हजूर 👉बागेश्वर में DFO साहब की डिजिटल ड्रिब्लिंग, जंगल से ज्यादा सियासी गलियारों में क्यों गूंज रहा नाम?

जंगल जासूस👉

हजूर 👉बागेश्वर में DFO साहब की डिजिटल ड्रिब्लिंग, जंगल से ज्यादा सियासी गलियारों में क्यों गूंज रहा नाम?

हजूर 👉 बागेश्वर की शांत पहाड़ियों में इन दिनों जंगलों से ज्यादा एक और चीज चर्चा में है और वह है DFO प्रकाश चंद्र आर्या की बढ़ती डिजिटल चमक। साहब जहां पहुंचते हैं, कैमरा पहुंचता है, कैमरे के साथ सोशल मीडिया पहुंचता है और फिर पोस्ट की ऐसी एंट्री होती है कि विभागीय काम से पहले साहब की मौजूदगी नजर आने लगती है। ग्राम प्रधानों से बैठक, ग्रामीणों से संवाद, मानव वन्यजीव संघर्ष पर चौपाल और गांवों के दौरे निश्चित रूप से अधिकारी की जिम्मेदारी का हिस्सा हैं, लेकिन जंगल जासूस का सवाल थोड़ा टेढ़ा है। आखिर यह सरकारी जनसंपर्क है या जनसंपर्क के बहाने साहब की सार्वजनिक पहचान का ऐसा डिजिटल इंजन, जो इन दिनों फुल स्पीड में दौड़ रहा है। पहाड़ में कहावत है कि धार में उजाला हो तो नीचे छौंक भी देखता है कि रोशनी आखिर आ कहां से रही है।

हजूर 👉 बागेश्वर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और यहां राजनीति का रास्ता दिल्ली या देहरादून से कम, गांव की पगडंडियों और चौपालों से ज्यादा होकर गुजरता है। ग्राम प्रधान, वन पंचायत, ग्रामीण और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच लगातार दिखाई देना किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति की पहचान को मजबूत करता है। ऐसे में जब दर्जनों ग्राम प्रधानों के साथ बैठकें हों, गांव गांव पहुंच हो और उसी गतिविधि की तस्वीरें डिजिटल दुनिया में भी लगातार चमकती रहें तो राजनीतिक चाय की दुकानों पर चर्चा का उबलना तय है। अब स्थानीय चर्चाओं में सवाल घूम रहा है कि साहब सिर्फ जंगल की हिफाजत की पटकथा लिख रहे हैं या अनजाने में ऐसी सार्वजनिक पहचान भी तैयार हो रही है, जिसका इस्तेमाल कभी किसी दूसरे मैदान में हो सकता है। हालांकि अभी तक राजनीतिक प्रवेश का कोई प्रमाण सामने नहीं है, इसलिए इस चर्चा को फिलहाल अटकल से ज्यादा कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

हजूर 👉 अब जरा कहानी का पिछला पन्ना पलटिए और रामनगर पहुंचिए। बागेश्वर से पहले प्रकाश चंद्र आर्या तराई पश्चिमी वन प्रभाग रामनगर में DFO रहे हैं। जंगल वहां भी थे, ग्रामीण वहां भी थे, वन्यजीव संघर्ष वहां भी था और कैमरा भी कोई अनजान चीज नहीं थी। फिर सवाल उठता है कि रामनगर और बागेश्वर की डिजिटल चाल में कितना फर्क है। क्या वहां भी पोस्टों की ऐसी ही बरसात होती थी, क्या हर गतिविधि का डिजिटल पोस्टमार्टम होता था और क्या अधिकारी का चेहरा उसी तरह फ्रेम में रहता था। अगर रामनगर की फाइल और बागेश्वर की फेसबुक टाइमलाइन आमने सामने रख दी जाए तो शायद कहानी के कई छिपे हुए अध्याय खुद खुल जाएं। आखिर राजनीति में भी बड़ा सवाल यही होता है कि जनसंपर्क कब सामान्य प्रशासनिक संपर्क से आगे निकलकर सार्वजनिक पहचान का रूप लेने लगता है।

हजूर 👉 अब कहानी में असली मसाला यहीं से शुरू होता है। बागेश्वर में साहब की बढ़ती डिजिटल मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों की भौंहें भी उठा दी हैं। सवाल यह नहीं कि अधिकारी सोशल मीडिया पर क्यों दिखाई दे रहे हैं, सवाल यह है कि इतनी तेज रफ्तार से बन रही यह सार्वजनिक छवि आखिर किस दिशा में जा रही है। गांवों में लगातार मौजूदगी, ग्राम प्रधानों के साथ बैठकें, जनप्रतिनिधियों से संवाद और फिर उन्हीं गतिविधियों की डिजिटल गूंज, यह पूरा सिलसिला सामान्य प्रशासनिक सक्रियता है या अनजाने में एक बड़े जनसंपर्क अभियान का रूप ले रहा है। राजनीति की बिसात पर मोहरे कब सजते हैं, इसकी घोषणा अक्सर पहले नहीं होती, संकेत पहले दिखाई देते हैं। फिलहाल बागेश्वर में भी ऐसे संकेतों को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है, हालांकि इन्हें राजनीतिक तैयारी मानने से पहले ठोस प्रमाण का सामने आना जरूरी है।

हजूर 👉 फिलहाल जंगल जासूस किसी के राजनीतिक भविष्य की भविष्यवाणी नहीं कर रहा, लेकिन बागेश्वर की डिजिटल पिच पर उठ रही गेंद को नजरअंदाज भी नहीं कर रहा। एक तरफ वन विभाग की सरकारी जिम्मेदारी, दूसरी तरफ गांवों में बढ़ता जनसंपर्क, तीसरी तरफ सोशल मीडिया पर लगातार बढ़ती मौजूदगी और चौथी तरफ राजनीतिक गलियारों में भविष्य को लेकर उठती फुसफुसाहट। इन चारों को जोड़कर कोई निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन सवाल जरूर बनते हैं। रामनगर और बागेश्वर की सार्वजनिक गतिविधियों का तुलनात्मक रिकॉर्ड सामने आए, डिजिटल सक्रियता का वास्तविक हिसाब सामने रखा जाए और ग्रामीण संपर्क की तस्वीर को जमीनी परिणामों से मिलाया जाए तो शायद कई परतें अपने आप खुल जाएंगी। फिलहाल फेसबुक पर पोस्ट चल रही हैं, गांवों में चर्चाएं चल रही हैं और जंगल जासूस की कलम सवाल चला रही है कि बागेश्वर में यह सिर्फ वन विभाग की डिजिटल सक्रियता है या सार्वजनिक पहचान के निर्माण की कोई नई पटकथा धीरे धीरे आकार ले रही है।

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