हजूर 👉सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख👉 सात मोड़ में चौड़ी सड़क की सनक पर पड़ा ‘गजराज’ की राह का ब्रेक

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जंगल जासूस 👉

हजूर 👉सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख👉 सात मोड़ में चौड़ी सड़क की सनक पर पड़ा ‘गजराज’ की राह का ब्रेक

हजूर 👉उत्तराखंड के वन विभाग में इन दिनों जबरदस्त खलबली मची हुई है। एक तरफ देहरादून-ऋषिकेश मार्ग पर सात मोड़ के हरे-भरे जंगलों पर आरी चलाने का पूरा प्लान सेट था, तो दूसरी तरफ देश की सबसे बड़ी अदालत ने ऐसा हथौड़ा चलाया है कि बड़े-बड़े हाकिमों के पसीने छूट गए हैं। विकास के नाम पर जंगलों का सीना चीरने वालों को सुप्रीम कोर्ट ने साफ चेतावनी दे दी है कि चौड़ी सड़कों की सनक में हाथियों का रास्ता छेकना अब मुमकिन नहीं होगा। अदालत ने देश भर के एलीफेंट कॉरिडोर की जमीनी हकीकत का नए सिरे से कच्चा-चिट्ठा मांग लिया है। केंद्र सरकार को स्पष्ट फरमान जारी किया गया है कि राज्यों ने हाथियों के पौराणिक और पारंपरिक रास्तों को बचाने के लिए अब तक क्या तीर मारे हैं, इसकी पाई-पाई का हिसाब दिया जाए। कोर्ट की तल्खी से यह शीशे की तरह साफ है कि इंसानी नुकसान या प्रॉपर्टी के बचाव का बहाना बनाकर गजराज की राह में कोई पक्की दीवार या लोहे की बाड़ खड़ी करने की चालाकी अब नहीं चलेगी।

हजूर 👉हाथी कोई सड़क पर चलने वाला आम मुसाफिर नहीं है, जो ट्रैफिक देखकर अपनी गली बदल ले या बोर्ड पढ़कर यू-टर्न मार ले। सदियों से जिन पगडंडियों पर इनके कुनबे चलते आए हैं, वे उनकी नस-नस में बसे प्राकृतिक नक्शे हैं। लेकिन तरक्की के चकाचौंध में अंधी हुई व्यवस्था ने जंगलों के बीचोबीच कंक्रीट की सड़कें बिछा दीं, पटरियों का जाल फैला दिया और रिज़ॉर्ट बनाकर हाथियों के घर में ही डाका डाल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस दर्द पर सीधा प्रहार करते हुए माना कि ये कॉरिडोर किसी राज्य की बपौती या सीमा में बंधे टुकड़े नहीं हैं, बल्कि यह एक विशाल प्राकृतिक तंत्र है। अगर एक राज्य अपनी मनमानी करके दीवार खड़ी कर दे, तो उसका भयानक खामियाजा पूरे पारिस्थिकी तंत्र को भुगतना पड़ता है।

हजूर 👉अदालत का यह रुख सिर्फ एसी कमरों में बैठकर बनाए गए सरकारी नक्शों तक सीमित नहीं है। जज साहबान ने सीधे पूछ लिया है कि जमीन पर असली सच क्या है। सरकार को सर्वे करके यह बेनकाब करना होगा कि आखिर कहां-कहां हाथियों की राह में इंसानी लालच की रुकावटें खड़ी की गई हैं और राज्यों ने उन पर क्या दंडात्मक कार्रवाई की है। मतलब साफ है कि कागजों पर बनी खूबसूरत रिपोर्ट तब तक रद्दी का टुकड़ा है, जब तक हाथी जमीन पर बेखौफ न घूम सके। इसके साथ ही कोर्ट ने हाथियों को डराने-धमकाने के लिए इस्तेमाल होने वाली हुल्ला पार्टियों, धधकती मशालों और आग के गोलों जैसे बर्बर तरीकों पर भी कड़ा चाबुक चलाया है।

