हजूर 👉सफेद नवाब की एंट्री, पहाड़ के लाल पांडा की विदाई! देहरादून के पिंजरे में दो सफेद बाघों के लिए क्या खुला ‘एक्सचेंज ऑफर’?

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉सफेद नवाब की एंट्री, पहाड़ के लाल पांडा की विदाई! देहरादून के पिंजरे में दो सफेद बाघों के लिए क्या खुला ‘एक्सचेंज ऑफर’?

हजूर 👉 उत्तराखंड के वन विभाग की फाइलों में इन दिनों “सफेद नवाब” की एंट्री को लेकर हलचल की चर्चा है। बताया जा रहा है कि देहरादून के चिड़ियाघर में दो सफेद बाघ लाने की तैयारी आगे बढ़ रही है और दिल्ली स्तर से मंजूरी मिलने के बाद फाइलों की रफ्तार भी बढ़ी है। पहला सफेद बाघ मध्य प्रदेश के ग्वालियर से करीब दो वर्ष की उम्र में आने की चर्चा है, जिसके बदले उत्तराखंड से एक पीले-धारीदार बाघ दिए जाने की बात सामने आ रही है। सरकारी भाषा में इसे वन्यजीव अदला-बदली कहा जाएगा, मगर सवाल यही है👉सफेद नवाब के स्वागत में उत्तराखंड से कौन विदा होगा?

हजूर 👉 असली कहानी दूसरे सफेद बाघ को लेकर है, जिसका रास्ता उड़ीसा के नंदनकानन से जुड़ता बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार इस दिशा में पहले भी प्रस्ताव और पत्राचार होते रहे, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ पाया। अब मंजूरी की चर्चा के साथ कथित एक्सचेंज की शर्त भी सामने आ रही है👉लाल पांडा और हिमालयी गोरल के जोड़े। यानी देहरादून के बाड़े में सफेद रंग बढ़ेगा और पहाड़ के दो खास वन्यजीव दूसरे राज्य की ओर रवाना हो सकते हैं। सवाल यह है कि इस अदला-बदली का आधार केवल प्राणी उद्यान की जरूरत है या इसके पीछे कोई विस्तृत संरक्षण योजना भी है?

हजूर 👉 लाल पांडा और हिमालयी गोरल उत्तराखंड के हिमालयी पर्यावास से जुड़े वन्यजीव हैं। इसलिए यदि इनके स्थानांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो सवाल केवल संख्या का नहीं, बल्कि जलवायु, आवास, भोजन, स्वास्थ्य, प्रजनन और दीर्घकालिक संरक्षण का भी है। आखिर पहाड़ के जीव को दूसरे राज्य में भेजना सिर्फ वाहन में बैठाकर रवाना कर देना तो नहीं है। दूसरी तरफ सफेद बाघ का आकर्षण भी कम नहीं👉चिड़ियाघर में सफेद बाघ आया तो पर्यटक, कैमरे और सोशल मीडिया स्वाभाविक रूप से उसकी तरफ खिंच सकते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि प्राथमिकता संरक्षण है या पर्यटक आकर्षण?

हजूर 👉 अब कहानी का टिकट खिड़की वाला अध्याय भी सुन लीजिए। सफेद बाघ की एक झलक देखने के लिए पर्यटकों की कतार लगे, मोबाइल कैमरे चमकें और चिड़ियाघर की आमदनी बढ़े👉यह पर्यटन की दृष्टि से आकर्षक तस्वीर हो सकती है। लेकिन यदि सफेद बाघ के बदले उत्तराखंड के अन्य महत्वपूर्ण वन्यजीव दिए जाने हैं, तो जनता यह जानना चाहेगी कि कौन सा वन्यजीव किसके बदले, किस संस्था को, किस वैज्ञानिक आधार पर और किन शर्तों पर दिया जा रहा है। फाइलों में लगी मुहरें अपनी जगह हैं, लेकिन वन्यजीवों की अदला-बदली का वैज्ञानिक हिसाब भी उतना ही जरूरी है।

हजूर 👉 अब इंतजार उस दिन का है जब कागजों का सफेद नवाब सचमुच देहरादून के बाड़े में पहुंचकर पहली चाल चलेगा। कैमरे उसकी तस्वीरें कैद करेंगे, पर्यटक उसे देखने पहुंचेंगे और सोशल मीडिया पर सफेद रंग छा सकता है। मगर इसी चमक के पीछे पहाड़ से उठता सवाल भी सुनाई देगा👉सफेद बाघ की दहाड़ के बदले लाल पांडा और गोरल की विदाई क्यों? यदि यह पूरी तरह संरक्षण आधारित अदला-बदली है तो उसका वैज्ञानिक आधार क्या है, और यदि पर्यटन भी इसका हिस्सा है तो उसका पूरा हिसाब क्या है? फिलहाल फाइल आगे बढ़ने की चर्चा है👉अब देखना यह है कि पहले सफेद बाघ देहरादून पहुंचता है या ‘सफेद एक्सचेंज’ की पूरी कहानी जनता के सामने आती है।

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