जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 वन विभाग में ट्रांसफर का खेल👉तीन आदेश, दो रेंजर और अदालत के कठघरे में सूबे के बड़े हाकिम!
हजूर 👉 उत्तराखण्ड के वन विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल कोई नया नहीं है, लेकिन तराई पूर्वी वन प्रभाग हल्द्वानी में रेंज स्तर के स्थानांतरणों को लेकर जो नया प्रशासनिक और कानूनी बवंडर खड़ा हुआ है, उसने महकमे की चूलें हिलाकर रख दी हैं। यह मामला अब सिर्फ विभागीय फाइलों, दफ्तर के कमरों और साहिबान की मनमर्जी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्याय के चौखट तक पहुँच चुका है। स्थिति यह बन चुकी है कि वन विभाग के सर्वोच्च पद पर बैठे वन बल प्रमुख से लेकर क्षेत्रीय वन संरक्षक और प्रभागीय वनाधिकारी तक को अदालती कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार होना पड़ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक हलकों में यह गंभीर सवाल पैदा कर दिया है कि आखिर नियम-कायदों की दुहाई देने वाले महकमे में ऐसी कौन सी हड़बड़ी या चूक हुई कि पूरी व्यवस्था को अदालत के कठघरे में खड़ा होना पड़ा।
हजूर 👉 कहानी की शुरुआत तराई पूर्वी वन प्रभाग के तीन अलग-अलग रेंज अधिकारियों के ट्रांसफर आदेशों से होती है। शुरुआती दौर में जब पहला आदेश जारी हुआ, तो फाइल चली, उच्च स्तर से अनुमोदन की मुहर लगी और अधीनस्थ अधिकारियों ने बिना किसी हिचकिचाहट के आदेश का अनुपालन करते हुए अपनी नई जगहों पर कार्यभार संभाल लिया। सब कुछ विभागीय ढर्रे के अनुसार सामान्य प्रतीत हो रहा था। लेकिन जैसे ही दूसरे और तीसरे ट्रांसफर का जिन्न चिराग से बाहर आया, पूरी पटकथा ही बदल गई। देखते ही देखते विभागीय तालमेल की हवा निकल गई और मामला सीधी अदालती चुनौती में बदल गया। पहली ट्रेन तो बिना किसी रुकावट के अपनी मंजिल तक पहुँच गई, लेकिन दूसरी और तीसरी ट्रेन को अचानक किसने रेड सिग्नल दिखा दिया, यह रहस्य अब गहराता जा रहा है?
हजूर 👉 इस पूरे विवाद का सबसे गर्माहट भरा और दिलचस्प केंद्र बिंदु किशनपुर रेंज की रेंजर की कुर्सी बनी हुई है। इस कुर्सी को लेकर महेंद्र सिंह रेकुनी और घनानन्द चन्याल के बीच जिस तरह की प्रशासनिक खींचतान देखने को मिल रही है, उसने महकमे के भीतर गुटबाजी और खींचतान को उजागर कर दिया है। एक तरफ आदेश की वैधता का दावा है तो दूसरी तरफ प्रक्रियागत खामियों की दलीलें दी जा रही हैं। कुर्सी पर कौन बैठेगा और कौन हटेगा, इसका अंतिम फैसला अब विभागीय अधिकारियों की टेबल पर नहीं बल्कि अदालत के विवेक पर निर्भर हो गया है। इस उठापटक ने यह साफ कर दिया है कि महकमे में नियमों का पालन सहूलियत के हिसाब से किया जा रहा था या फिर वास्तव में प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर फैसले लिए गए थे?
हजूर 👉 अब जब मामला अदालत की दहलीज पार कर चुका है, तब दलीलों और मौखिक आश्वासनों का दौर खत्म हो चुका है और सिर्फ आधिकारिक दस्तावेजों की भाषा ही सच बयां करेगी। अदालत में पक्षकार बनाए गए आला अधिकारियों को अब यह साफ-साफ जवाब देना होगा कि ये तबादले किस अधिकार क्षेत्र के तहत किए गए, क्या सक्षम स्तर से अनिवार्य अनुमोदन लिया गया था, और यदि प्रक्रिया पारदर्शी थी तो फिर एक ही प्रभाग में अलग-अलग तबादलों पर अलग-अलग रवैया क्यों अपनाया गया। जब अदालती नोटिस का जवाब देने का समय आएगा, तब सिर्फ सरकारी फाइलें, पत्रावलियां, नोटिंग और नियमों की धाराएं ही अधिकारियों का बचाव कर पाएंगी?
हजूर 👉 विभाग के भीतर उठ रही सुगबुगाहटों की मानें तो इस पूरे प्रकरण ने उच्च अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी कई गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अगर पहला मामला सही तरीके से निपटाया गया था, तो बाद के प्रकरणों में प्रक्रिया इतनी उलझ क्यों गई। क्या ट्रांसफर आदेश जारी करने से पहले वैधानिक और प्रशासनिक पहलुओं की गहराई से पड़ताल नहीं की गई थी। क्या अधिकारियों को अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का भान नहीं था, या फिर किसी अंदरूनी दबाव में आकर नियमों को ताक पर रखकर फैसले सुनाए गए। यह स्थिति दर्शाती है कि महकमे के भीतर प्रशासनिक नियंत्रण ढीला पड़ चुका है और आदेश जारी होने के बाद नियमों की व्याख्या अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार की जाने लगती है?
हजूर 👉 फिलहाल तराई पूर्वी वन प्रभाग के ट्रांसफर की यह पूरी ट्रेन बीच प्लेटफॉर्म पर रुक गई है। इस ट्रेन का इंजन भले ही वन विभाग का हो और पटरी नियमों की बिछाई गई हो, लेकिन इसका सिग्नल अब अदालत के हाथ में है। अदालत का फैसला ही यह तय करेगा कि यह ट्रेन आगे बढ़ेगी या फिर उल्टे पांव वापस लौटेगी। कानून की कसौटी पर कसने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि किशनपुर की कुर्सी पर रेकुनी की तैनाती कायम रहती है या चन्याल बाजी मारते हैं। परंतु इस पूरे वाकये ने एक बात शीशे की तरह साफ कर दी है कि जब जंगलों में एक टहनी काटने के लिए सौ नियमों का हवाला दिया जाता है, तो फिर अधिकारियों की कुर्सियां बदलने वाले आदेश भी कानून की मजबूती के बिना ज्यादा देर तक टिक नहीं सकते?



