हजूर 👉कालाढूंगी के जंगलों में जेसीबी का ‘गुप्त ऑपरेशन’! 80 फीसदी खाई खुद गई, अब जांच की गड़गड़ाहट से क्यों कांप रहा महकमा?

 

हजूर 👉कालाढूंगी के जंगलों में जेसीबी का ‘गुप्त ऑपरेशन’! 80 फीसदी खाई खुद गई, अब जांच की गड़गड़ाहट से क्यों कांप रहा महकमा

जंगल जासूस👉

हजूर 👉 कालाढूंगी के जंगलों में इन दिनों जेसीबी की गड़गड़ाहट ने ऐसा माहौल बना दिया है कि लगता है वन सुरक्षा का नया युग शुरू हो गया है। नया गांव, वाटरफॉल, मुशाबंगर बीट से लेकर चकलुवा बैली पुल और निहाल गेट तक खाई खुदान का काम चल रहा है। तीन तीन जेसीबी मशीनें जंगल में सक्रिय हैं और काम लगभग 80 प्रतिशत पूरा होने की बात सामने आई है। अब सवाल यह नहीं कि मशीनें कितनी तेज चल रही हैं, सवाल यह है कि फाइलें उनके पीछे कितनी तेज दौड़ रही हैं। कालाढूंगी निवासी पत्रकार एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मनोज कुमार पंत ने आज पश्चिमी वृत्त, हल्द्वानी के वन संरक्षक नितीश मणि त्रिपाठी से मुलाकात कर मामले को उनके सामने रखा। वन संरक्षक ने जांच के आदेश दिए हैं। यानी अब जंगल में खाई के साथ साथ सवालों की भी खुदाई शुरू हो गई है।

हजूर 👉 वन विभाग का तर्क हो सकता है कि खाइयां जंगल की सुरक्षा के लिए खोदी जा रही हैं। बिल्कुल खोदिए, जंगल की सुरक्षा होनी चाहिए और वन्यजीवों का संरक्षण भी। लेकिन जनता का छोटा सा सवाल है कि सुरक्षा की खाई खोदने से पहले नियमों की खाई क्यों पार नहीं की गई। क्या स्वीकृत नक्शा तैयार हुआ, क्या तकनीकी अनुमान बना, क्या प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति ली गई, क्या कार्यादेश जारी हुआ और क्या मशीनों के संचालन की अनुमति थी। अगर सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो जांच से बेहतर मौका क्या होगा, सारे कागज निकालिए और जनता को दिखाइए। आखिर सरकारी काम है,

 कोई ऐसी पहेली तो नहीं कि उत्तर पुस्तिका जांच के बाद ही मिले।

हजूर 👉 अब आते हैं टेंडर और कोटेशन के उस अध्याय पर, जिसमें सरकारी कामों की कहानी अक्सर रोमांचक हो जाती है। शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया है कि कार्य के लिए पारदर्शी निविदा प्रक्रिया नहीं अपनाई गई और कोटेशन के माध्यम से किसी पसंदीदा ठेकेदार को लाभ पहुंचाने की आशंका है। चर्चाओं में ठेकेदार का नाम भी सामने आया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, इसलिए फैसला जांच के बाद ही होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि यदि काम बड़ा है तो प्रक्रिया भी बड़ी पारदर्शी क्यों न हो। कितने कोटेशन लिए गए, किसे काम मिला, किस दर पर मिला और किस नियम के तहत मिला। सरकारी टेंडर में प्रतियोगिता होनी चाहिए, ऐसा नहीं कि ठेकेदारों की दौड़ शुरू होने से पहले ही विजेता की माला तैयार रखी 

 

हजूर 👉 असली मजा तो अब निरीक्षण के सवाल में है। जब कथित तौर पर 80 प्रतिशत काम पूरा हो गया, तो क्या संबंधित बीट अधिकारी, फॉरेस्टर या रेंजर जीवन चंद्र उप्रेती ने मौके का निरीक्षण किया। क्या प्रगति रिपोर्ट बनी, क्या माप पुस्तिका में वास्तविक कार्य दर्ज हुआ और क्या मशीनों की संचालन अवधि का हिसाब रखा गया। मनोज पंत ने मांग की है कि जांच टीम दफ्तर की कुर्सी से उठे और जंगल में फीता लेकर पहुंचे। नया गांव से निहाल गेट तक खाई की लंबाई, चौड़ाई और गहराई नापी जाए। क्योंकि कागजों में खाई चाहे जितनी लंबी हो, जमीन पर उसका हिसाब फीते से ही होगा। और अगर नाप में कुछ कम निकला, तो फिर फाइल का गणित भी दोबारा पढ़ना पड़ेगा

हजूर 👉 वर्तमान खाई खुदान मामले से अलग मुशाबंगर बीट का वर्ष 2025 का सुरक्षा दीवार प्रकरण भी चर्चा में है। अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार, 2200 मीटर लंबी सुरक्षा दीवार के लिए 24.50 लाख रुपये की स्वीकृति का उल्लेख था। खबर में आरोप लगाया गया था कि काम को दस छोटे हिस्सों में बांटकर अलग अलग बांड तैयार किए गए और पूरा काम एक ही ठेकेदार को दिए जाने की बात सामने आई। मौके पर लगभग 1600 मीटर निर्माण पाए जाने तथा करीब 600 मीटर कार्य अधूरा बताए जाने का भी उल्लेख था। रिकॉर्ड में पूरा काम दिखाकर भुगतान के आरोप सामने आए थे। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। खबर में संबंधित रेंजर, फॉरेस्टर और फॉरेस्ट गार्ड को चार्जशीट जारी किए जाने का उल्लेख भी था। पुराने मामले की अंतिम स्थिति विभागीय जांच से स्पष्ट होगी। लेकिन सवाल वही है, सुरक्षा दीवार हो या खाई, नाप जमीन  होनी चाहिए और हिसाब कागज पर साफ होना चाहिए।

हजूर 👉 अब वन संरक्षक नितीश मणि त्रिपाठी के जांच आदेश के बाद सबकी निगाहें जांच टीम पर हैं। जनता चाहती है कि जांच केवल फाइलों की धूल झाड़ने तक सीमित न रहे, बल्कि मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का सत्यापन करे। कार्य की उपयोगिता, स्वीकृति, निविदा प्रक्रिया, मशीनों का विवरण, माप पुस्तिका और भुगतान संबंधी अभिलेखों की निष्पक्ष पड़ताल हो। यदि कार्य नियमों के अनुसार हुआ है तो विभाग को बेझिझक उसका पूरा विवरण सामने रखना चाहिए। यदि अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। जंगल जासूस की तरफ से बस इतना सवाल है कि कालाढूंगी के जंगलों में खाई खुदी है या सरकारी व्यवस्था की पोल खुली है। अब जांच बताएगी कि जेसीबी ने केवल मिट्टी हटाई है या फिर फाइलों के नीचे दबे कई सवाल भी बाहर निकाले हैं।

 

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