हजूर 👉 उत्तराखंड के ‘ग्रीन वॉरियर्स’ का अमर इतिहास👉हल्द्वानी वानिकी अकादमी में आकार लेगा प्रदेश का पहला ‘वन शहीद स्मृति कक्ष’👉मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी की पहल और धामी सरकार की मंजूरी से तैयार होगी आधिकारिक सूची

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉 उत्तराखंड के ‘ग्रीन वॉरियर्स’ का अमर इतिहास👉हल्द्वानी वानिकी अकादमी में आकार लेगा प्रदेश का पहला ‘वन शहीद स्मृति कक्ष’👉मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी की पहल और धामी सरकार की मंजूरी से तैयार होगी आधिकारिक सूची

हजूर 👉 उत्तराखंड के जंगलों की खूबसूरती और विशालता के पीछे एक ऐसा सनसनीखेज सच छुपा है, जो बड़ी-बड़ी सुर्खियों की चकाचौंध में अक्सर दबा दिया जाता है। देवदार, चीड़ और साल के घने जंगलों की हरियाली और बाघ-हाथियों की मौजूदगी सिर्फ कुदरत का नजारा नहीं है, बल्कि इस मिट्टी की तहों में उन वनकर्मियों का खून और पसीना मिला है, जो अपनी ड्यूटी निभाते-निभाते हमेशा के लिए खामोश हो गए। अब तक जो कहानियां जंगलों की हवाओं और सरकारी फाइलों में गुम थीं, उन्हें हल्द्वानी स्थित उत्तराखंड वानिकी प्रशिक्षण अकादमी में बनने वाले एक अनोखे ‘वन शहीद स्मृति कक्ष’ के जरिए बाहर लाने का बड़ा दांव खेला गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार की इस ऐतिहासिक पहल और अकादमी के निदेशक, मुख्य वन संरक्षक (आईएफएस) संजीव चतुर्वेदी के प्रयासों ने सीधे वन विभाग के उस खौफनाक और जांबाज इतिहास पर जमा वक्त की धूल झाड़ दी है।

हजूर 👉 जंगल की नौकरी कोई दफ्तर के एसी कमरे में बैठकर कागज काले करना नहीं है। यहां सीमा पर खड़ा वनकर्मी हर सेकंड मौत से आंखें मिलाता है। एक तरफ लकड़ी और खनन माफिया के हथियारबंद गुंडे, दूसरी तरफ आदमखोर वन्यजीव, और तीसरी तरफ अचानक तांडव मचाने वाली जंगल की आग। इस घातक तिकड़ी के बीच जब कोई वनकर्मी अपनी ड्यूटी की आखिरी सांस लेता है, तो सिर्फ महकमे की एक फाइल बंद नहीं होती, बल्कि एक पूरा हंसता-खेलता परिवार पल भर में उजाड़ हो जाता है।

हजूर 👉 इस पूरे मामले में असली ट्विस्ट तब आया जब आंकड़ों के उलझे हुए धागे सामने आए। सितंबर 2024 की एक रिपोर्ट का दावा है कि राज्य बनने यानी नवंबर 2000 से लेकर सितंबर 2024 के बीच 29 वनकर्मियों ने जंगल की रक्षा में अपनी जान गंवाई, जिसमें से 16 मौतें अकेले कुमाऊं क्षेत्र में हुईं। वहीं, 1981 से 2024 तक के एक दूसरे पुराने रिकॉर्ड में 42 वनकर्मियों की मौत का जिक्र मिलता है। अब यहां सबसे बड़ा पेच यह है कि 29 और 42 को सीधे जोड़कर कुल आंकड़ा निकाल लेना भारी जल्दबाजी होगी, क्योंकि दोनों आंकड़ों की टाइमलाइन, दायरा और शर्तें पूरी तरह अलग हैं। यही वजह है कि मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी की यह पहल और राज्य सरकार का विजन सिर्फ एक पत्थर की दीवार खड़ी करने के लिए नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड वन विभाग का पहला एकदम सटीक, प्रामाणिक और एकीकृत ‘शहीद रिकॉर्ड’ तैयार करने का मास्टरस्ट्रोक मानी जा रही है।

