जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 पेड़ों खुदाई की आड़ में करोड़ों की हेराफेरी 👉 मशीनों से खुदाई, फर्जी मस्टर रोल से उघड़ा उत्तराखंड वन निगम का महाघोटाला!
हजूर 👉 उत्तराखंड वन निगम के गलियारों में इन दिनों एक ऐसी खौफनाक और मसालेदार फाइल चक्कर काट रही है, जिसने बड़े-बड़े हुक्मरानों से लेकर छोटे कारिंदों तक की रातों की नींद और दिन का सुकून पूरी तरह हराम कर रखा है। मामला 3 नवंबर 2025 को दर्ज हुई एक तीखी और जलती हुई शिकायत से शुरू हुआ था, जो अब महज सरकारी रद्दी का पुलिंदा नहीं बची है, बल्कि समूचे प्रशासनिक ढांचे, ईमानदारी के बड़े-बड़े दावों और सफेदपोश अफसरों की साख पर एक करारा, सन्न कर देने वाला सवाल बन चुकी है। यह पत्रावली प्रबंध निदेशक के आलीशान, वातानुकूलित दफ्तर से रवाना होकर सीधे प्रमुख सचिव, वन एवं पर्यावरण विभाग की मेज पर जा धमकी। कागजों पर जल्दबाजी में आड़ी-तिरछी हस्तलिखित टिप्पणियां दर्ज की गईं, लाल स्याही से आनन-फानन में दस्तखत पेल दिए गए, भारी-भरकम मुहरें ठोंकी गईं और मामले को दबाने या दिखाने के लिए कड़े आदेश जारी कर दिए गए। लेकिन प्रशासनिक घोड़ों की इस अंधी दौड़ में सबसे बड़ी और चटपटी पहेली तो यह बनी हुई है कि जांच की गाड़ी इतने महीनों का लंबा सफर तय करने के बाद भी किस अनजान, वीरान स्टेशन पर जाकर खड़ी है और उस पर धूल की कितनी मोटी परत चढ़ चुकी है।
हजूर 👉 इस पूरे सनसनीखेज और रंगीन मामले की परत-दर-परत खाल उधेड़ें तो पूरी पटकथा जंगल की गहरी जड़ों की खुदाई की तकनीकों और उनके पीछे छिपाए गए करोड़ों रुपये के भारी-भरकम बजट की काली बंदरबांट के इर्द-गिर्द बुनी गई है। सरकारी नियमों की गल चुकी किताब के पन्नों को पलटकर देखें तो गरीब मजदूरों के खून-पसीने से जड़ खुदान कराने की तय सरकारी दर 1260 रुपये प्रति घनमीटर निर्धारित है, जबकि वही काम दैत्य जैसी भारी-भरकम मशीनों के जरिए निपटाने की दर आधी यानी महज 630 रुपये प्रति घनमीटर बैठती है। शिकायत में सीधे तौर पर यह सनसनीखेज तीर छोड़ा गया है कि जंगलों के सन्नाटे में काम तो जेसीबी और पोकलैंड जैसी गर्जन करती मशीनों की आवाजों के बीच गुपचुप तरीके से रातों-रात निपटा दिया गया, मगर जब कागजों का पेट भरने और सरकारी खजाना चूंसने की बारी आई, तो फाइलों में बेचारों, नंगे पैर घूमते मजदूरों का काल्पनिक पसीना बहता हुआ दिखाया गया। अगर इस संगीन आरोप में रत्ती भर भी सच्चाई निकलती है, तो यह केवल बजट का मामूली हेरफेर या हेराफेरी नहीं है, बल्कि नाप-जोख की सरकारी किताबों से लेकर डिपो में माल पास करने वाले बड़े-बड़े साहबों की बिकी हुई ईमानदारी का खुलेआम जनाजा निकलने जैसा है।
