हजूर 👉कॉर्बेट में बदला हवा का रुख👉 आलीशान रिजॉर्ट्स को ठेंगा दिखा जमौरिया गांव लिखेगा पर्यटन की नई पटकथा!

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👉जंगल जासूस 👉

हजूर 👉कॉर्बेट में बदला हवा का रुख👉आलीशान रिजॉर्ट्स को ठेंगा दिखा जमौरिया गांव लिखेगा पर्यटन की नई पटकथा!

हजूर 👉 कॉर्बेट की दुर्गम झाड़ियों और ढिकुली की सर्द हवाओं के बीच बसे जमौरिया गांव में इन दिनों कुछ ऐसा पक रहा है, जिसकी महक पूरे प्रशासनिक अमले से लेकर पर्यटन के सौदागरों तक को बेचैन कर रही है। बरसों से बाघों की दहाड़ से सिहरने और हाथियों के खौफ में जागने वाले ग्रामीणों के दिन अब अचानक बदलने वाले हैं। कॉर्बेट की पगडंडियों पर बरसों से राज करने वाले बड़े-बड़े रिजॉर्ट्स और आलीशान होटलों के एकाधिकार में अब जमौरिया गांव सीधी सेंध लगाने की तैयारी कर चुका है। जंगल वही है, खूंखार वन्यजीव वही हैं, लेकिन इस बार खेल की बिसात ऐसी बिछाई गई है कि सैलानियों का पैसा अब बड़े-बड़े होटलों के तिजोरियों में जाने के बजाय सीधे गांव की कच्ची-पक्की चौखटों पर बरसेगा।

हजूर 👉 पार्क प्रशासन ने जमौरिया के पचास से ज्यादा परिवारों को मोहरा बनाकर ऐसा दांव खेला है, जिसने आसपास के पूरे इलाके की हलचल बढ़ा दी है। जिन हाथों में कल तक सिर्फ कुल्हाड़ी और घास के बंडल हुआ करते थे, अब उन्हीं हाथों को बर्ड वॉचिंग की दूरबीन थमाने और मेहमाननवाजी का हुनर सिखाने की चाल चली जा रही है। यानी जिस ग्रामीण ने जिंदगी भर जंगलों के खतरों को बहुत करीब से झेला है, वही अब विदेशी और देसी सैलानियों की उंगली पकड़कर जंगल की अनकही दास्तानें सुनाएगा। दूरबीन से उड़ती चिड़िया दिखाकर और बाघ की चाल-ढाल का राज खोलकर अपनी किस्मत खुद लिखने की यह शुरुआत सचमुच किसी हैरतअंगेज मोर्चे से कम नहीं है।

हजूर 👉 इस पूरे घटनाक्रम में सबसे तीखा और सनसनीखेज तड़का है होम स्टे का। कॉर्बेट के किनारे बने कंक्रीट के गगनचुंबी रिजॉर्ट्स को ठेंगा दिखाते हुए अब गांव की चौपालों को सैलानियों के लिए सजाया जा रहा है। विचार बिल्कुल साफ और धारदार है, रिजॉर्ट की महंगी और बेजान रातों को छोड़कर सैलानी अब गांव की खटिया पर तारे गिनेगा, चूल्हे की बनी मड़ुए की रोटी और पहाड़ी साग का चटकारा लेगा। अगर यह सरकारी तीर निशाने पर लगा और लालफीताशाही के मकड़जाल से बाहर निकला, तो रिजॉर्ट मालिकों के पसीने छूटना तय है, क्योंकि सैलानी की जेब से निकलने वाला हर एक रुपया सीधे गांव की गरीब रसोई को चमकाएगा।

हजूर 👉 कहानी सिर्फ कमरे का ताला खोलने तक सिमटी नहीं है, असली वार तो पलायन के उस कोढ़ पर है जिसने उत्तराखंड की जवानी को बरसों से चूस रखा है। जो गांव का युवा कल तक दिल्ली या देहरादून के किसी छोटे-मोटे होटल में बर्तन मांजने या मजदूरी करने को मजबूर था, वही अब अपनी माटी का मालिक बनकर सैलानियों को जंगल का भूगोल समझाएगा। बचपन से जंगल की एक-एक बोली, पक्षियों की हर एक कूक और जानवरों की आहट पहचानने वाला ग्रामीण जब अपनी इस पैतृक विद्या को व्यापार में बदलेगा, तो शहर जाने वाली बसों की सीटें अपने आप खाली नजर आने लगेंगी।

हजूर 👉 लेकिन ठहरिए, इस रंगीन और लुभावने जाल के पीछे एक बहुत बड़ा खतरा भी सिर उठाए खड़ा है। पर्यटन की चमक और पैसों की खनक के बीच अगर कॉर्बेट के शांत और बेपरवाह जंगल का सुकून छिन गया, तो अंजाम बेहद खौफनाक हो सकता है। अगर बेकाबू सैलानी और पैसों की हवस जंगल के कायदों को रौंदने लगी, तो कॉर्बेट की फिजा बिगड़ने में देर नहीं लगेगी। इसलिए सवाल सिर्फ गाड़ियां दौड़ाने और टिकट काटने का नहीं है, बल्कि उस लगाम का भी है जिसे अगर सही वक्त पर नहीं खींचा गया, तो जंगल का कुदरती निजाम ही तबाह हो जाएगा।

हजूर 👉 उधर ढिकाला के इलाके में दो नए वॉच टावर खड़े करके नोट छापने की नई मशीन लगाने का पूरा खाका तैयार हो चुका है। सैलानी टावरों पर चढ़कर जंगल का नजारा लेंगे और प्रशासन उनकी जेबें ढीली कराएगा। मगर असली पेंच यहीं फंसा है, क्या टिकट काउंटर से आने वाली आमदनी का सचमुच एक हिस्सा जमौरिया के ग्रामीणों तक पहुंचेगा या फिर वह भी पुरानी कागजी फाइलों के भारी-भरकम बोझ तले दफन हो जाएगा। इस पूरी कवायद में पारदर्शिता का यही वो यक्ष प्रश्न है जो हर किसी की जुबान पर तैर रहा है।

हजूर 👉 अगर जमौरिया का यह नया प्रयोग कामयाब हुआ, तो कॉर्बेट के आसपास की पूरी सियासत और सरगर्मी बदलकर रख देगा। सैलानी आएगा, माटी की सौंधी खुशबू सूंघेगा, चूल्हे का खाना खाएगा, जंगल की कहानियां सुनेगा और गांव में पैसों की बौछार करके जाएगा। लेकिन इस पूरे खेल पर ‘जंगल जासूस’ की पैनी और बाज जैसी नजर टिकी रहेगी। कागजी घोड़ों की दौड़ और जमीनी हकीकत के बीच कितना फासला है, इसका हिसाब तो होना ही है। देखना यही होगा कि यह योजना सचमुच जमौरिया की तकदीर बदलती है, या फिर यह भी महज़ एक सरकारी ढकोसला बनकर रह जाती है।

 

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