हजूर 👉 इतिहास की परतों में झांकें तो यह कोई आज की कहानी नहीं है। 1992 का वह खूनी दौर कौन भूल सकता है जब तराई पश्चिमी वन प्रभाग के सहायक वन संरक्षक राम अवतार और उप रेंजर पान सिंह आतंकियों से सीधे भिड़ गए थे और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। यह घटना यह बताने के लिए काफी है कि वन विभाग की खाकी वर्दी केवल पेड़ गिनने के लिए नहीं, बल्कि गोलियों का सामना करने के लिए भी पहनी जाती है।

हजूर 👉 और फिर आया मई-जून 2024 का वह भयानक बिन्सर हादसा, जिसने पूरे प्रदेश की रूह कंपा दी। जंगल में भड़की भीषण आग को बुझाने उतरे चार जांबाज वनकर्मी—त्रिलोक सिंह मेहता, करन आर्य, पूरन सिंह और दीवान राम—लपटों के बीच जिंदा जल गए। आग का मौसम वन महकमे के लिए सिर्फ पेड़ों का नुकसान नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मौत के कुएं में कूदने जैसा होता है। इसके अलावा, कोविड-19 महामारी के दौर में अपनी जान पर खेलकर अग्रिम पंक्ति में डटे रहने वाले वनकर्मियों का अलग से रिकॉर्ड मौजूद है, जो यह साबित करता है कि आपदा कोई भी हो, इन ‘ग्रीन वारियर्स’ ने कभी पीछे हटना नहीं सीखा।

हजूर 👉 लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह स्मारक और ‘वन शहीद स्मृति कक्ष’ सिर्फ एक औपचारिक औपचारिकता बनकर रह जाएगा या वाकई हर बलिदानी को उसका हक मिलेगा? तराई पूर्वी से लेकर केदारनाथ और कालागढ़ टाइगर रिजर्व तक से केवल सरकारी चिट्ठियों के सहारे आंकड़े जुटाना नाकाफी होगा। पुराने सर्विस रिकॉर्ड, दुर्घटना रिपोर्ट, मस्टर रोल, पोस्टमार्टम की फाइलें और शहीद परिवारों की आंखों देखे सच को एक साथ खंगालना होगा। हर बलिदानी की तस्वीर के साथ उसकी तैनाती, घटना का दिन, स्थान और उसकी जांबाजी की पूरी शौर्य गाथा दर्ज होनी चाहिए ताकि प्रशिक्षण लेने वाला हर नया रेंजर या अफसर यह जान सके कि उसकी वर्दी पर लगे स्टार्स की असली कीमत क्या है।

हजूर 👉 हल्द्वानी स्थित उत्तराखंड वानिकी प्रशिक्षण अकादमी ने इस निर्माण कार्य को शुरू कर दिया है। अगर इन वीर गाथाओं को केस स्टडी, ट्रेनिंग और सेमिनार का हिस्सा बनाया जाए, तो यह जगह सिर्फ मोमबत्ती जलाने का अड्डा नहीं, बल्कि फर्ज का सबसे बड़ा मंदिर बन जाएगी। इसके साथ ही, वर्ष 1981 से लेकर आज तक का एक डिजिटल ‘शहीद वनकर्मी डेटा बैंक’ बनाना अब वक्त की सबसे बड़ी मांग है, ताकि भविष्य में आंकड़ों की कोई हेराफेरी न हो सके और किसी भी बलिदानी का नाम गुमनामी के अंधेरे में न छूटे।

हजूर 👉 अक्सर देखा जाता है कि जंगल में एक पेड़ कट जाए तो हंगामा मच जाता है, बाघ की फोटो पर लाखों लाइक्स आ जाते हैं, लेकिन जिस वनकर्मी का शरीर गोलियों या आग से छलनी हो जाता है, उसकी खबर पेज के किसी कोने में दम तोड़ देती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के सहयोग और मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी की यह कोशिश अगर अपनी सही मंजिल तक पहुंचती है, तो यह उन परिवारों के कलेजे को ठंडक देगी जिन्होंने अपने चिरागों को जंगल के हवाले कर दिया। स्मारक जरूर बने, लेकिन उसके साथ एक ऐसी मुकम्मल लिस्ट तैयार होनी चाहिए जिसमें एक भी नाम न छूटे, ताकि कल जब कोई नई पीढ़ी इन घने जंगलों से गुजरे, तो पेड़ भले ही खामोश रहें, पर हवाएं इन वन योद्धाओं की बहादुरी का किस्सा सुनाती रहें।

 

Advertisement
Advertisement
❌ Content Protection Enabled: Right-click & text copying is disabled on this website.