावेज सामने आने के बाद ही तुलनात्मक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
हजूर 👉अंततः मूल विषय 11.15 लाख रुपये की संभावित राशि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन वनकर्मियों के समर्पण और मेहनत के समयबद्ध सम्मान से जुड़ा है जो दुर्गम परिस्थितियों में ड्यूटी करने के साथ-साथ खेल के मैदान में राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। खिलाड़ी मैदान पर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुके हैं; अब विभाग द्वारा प्रोत्साहन राशि की स्थिति, खेल सुविधाओं के प्रावधान और आयोजन के अंतिम वित्तीय विवरण को स्पष्ट किए जाने का इंतजार है।