हजूर 👉अब जरा उत्तराखंड के सात मोड़ की जमीनी कहानी भी समझ लीजिए। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर सैकड़ों पेड़ों को काटने का पूरा खाका तैयार था, लेकिन पर्यावरणप्रेमी भी सड़क पर उतर आए कि आखिर विकास की इस भूख में बेजुबानों का क्या होगा। अफसर अक्सर अंडरपास और एलिवेटेड रोड का झुनझुना थमाकर पल्ला झाड़ लेते हैं, मगर सुप्रीम कोर्ट के इस नए रुख के बाद अब असली पेंच फंसा है। सवाल यह उठ गया है कि ये तथाकथित वन्यजीव अनुकूल उपाय सिर्फ बजट ठिकाने लगाने का जरिया हैं या सच में हाथियों की सहूलियत को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।

हजूर 👉बात अब सिर्फ इस पर खत्म नहीं होती कि सात मोड़ पर कितने पेड़ कटेंगे या कितनी कंक्रीट बिछेगी। असली बारूद इस सवाल में है कि सड़क बनने के बाद जब गाड़ियां सन्नाटा चीरेंगी, तो हाथी कहां जाएंगे। अगर किसी प्रोजेक्ट की वजह से हाथियों का पौराणिक रास्ता टूटता है या उन्हें जबरन किसी दूसरी तरफ धकेला जाता है, तो इस पर्यावरणीय बर्बादी का जिम्मेदार कौन होगा। सुप्रीम कोर्ट के देशव्यापी सर्वे के आदेश ने उत्तराखंड के वन महकमे की नींद उड़ा दी है, क्योंकि अब नक्शे पर खींची गई गुलाबी लाइनों और जंगल में हाथी के भारी-भरकम पैरों से बनी असली पगडंडी का फर्क अदालत के सामने पूरी तरह नंगा होने वाला है।

हजूर 👉मजेदार बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मानव-वन्यजीव संघर्ष का रोना रोकर हाथियों के रास्ते बंद करने वाली चालबाजी को भी सिरे से खारिज कर दिया है। अगर किसी गांव में फसल का नुकसान होता है तो उसका वैज्ञानिक हल निकालिए, हाथियों के घर का दरवाजा बंद कर देना कोई समाधान नहीं है। यह उत्तराखंड के उन तमाम प्रोजेक्ट्स के लिए करारा तमाचा है, जो विकास के नाम पर जंगल और वन्यजीवों की बलि चढ़ाने को उतावले रहते हैं।

हजूर 👉सात मोड़ का यह विरोध अब सिर्फ दो किलोमीटर की सड़क का मामला नहीं रहा, बल्कि यह एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय बहस बन चुका है। पेड़ काटकर सड़क चौड़ी करना किसी ठेकेदार का काम तो हो सकता है, लेकिन उसी रास्ते से विशालकाय हाथियों को सुरक्षित गुजारना असली बुद्धिमत्ता है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 अक्टूबर की तारीख मुकर्रर की है, जहां केंद्र सरकार को पूरे देश का सर्वे पेश करना होगा।

हजूर 👉जंगल जासूस का सीधा और चुभता सवाल वन विभाग के बड़े साहबों से है कि विकास का यह कैसा मॉडल है जहां इंसानी गाड़ियों की रफ्तार के लिए वन्यजीवों के पांव बांधे जा रहे हैं। सात मोड़ पर बनने वाले अंडरपास क्या वाकई हाथियों की चाल-ढाल का अध्ययन करके तय हुए हैं या सिर्फ कागजी खानापूर्ति है। इंसान की गाड़ियों के लिए तो लाखों विकल्प हो सकते हैं, मगर हाथियों के पास अपने सदियों पुराने रास्ते के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। अब देखना यह है कि एसी कमरों में बैठी सरकारी फाइलें सुप्रीम कोर्ट के इस चाबुक के बाद सुधरती हैं या फिर पुरानी ढर्रे पर ही दौड़ती हैं।

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