हजूर 👉 मामला सिर्फ मशीनों के शोर और मजदूरों के रेट में हेरफेर तक ही सीमित रहकर ठंडा नहीं पड़ा, बल्कि मस्टर रोल के पन्नों पर दर्ज फर्जी और फर्जीवाड़े से भरे नामों की लंबी फेहरिस्त ने इस प्रशासनिक ड्रामे में जबर्दस्त तड़का लगा दिया है। कागजी मजदूरी का मोटा गबन पचाने और अपनी जेबें भरने के लिए सरकारी डायरियों में उन खुशनसीब लोगों के नाम धड़ल्ले से चढ़ा दिए गए, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी कुल्हाड़ी, बेलचा या फावड़ा हाथ में पकड़कर मिट्टी तक नहीं छुई होगी। हवा में तैरती शिकायतों और गॉसिप के मुताबिक मस्टर रोल में ऐसी बुजुर्ग और लाचार महिलाओं के नाम शामिल हैं जो अपने घर के आंगन से बाहर कदम तक नहीं रखतीं, दिन-रात किताबों में आंखें फोड़ने वाले नौजवान विद्यार्थियों के नाम पसीना बहाने वालों में दर्ज हैं, शहर में अपनी बड़ी-बड़ी दुकानें चमकाने वाले रसूखदार कारोबारियों के नाम मजदूरी कूटते दिख रहे हैं और हद तो तब हो गई जब हर साल मोटा इनकम टैक्स भरने वाले अमीरजादों व अफसरों की चाटुकारी करने वाले चहेतों के नाम भी सरकारी पन्नों पर फावड़ा चलाते पाए गए हैं। हालांकि इस जालसाजी की असली परतें तो बैंक खातों की बारीक एंट्री, आधार से जुड़ी डिजिटल हाजिरी के रिकॉर्ड और मौके की सख्त जमीनी पड़ताल के बाद ही खुलकर सामने आ पाएंगी।
हजूर 👉 जंगलों की खामोश गहराइयों में जड़ों की इस काली खुदाई के खेल में नाप-जोख और वजन का एक और दिमाग की नसें फाड़ देने वाला पहलू खुलकर सामने आ रहा है। शिकायत की मानें तो अधिकारियों और ठेकेदारों के इस नापाक गठजोड़ ने केवल खुदाई के तरीके में ही डाका नहीं डाला, बल्कि जड़ों के आयतन यानी घनफल को कागजों पर फर्जी तरीके से आसमान पर पहुंचाने के लिए उसमें मिट्टी, कंकड़, बजरी और भारी पत्थरों की ऐसी बेजोड़ मिलावट का नुस्खा आजमाया कि लकड़ी का वजन कागजों पर कई गुना ज्यादा भारी हो गया। हल्द्वानी पूर्वी लॉगिंग प्रभाग के पांच प्रमुख लॉटों की निविदाओं को जलते हुए सबूत के तौर पर सामने रखकर अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि यांत्रिक खुदान की असली लागत और पास की गई मोटी दरों का पाई-पाई का हिसाब जनता के सामने क्यों नहीं रखा जा रहा। अगर जांच की निष्पक्ष तराजू पर ये कागजात गलत तुले पाए जाते हैं, तो उंगली सीधे उन चमकदार, महंगे सूट पहनने वाले हाथों पर उठेगी जिन्होंने जंगलों से निकलकर डिपो तक पहुंचे माल के फर्जी कागजात पर आंखें बंद करके अपनी मुहरें चिपकाई थीं।
हजूर 👉 इस पूरी धांधली में जारी जांच की दास्तान खुद किसी सस्पेंस, ड्रामे और थ्रिलर से भरपूर वेब सीरीज से कम नहीं लग रही है। शासन स्तर पर प्रमुख सचिव से हरी झंडी मिलने के बाद फाइल प्रबंध निदेशक कार्यालय से होती हुई कुमाऊँ क्षेत्र के महाप्रबंधक दफ्तर पहुंची और वहां से इस जांच का पूरा जिम्मा क्षेत्रीय प्रबंधक मयंक शंकर झा की झोली में डाल दिया गया। लेकिन शिकायतकर्ता का सीधा और करारा आरोप है कि जिस जांच को बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़कर भ्रष्टाचारियों की धड़कनें बढ़ा देनी चाहिए थी, वह किसी बूढ़े, लाचार कछुए की चाल से भी धीमी गति से रेंग रही है। फिलहाल किसी अधिकारी को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करके मुजरिम ठहराना जल्दबाजी होगी, पर यह सवाल उठना तो तय है कि इतने महीनों की लंबी खामोशी में आखिर कितने अफसरों और कर्मचारियों के कलमबंद बयान दर्ज किए गए, कौन-कौन से फर्जी मस्टर रोल जब्त करके खंगाले गए और आखिर किस साहब की मेज की सबसे निचली दराज में जांच की अंतिम रिपोर्ट बंद पड़ी-पड़ी सड़ रही है।
