हजूर👉 हाईकोर्ट की दहलीज पर तराई का वन प्रशासन👉48 दिन, तीन फरमान और रेंजरों की घूमती कुर्सियों का ‘न्यायिक’ हिसाब?

जंगल जासूस 👉

हजूर👉 हाईकोर्ट की दहलीज पर तराई का वन प्रशासन👉48 दिन, तीन फरमान और रेंजरों की घूमती कुर्सियों का ‘न्यायिक’ हिसाब?

हजूर👉 तराई पूर्वी वन प्रभाग हल्द्वानी का जंगल इन दिनों बेजुबान वन्यजीवों की गूंज से ज्यादा रेंजरों की बदलती कुर्सियों की प्रशासनिक हलचलों से चर्चा में है। 48 दिनों के भीतर अधिकारियों के इस स्थानांतरण क्रम ने तराई के वन प्रशासन में ऐसा मोड़ ला दिया है, जहाँ विभागीय आदेशों की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं और अधिकारियों की तैनातियाँ लगातार बदलती दिखाई दी हैं। जब रेंजरों की इस अदला-बदली का सिलसिला आगे बढ़ा, तो किशनपुर के रेंजर महेन्द्र सिंह रैकुनी ने इस प्रक्रिया से असहमति जताते हुए सीधा विधिक मार्ग अपनाया। रैकुनी साहब ने नैनीताल उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और ‘महेन्द्र सिंह रैकुनी बनाम उत्तराखंड राज्य एवं अन्य’ (विशेष याचिका संख्या 575/2026) के तहत कानूनी याचिका दायर कर दी। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में जब 3 सितंबर को पहली सुनवाई हुई, तो विभागीय पक्ष के सामने स्थिति स्पष्ट करने की चुनौती आ खड़ी हुई। रैकुनी की ओर से अंतरिम राहत यानी स्थगादेश की अर्जी प्रस्तुत की जा चुकी है, और अदालत ने संबंधित तंत्र को 9 सितंबर 2026 तक का समय देते हुए स्थिति स्पष्ट करने वाली पत्रावली पेश करने का अवसर दिया है।

हजूर👉 इस पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम और फेरबदल में सबसे मुख्य बिंदु घनानन्द चन्याल की तैनाती को लेकर आया, जिसने विभागीय आदेशों की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए। 7 जुलाई को उन्हें किशनपुर से स्थानांतरित कर बाराकोली भेजा गया, जहाँ उन्होंने कागज़ों में अपनी कार्यभार ग्रहण की उपस्थिति दर्ज कराई और उसमें वन संरक्षक का अनुमोदन भी उल्लिखित रहा। लेकिन मुख्य मोड़ 13 अगस्त के आदेश में देखने को मिला, जब चन्याल का बाराकोली से रनसाली के लिए दूसरा स्थानांतरण पत्र जारी किया गया, मगर उसमें अनुमोदन का उल्लेख दिखाई नहीं दिया। स्थिति यह रही कि चन्याल साहब इस नए आदेश के बाद भी बाराकोली की रेंज में ही बने रहे और वहां से कार्यमुक्त नहीं हुए। न तो विभागीय स्तर से उन्हें तत्काल कार्यमुक्त कराने की स्थिति दिखी, और न ही रनसाली में पदभार संभालने का कोई लिखित प्रमाण सामने आया। एक विभागीय आदेश जारी होता है, लेकिन उसका अनुपालन स्थगित रहता है और पूरा महकमा इस प्रक्रिया पर शांत रहता है—यह प्रशासनिक कार्यप्रणाली का ऐसा उदाहरण है जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

हजूर👉 कहानी में नया अध्याय तब जुड़ा जब उसी 13 अगस्त को तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी का स्थानांतरण हो गया और नए प्रभागीय वनाधिकारी दीपक कुमार सिंह ने तराई की जिम्मेदारी संभाली। नए प्रबंधन की ओर से 24 अगस्त को एक और नया आदेश जारी हुआ, जिसने घनानन्द चन्याल को बाराकोली से पुन: उसी किशनपुर रेंज में तैनात कर दिया, जहाँ से 7 जुलाई को उनका स्थानांतरण हुआ था। 7 जुलाई को किशनपुर से बाराकोली, 13 अगस्त को बाराकोली से रनसाली और 24 अगस्त को फिर बाराकोली से वापस किशनपुर! रनसाली वाला स्थानांतरण आदेश प्रभावी नहीं हो सका और चन्याल साहब की पुरानी तैनाती की राह सुगम हो गई। इसी प्रशासनिक प्रक्रिया में रैकुनी प्रभावित हुए, जिन्हें 7 जुलाई को रनसाली से किशनपुर लाया गया था और 24 अगस्त को पुनः बाराकोली स्थानांतरित कर दिया गया। वहीं नवीन पवार को डोली से रनसाली और फिर रनसाली से बाराकोली भेजा गया।

हजूर👉 उच्च न्यायालय में दर्ज इस याचिका में राज्य सरकार, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन संरक्षक, प्रभागीय वनाधिकारी और घनानन्द चन्याल को पक्षकार बनाकर जवाबदेही तय की गई है। सवाल यह उठ रहा है कि रेंजर की गद्दी को इस प्रकार बार-बार बदलकर वन सुरक्षा का कौन सा ढांचा लागू किया जा रहा था? रेंजर केवल प्रशासनिक लिपिक नहीं होता; उसे क्षेत्रीय तस्करों की गतिविधियों पर नजर रखने, अवैध कटान रोकने और संवेदनशील क्षेत्रों को समझने में महीनों का वक्त लगता है। लेकिन यहाँ 48 दिनों में अधिकारियों की निरंतर बदली तैनाती से वन सुरक्षा तंत्र प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। 13 अगस्त और 24 अगस्त के आदेशों में अनुमोदन की स्थिति, आदेश के अनुपालन में किस स्तर से विलंब हुआ या किस प्रक्रिया के तहत निर्णय बदले गए, अब इसका पूरा ब्योरा अदालत मांग रही है।

हजूर👉 अब सभी की निगाहें 9 सितंबर 2026 की तिथि पर टिकी हैं, जब सरकारी पक्ष को अपनी आधिकारिक पत्रावली लेकर उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष अपना उत्तर प्रस्तुत करना होगा। यदि वन विभाग के पास 13 अगस्त के आदेश के क्रियान्वयन न होने और बिना अनुमोदन के आदेश जारी होने का कोई स्पष्ट विधिक आधार नहीं मिलता है, तो संबंधित अधिकारियों के लिए स्थिति असहज हो सकती है। तराई के इस वन क्षेत्र में प्रशासनिक निर्णयों को लेकर जो अनिश्चितता बनी हुई थी, उसका निस्तारण अब न्यायपालिका के समक्ष होना तय है। 9 सितंबर को जब न्यायाधीश महोदय की अदालत में फाइल प्रस्तुत होगी, तब यह पूरी तरह साफ हो जाएगा कि विभागीय नियमों की प्रक्रिया किस दिशा में जाएगी और उच्च न्यायालय का इस अदला-बदली के प्रकरण पर क्या दृष्टिकोण रहता है।

 

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