हजूर 👉 बीन बजी तो सरकारी नींद टूटी! पौड़ी में सूखे पेड़ पर ऐसा हल्ला बोल कि अफसरों को लेना पड़ा संज्ञान?

ख़बर शेयर करें

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉 बीन बजी तो सरकारी नींद टूटी! पौड़ी में सूखे पेड़ पर ऐसा हल्ला बोल कि अफसरों को लेना पड़ा संज्ञान?

हजूर 👉 पौड़ी में एक सूखा-जर्जर पेड़ इन दिनों सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि सरकारी सुस्ती का प्रतीक बन गया था। स्कूल जाने वाले मुख्य रास्ते पर खड़ा यह पेड़ कब धराशायी हो जाए और किसी मासूम की जान आफत में पड़ जाए, इसे लेकर स्कूल प्रबंधन लंबे समय से चिंतित था। रोज सैकड़ों बच्चे और राहगीर इसी रास्ते से गुजरते हैं। ऊपर से पहाड़ का मौसम👉तेज हवा, बारिश और आंधी आते ही खतरा कई गुना बढ़ जाता है। शिकायतें हुईं, गुहार लगी, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार ऐसी रही मानो फाइल पैदल पहाड़ चढ़ रही हो!

हजूर 👉 आखिर स्कूल के प्रधानाचार्य दामोदर ममगाईं ने ऐसा तरीका निकाला कि अफसरशाही भी सोचने पर मजबूर हो गई। वह उसी खतरनाक पेड़ के नीचे बीन और ड्रम लेकर बैठ गए। बीन की तान निकली, ड्रम की थाप पड़ी और साहब👉जिस खतरे को कागजों की आवाज नहीं जगा पाई, उसे बीन ने शायद जगा दिया! सड़क से गुजरते लोग रुककर तमाशा देखने लगे और विरोध का वीडियो इंटरनेट पर दौड़ पड़ा।

हजूर 👉 प्रधानाचार्य का तंज भी कमाल का था👉जब बार-बार गुहार के बाद भी खतरा जस का तस रहे तो फिर “भैंस के आगे बीन” वाली कहावत याद आना स्वाभाविक है। सवाल भी सीधा है👉जब पेड़ पहले से खतरा बना हुआ है तो कार्रवाई हादसे के बाद क्यों? क्या सरकारी मशीनरी को चेताने के लिए पहले पेड़ गिरना जरूरी है और फिर फाइल उठना?

हजूर 👉 बीन-ड्रम का यह अनोखा हल्ला बोल यहीं नहीं रुका। स्कूल के शिक्षक और छात्र वन विभाग के कार्यालय पहुंच गए। बच्चों ने अपनी सुरक्षा की चिंता अधिकारियों के सामने रखी और खतरनाक पेड़ों को जल्द हटाने की मांग की। यानी इस बार शिकायत अकेली नहीं थी, बच्चे भी सवाल लेकर दफ्तर पहुंच गए।

हजूर 👉 मामले की गंभीरता को देखते हुए पौड़ी के डीएफओ महातिम यादव ने तत्काल संज्ञान लिया। स्कूल मार्ग के खतरनाक पेड़ों का चिन्हीकरण कराने के निर्देश दिए गए और बताया गया कि दो दिनों के भीतर कटान की कार्रवाई शुरू की जाएगी। अब यह कदम जमीन पर कितनी तेजी से उतरता है, यही देखने वाली बात होगी। क्योंकि असली परीक्षा आदेश जारी करने की नहीं, आदेश को मौके तक पहुंचाने की है।

हजूर 👉 लेकिन जंगल जासूस का सवाल सबसे बड़ा है👉क्या सरकारी दफ्तरों में खतरे की घंटी सुनाई नहीं देती, जब तक उसके साथ बीन और ड्रम न बजें? एक तरफ बच्चों की सुरक्षा, दूसरी तरफ सूखा पेड़ और बीच में सरकारी कार्रवाई की सुस्त रफ्तार। इस पूरे घटनाक्रम ने कम से कम इतना तो बता दिया कि कभी-कभी लोकतंत्र में बीन भी सूचना का अधिकार बन जाती है और ड्रम सरकारी अलार्म!

हजूर 👉 अब देखना यह है कि दो दिन का वादा दो दिन में जमीन पर उतरता है या फिर सरकारी कैलेंडर में इसकी तारीख आगे खिसकती रहती है। फिलहाल पौड़ी में प्रधानाचार्य की बीन ने खूब सुर्खियां बटोरी हैं। और जंगल जासूस की तरफ से आखिरी सवाल👉हजूर👉अगली बार किसी खतरे को हटवाने के लिए आवेदन के साथ बीन भी लगानी पड़ेगी क्या?

error: Content is protected !!