हजूर 👉 इस गबन की पूरी रंगीन पटकथा में ई-स्टाम्प का दाखिल होना एक बेहद नाटकीय और संदिग्ध मोड़ लेकर आया है। शिकायत की कानूनी पुष्टि और अपनी बात की सत्यता की कसम खाने के लिए शिकायतकर्ता से बाकायदा ई-स्टाम्प जमा कराया गया था। अब प्रशासनिक गलियारों में यह नया बवाल खड़ा हो गया है कि उस लीगल दस्तावेज पर जांच अधिकारी का नाम और पद किस नियम, किस कानून या किस गुप्त प्रक्रिया के तहत दर्ज किया गया। ई-स्टाम्प की लिखावट, उसकी जारी होने की रहस्यमयी तारीख और उसमें तय की गई अधिकारियों की शर्तें वे अहम साक्ष्य बन चुके हैं, जो इस पूरी जांच प्रक्रिया की नीयत, नीतियां और निष्पक्षता पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर रहे हैं।
हजूर 👉 समय का पहिया अपनी रफ्तार से घूमता रहा और 25 मार्च 2026 की तारीख का एक नया सरकारी पत्र इस ठंडे पड़े मामले की टाइमलाइन में एक और पेचीदा और उलझी हुई कड़ी जोड़ गया। अगर इतने लंबे समय से केवल पत्राचार, चिट्ठी-पत्री और कागजी लीपापोती का ही खेल खेला जा रहा है और जमीनी नतीजे का दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं है, तो उत्तराखंड वन निगम की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता के सामने आकर सच उगले। आखिर असली माजरा क्या है, क्या पुराने मस्टर रोल और लकड़ी के रिकॉर्ड जानबूझकर आग के हवाले कर दिए गए या गायब कर दिए गए हैं, क्या फर्जी गवाहों को तलाशने में पसीने छूट रहे हैं या फिर पूरा मामला फाइल को हमेशा-हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में दबा देने की पुरानी, सुस्त प्रशासनिक नीति का शिकार हो चुका है।
हजूर 👉 जब सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत मांगी गई तीखी और चुभने वाली जानकारियों पर भी पर्दा डालने की पुरजोर कोशिश की गई, तो यह पूरा मामला आखिरकार राज्य सूचना आयोग की चौखट तक जा पहुंचा। अब पूरी तरह से गेंद वन निगम, जांच अधिकारियों और शासन के पाले में आ गिरी है। आम जनता के पास चार बिल्कुल सीधे, कड़वे और बेबाक सवाल मौजूद हैं कि क्या सचमुच जंगलों में पसीना गरीब मजदूरों ने बहाया था या फिर सिर्फ मशीनों का डीजल जलाकर मलाई खाई गई, लाखों-करोड़ों के फर्जी भुगतान का असली आधार कौन से कागजात बने थे, ई-स्टाम्प पर लिखे गए जांच अधिकारी के नाम का असली राज क्या है और आखिरकार इस बहुचर्चित, चटपटी जांच की निष्पक्ष रिपोर्ट जनता के सामने कब तक सार्वजनिक की जाएगी। पेड़ों की जड़ें भले ही जंगल की गहराइयों में दबी हुई थीं, लेकिन अब पूरे प्रदेश की निगाहें उत्तराखंड शासन की फाइलों की जड़ों में छिपे इस काले सच पर टिकी हुई हैं।

