जंगल जासूस 👉
हजूर 👉डीएफओ के कड़क हुकुम पर भारी कुर्सी का ‘जादुई गोंद’, मनोरा रेंज में रेंजर का खुला ‘सिस्टम शॉक’! dfo बोले अंडर प्रोसेस?
हजूर 👉 नैनीताल वन प्रभाग की मनोरा रेंज इन दिनों जंगल की हरियाली से ज्यादा एक सरकारी कुर्सी को लेकर चर्चा में है। मामला ऐसा है कि कागज पर नए रेंजर उमेश चन्द्र जोशी की तैनाती हो चुकी है, आदेश जारी हो चुका है, लेकिन जमीनी तस्वीर अब भी पूरी तरह बदली नजर नहीं आ रही। पहाड़ की मशहूर कहावत है जांस्या को ब्या, उंस्या को नाच, यानी शादी किसी और की और नाच कोई दूसरा रहा है। मनोरा रेंज का मौजूदा हाल इसी कहावत को चरितार्थ करता दिखाई दे रहा है। सवाल सीधा है कि जब नई तैनाती का आदेश जारी हो चुका है तो अतिरिक्त प्रभार की पुरानी व्यवस्था आखिर अब तक क्यों खिंच रही है। मामला महज एक कुर्सी का नहीं बल्कि सरकारी आदेश की प्रतिष्ठा और विभागीय अनुशासन का है।
हजूर 👉मामले की शुरुआत पूर्व रेंजर मुकुल शर्मा के सेवानिवृत्त होने के बाद हुई, जब मनोरा रेंज की खाली हुई जिम्मेदारी को संभालने के लिए बडोन रेंज के रेंजर नितिन पंत को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। उस समय यह व्यवस्था स्वाभाविक थी, क्योंकि रेंज का कामकाज रुक नहीं सकता था। लेकिन कहानी ने तब करवट ली जब गढ़वाल से स्थानांतरित होकर आए रेंजर उमेश चन्द्र जोशी की मनोरा में तैनाती की गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 29 जुलाई को नैनीताल के डीएफओ आकाश गंगवार ने बाकायदा आदेश जारी कर नए रेंजर को जिम्मेदारी सौंपने और अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे नितिन पंत से प्रभार हस्तांतरित कराने की प्रक्रिया तय की। कागज पर आदेश साफ था, जिम्मेदारी स्पष्ट थी और व्यवस्था बदलनी थी, मगर सवाल यह है कि आदेश की स्याही सूखने के बाद भी उसकी जमीन पर तस्वीर क्यों नहीं बदली।
हजूर 👉सरकारी दफ्तरों में फाइल का अंडर प्रोसेस होना आम बात है, लेकिन यहां सवाल उस प्रक्रिया की गति का है। 29 जुलाई का आदेश जारी होने के बाद भी यदि प्रभार हस्तांतरण लंबित है तो आखिर फाइल किस मोड़ पर अटकी है। क्या कोई दस्तावेज अधूरा है, कोई तकनीकी अड़चन है, कोई प्रशासनिक स्वीकृति बाकी है या फिर फाइल सरकारी टेबलों के बीच घूमते घूमते खुद थक गई है। अगर वास्तविक अड़चन है तो विभाग को उसे स्पष्ट करना चाहिए। किस स्तर पर मामला लंबित है, किस अधिकारी के पास फाइल रही और अब तक क्या कार्रवाई हुई, यह जानकारी सामने आए तो तस्वीर साफ हो सकती है। सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि अतिरिक्त प्रभार कोई स्थायी व्यवस्था नहीं होता। नियमित अधिकारी की तैनाती के बाद जिम्मेदारी हस्तांतरण की प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक खींचना अपने आप में प्रशासनिक सवाल पैदा करता है।
हजूर 👉जब इस मामले में नैनीताल के डीएफओ आकाश गंगवार से जवाब मांगा गया तो उनका कहना था कि स्थानांतरण का आदेश जारी कर दिया गया है, लेकिन प्रक्रिया अभी अंडर प्रोसेस में चल रही है और एक सप्ताह के भीतर हस्तांतरण पूरा कर लिया जाएगा। डीएफओ का यह बयान अब पूरे मामले का अहम हिस्सा बन गया है। सवाल यह नहीं कि एक सप्ताह और क्यों चाहिए, सवाल यह है कि 29 जुलाई से अब तक क्या प्रक्रिया चलती रही। अगर प्रक्रिया सामान्य थी तो लगभग तीन सप्ताह से अधिक समय क्यों लगा। अगर कोई अड़चन थी तो उसे पहले क्यों नहीं बताया गया। और अगर अब एक सप्ताह में काम पूरा हो सकता है तो पहले इतने दिनों तक मामला क्यों खिंचता रहा। यही वह जगह है जहां विभागीय पारदर्शिता की जरूरत सबसे ज्यादा महसूस होती है।
