जंगल जासूस 👉
हजूर 👉सोशल मीडिया पर ‘फोटो’ वीडियो से मशीनों के ‘पंजे’ में फंसा वन विकास निगम👉 20 मीटर की दूरी पर बैठे अफसरों के नाक के नीचे ‘अवैध मशीनी खेल’ और ‘फर्जी मस्टर रोल’ का बड़ा गोलमाल, अब CCTV फुटेज पर टिकी सबकी निगाहें!
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के रामनगर स्थित विक्रय प्रभाग के आमडंडा डिपो से छन-छनकर बाहर आ रही तस्वीरें अब महज जड़ों के भंडारण और उनकी छंटाई की कहानी नहीं रह गई हैं? सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही कुछ तस्वीरें डिपो की कार्यप्रणाली, मशीनों के अवैध इस्तेमाल, श्रमिकों के हक, सरकारी भुगतान और अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर ऐसे गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं जिनका जवाब अब फाइलों के भीतर दबाना आसान नहीं होगा? हालांकि, वायरल तस्वीरें कुछ महीनों पुरानी बताई जा रही हैं जिनकी प्रशासनिक पुष्टि निष्पक्ष जांच से ही संभव है, लेकिन तस्वीरों द्वारा उठाए गए सवालों और विभागीय साख पर उठे संशय को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है?
हजूर 👉 सामने आई वायरल तस्वीरों में भारी-भरकम हाइड्रा, पोकलैंड और ट्रैक्टर-युक्त पंजों (मॉडिफाइड मशीनों) से जड़ों की लोडिंग-अनलोडिंग और छंटाई का काम होते देखा जा सकता है? इसके अलावा, मजदूरों की जगह पेट्रोल चालित बड़ी आरा मशीनों और पावर चेन-सॉ जैसे उपकरणों से जड़ों को तराशा जा रहा है? मामला इसलिए बेहद गंभीर है क्योंकि वन निगम की नियमावली के अनुसार डिपो परिसर के भीतर किसी भी प्रकार की मशीनों से जड़ों की कटाई और छंटाई पूरी तरह प्रतिबंधित है? ऐसे में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि सुरक्षा घेरे और अधिकारियों की तैनाती के बावजूद ये भारी-भरकम मशीनें और पावर टूल्स आखिर किसकी शह पर और किस अनुमति से डिपो परिसर के अंदर दाखिल हुए?
हजूर 👉 इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील और गंभीर पहलू श्रम बनाम मशीन के खेल से जुड़ा हुआ है? यदि नियमानुसार डिपो में जड़ों की छंटाई और प्रोसेसिंग का कार्य स्थानीय गरीब मजदूरों के माध्यम से कराया जाना था, तो फिर मौके पर मशीनों का वर्चस्व क्यों दिखाई दिया? असली जांच का विषय अब सरकारी रिकॉर्ड और मस्टर रोल हैं? यदि काम मशीनों से निपटाया गया, तो मस्टर रोल में दर्ज श्रमिकों की संख्या, उनके कार्यदिवस और स्वीकृत मजदूरी का हिसाब किसके नाम दर्ज हुआ? क्या मशीनों के किए काम को कागजों पर गरीब मजदूरों का पसीना दिखाकर सरकारी बजट का गबन किया जा रहा है या फिर मशीन संचालकों को दोहरे भुगतान का खेल चल रहा है?
हजूर 👉 जड़ों की प्रोसेसिंग के साथ-साथ उनके स्टॉक और वास्तविक मात्रा का हिसाब भी इस मामले की अहम कड़ी है? जंगल से उखड़ी जड़ों की मात्रा, परिवहन चालान में दर्ज वजन, डिपो में प्राप्ति और छंटाई के बाद बचे स्टॉक का मिलान होना बेहद जरूरी है? यदि मशीन से जड़ों की मिट्टी, पत्थर और नसों को काटकर अलग किया जा रहा है, तो इस पूरी प्रक्रिया के पीछे की प्रशासनिक मंशा की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? साथ ही, शिकायतकर्ताओं द्वारा प्रति घनमीटर के हिसाब से ठेकेदारों से की जा रही कथित अनुचित वसूली के आरोपों की निष्पक्ष पड़ताल भी तभी संभव होगी जब कार्यादेश, माप पुस्तिका और बिलों का भौतिक मिलान कराया जाए?
हजूर 👉 इस पूरे प्रशासनिक गोलमाल पर जब जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यान खींचा गया, तो डीएसएम रामनगर ने केवल इतना कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वायरल तस्वीरों की जांच गतिमान है? हालांकि, अधिकारी भले ही जांच का दावा कर रहे हों, लेकिन धरातल की हकीकत इस दावे को कटघरे में खड़ा करती है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जांच चल ही रही है, तो आज भी डिपो परिसर में मशीनों के पंजे लगातार कैसे चल रहे हैं? हैरानी की बात तो यह है कि जिस जगह यह पूरा खेल चल रहा है, वहां से क्षेत्रीय प्रबंधक पश्चिमी वृत्त कार्यालय और प्रभागीय विक्रय प्रबंधक का ऑफिस महज 20 मीटर की दूरी पर स्थित है? अधिकारियों की नाक के नीचे और चंद कदमों के फासले पर चल रहे इस मशीनी खेल पर जिम्मेदार प्रशासनिक तंत्र की खामोशी क्या कई गंभीर संशय पैदा नहीं करती?
हजूर 👉 इस पूरे मशीनी खेल में अब सबसे बड़ा तकनीकी और प्रशासनिक सवाल डिपो के सीसीटीवी कैमरों को लेकर खड़ा हो गया है? आखिर डिपो के मुख्य प्रवेश द्वार और परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की डिजिटल फुटेज खंगालना क्यों जरूरी है? जब डिपो के गेट पर बाकायदा सुरक्षा तंत्र और गार्ड तैनात रहते हैं, तो ट्रैक्टर-युक्त पंजों, पोकलैंड और पेट्रोल चालित आरा मशीनों जैसी भारी-भरकम मशीनों को अंदर ले जाने की अनुमति किसने दी? यदि सीसीटीवी कैमरों की पूरी रिकॉर्डिंग खंगाली जाए, तो यह दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा कि डिपो के भीतर कौन-कौन से वाहन और मशीनें किस समय दाखिल हुए, उन्हें कौन चला रहा था, और वे कितने दिनों तक परिसर के अंदर बेधड़क संचालित होते रहे?
हजूर 👉 अब जरूरत इस बात की है कि जांच को सिर्फ वायरल तस्वीरों की सत्यता तक सीमित न रखकर फाइलों और डिजिटल साक्ष्यों के भीतर तक ले जाया जाए? जांच अधिकारियों को डिपो के गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, गेट रजिस्टर, मस्टर रोल, कार्यादेश, माप पुस्तिका, स्टॉक रजिस्टर और बैंक भुगतान विवरणों का एक-एक कर मिलान करना होगा? यदि जांच में मशीनरी के अनधिकृत उपयोग और वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी सिर्फ मौके पर मशीन चलाने वाले तक सीमित न रहकर आदेश देने, निगरानी करने और भुगतान स्वीकृत करने वाली पूरी प्रशासनिक श्रृंखला पर तय होनी चाहिए? आमडंडा डिपो से उठे सवाल अब इसी ठोस, डिजिटल और पारदर्शी जांच का इंतजार कर रहे हैं?