हजूर 👉मनोरा रेंज कोई मामूली प्रशासनिक चौकी नहीं है। यहां वन सुरक्षा, गश्त, वन्यजीव संरक्षण, अवैध कटान की रोकथाम, वन संपदा की निगरानी और कर्मचारियों के संचालन जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां जुड़ी हैं। ऐसे में यदि एक ओर नियमित तैनाती वाला अधिकारी मौजूद है और दूसरी ओर अतिरिक्त प्रभार संभालने वाला अधिकारी भी जिम्मेदारी में बना हुआ है तो विभाग को यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वास्तविक प्रशासनिक कमान किसके पास है। कौन आदेश जारी कर रहा है, किस अधिकारी के निर्देश पर कर्मचारी काम कर रहे हैं, फाइलों पर निर्णय कौन ले रहा है और किसी संवेदनशील घटना की स्थिति में जवाबदेही किसकी होगी। जंगल में कमान जितनी स्पष्ट होगी, व्यवस्था उतनी मजबूत होगी। दोहरी या अस्पष्ट जिम्मेदारी लंबे समय तक रहे तो नीचे तक भ्रम की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।
हजूर 👉यहां किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत रूप से कुर्सी से चिपके रहने या आदेश की अवहेलना करने का आरोप लगाना उचित नहीं होगा, क्योंकि वास्तविक स्थिति विभागीय रिकॉर्ड से ही तय होगी। लेकिन सवाल पूछना पूरी तरह जायज है। यदि नितिन पंत को अतिरिक्त प्रभार विभागीय आदेश से मिला था तो वह उसी आदेश के तहत जिम्मेदारी निभा रहे थे। अब यदि नियमित रेंजर की तैनाती हो चुकी है तो अतिरिक्त प्रभार समाप्त करने की प्रक्रिया भी स्पष्ट और समयबद्ध होनी चाहिए। विभाग को यह बताना चाहिए कि उमेश चन्द्र जोशी ने कार्यभार ग्रहण किया है या नहीं, यदि नहीं किया तो कारण क्या है और नितिन पंत का अतिरिक्त प्रभार कब तक प्रभावी रहेगा। यही पारदर्शिता किसी भी तरह की गलतफहमी को खत्म कर सकती है।
हजूर 👉अब निगाहें डीएफओ आकाश गंगवार के एक सप्ताह के आश्वासन पर टिक गई हैं। यदि तय समय में उमेश चन्द्र जोशी को विधिवत मनोरा रेंज का प्रभार मिल जाता है तो मामला प्रशासनिक प्रक्रिया की देरी मानकर आगे बढ़ सकता है। लेकिन यदि एक सप्ताह बाद भी अंडर प्रोसेस की वही कहानी, अतिरिक्त प्रभार की वही स्थिति और कुर्सी को लेकर वही सवाल सामने आते हैं तो स्वाभाविक रूप से मामला और गंभीर नजर आएगा। जंगल जासूस का सवाल किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बल्कि व्यवस्था से है कि 29 जुलाई के आदेश की वर्तमान स्थिति क्या है, मनोरा रेंज की वास्तविक कमान इस समय किसके पास है और प्रभार हस्तांतरण में देरी का लिखित कारण क्या है। सरकारी कुर्सी किसी की निजी जागीर नहीं होती। अधिकारी आते हैं, जिम्मेदारी संभालते हैं और समय आने पर आगे बढ़ते हैं, लेकिन सरकारी आदेश की गरिमा और प्रशासनिक अनुशासन कायम रहना चाहिए। अब देखना यही है कि मनोरा रेंज में आखिर जीत सरकारी आदेश की होती है या अंडर प्रोसेस की फाइल एक बार फिर कुर्सी के इर्दगिर्द चक्कर काटती दिखाई देती है।

