जंगल जासूस 👉
हजूर 👉वाह रे वन निगम! नियमों की बजाई सीटी तो कटा अटैचमेंट का टिकट, घाटे का प्रभाग लाया मुनाफे में फिर भी पांच महीने से दफ्तर में कैद!
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल आग की तरह फैल रहा है👉नियमों की सीटी बजाई तो क्या इनाम में अटैचमेंट का टिकट मिलना तय है? मामला वन विभाग से वन निगम में प्रतिनियुक्ति पर आए उप प्रभागीय वनाधिकारी (SDO) ललित कुमार का है, जिन्हें फील्ड में रहकर निगम का खजाना भरना था, लेकिन वह पिछले करीब पांच महीने से हल्द्वानी स्थित महाप्रबंधक (GM) कार्यालय में अटैच होकर फाइलों के पन्ने पलटने को मजबूर हैं।
हजूर 👉दूसरी तरफ निगम का प्रशासनिक आलम यह है कि अफसरों के अकाल के चलते व्यवस्थाएं हांफ रही हैं। जिला लौगिग प्रभागों में एक-एक अधिकारी पर अतिरिक्त प्रभार की भारी-भरकम गठरी लाद दी गई है और कई DLM अतिरिक्त जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर दौड़ रहे हैं। अब जब कुर्सियां अतिरिक्त प्रभार की बैसाखियों पर ही घिसटनी हैं, तो फील्ड में उतरकर दौड़-धूप करने वाले अफसर को महीनों तक जीएम दफ्तर के कोने में बिठाए रखने का कौन सा नया प्रशासनिक गणित है, इसका जवाब फाइलों से बाहर नहीं आ पा रहा।
हजूर 👉असली चटपटा मसाला तो उस बदनसीब प्रभाग की दास्तान में छुपा है, जहां ललित कुमार की तैनाती हुई थी। चर्चा है कि वह प्रभाग पिछले करीब तीन सालों से घाटे के ऐसे गहरे दलदल में धंसा था, जहां से निकलने का रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा था। फाइलें दौड़ रही थीं, अफसर बदल रहे थे, दफ्तर चल रहे थे, लेकिन बैलेंस शीट हमेशा घाटे की लाल स्याही से ही रंगी जाती थी।
हजूर 👉फिर उस प्रभाग में SDO ललित कुमार की एंट्री होती है👉दिन-रात का धुआंधार फील्ड निरीक्षण, लीकेज पर कड़ाई, कर्मचारियों से सही काम लेने का हुनर और निगम के मुनाफे पर सीधा फोकस। नतीजा यह निकला कि तीन साल से टंगा घाटे का बोर्ड उतर गया और प्रभाग में मुनाफे की घंटी बजने लगी। निगम के सरकारी बही-खाते में राजस्व की शानदार बढ़ोतरी दर्ज हुई। लेकिन हुजूर, सिस्टम का दस्तूर देखिए, जैसे ही खजाने में पैसे चमके और मुनाफे की घंटी बजी, अफसर की फील्ड ड्यूटी ही खत्म कर दी गई!
हजूर 👉कहानी का सबसे तीखा तड़का खनन के उस खेल से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां नियमों की किताब खोलते ही कइयों के हाथ-पांव फूल जाते हैं। चर्चा जोरों पर है कि ललित कुमार ने खनन क्षेत्रों में नियम-कानून का वह सख्त डंडा चलाया, जिसने कई सहूलियत-पसंद लोगों की रातों की नींद हराम कर दी। जहां कानून था, वहां सिर्फ कानून की बात हुई, जहां अवैध खनन और राजस्व चोरी पर लगाम कसनी थी, वहां कड़ाई दिखाई गई और जहां सरकारी राजस्व का एक पैसा भी फंसा था, वहां निगम के हित को ढाल बना दिया गया।
हजूर 👉अब जंगल जासूस का सवाल बिल्कुल सीधा है👉अगर कोई अफसर सरकारी राजस्व बचाने के लिए नियमों की सीटी बजा दे और कहे कि काम सिर्फ कायदे से होगा, तो क्या यह उसकी निष्ठा है या उसकी सबसे बड़ी खता? और अगर इसी ईमानदारी और कड़ाई के बदले उसे फील्ड से उखाड़कर महीनों के लिए लूप लाइन में फेंक दिया जाए, तो सवाल तो उठेगा ही कि नियमों की सीटी किसके कान में ज्यादा तेज बज गई?
हजूर 👉अटैचमेंट की यह खिचड़ी भी कम दिलचस्प नहीं है। हफ्ता-दस दिन या महीने भर की बात होती तो प्रशासनिक मजबूरी मान लेते, लेकिन यहां तो करीब पांच महीने से फाइल पर बर्फ जमी हुई है। सरकारी तंत्र में अटैचमेंट किसी अस्थाई व्यवस्था का नाम होता है, लेकिन जब यह सजा की तरह लंबी खींचने लगे, तो दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली नजर आने लगती है।आखिर अटैचमेंट आदेश में कारण क्या लिखा है? आदेश किस साहब की कलम से निकला? क्या किसी गोपनीय शिकायत पर गाज गिरी या फिर यह सिर्फ किसी की खुन्नस निकालने का जरिया है?
हजूर 👉उधर वन निगम के बाकी अधिकारियों के लिए भी यह मामला एक बड़ा सबक बनता जा रहा है। अगर फील्ड में तैनात अफसर यह सोचने लगे कि निगम के हित में काम किया या खनन में जरा भी कड़ाई दिखाई तो इनाम के तौर पर अटैचमेंट की पर्ची थमा दी जाएगी, तो फिर कोई अफसर नियमों को लागू कराने का जोखिम क्यों उठाएगा? निगम को तो ऐसे जांबाज अफसर चाहिए जो राजस्व बचाएं और घाटे को मुनाफे में बदलें। अगर ऐसे किसी अफसर को बिना वजह हटाया जाता है, तो वजह बिल्कुल साफ और पारदर्शी होनी चाहिए।
हजूर 👉अब जरा बही-खाता खोलकर हिसाब का गणित भी समझ लीजिए। ललित कुमार के आने से पहले तीन सालों में प्रभाग कितना घाटे में था? उनके कार्यकाल में राजस्व का ग्राफ कितना ऊपर चढ़ा? खनन के मद में निगम को कितनी अतिरिक्त आय हुई, कितना खर्च घटा और रुकी हुई वसूली कितनी दर्ज हुई? अगर आंकड़े चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं कि प्रभाग घाटे से निकलकर सीधे मुनाफे के किनारे आ लगा, तो फिर यह कार्रवाई प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सीधी-साधी रंजिश की बू देती है।
हजूर 👉sdo अगर ललित कुमार के खिलाफ कोई ठोस शिकायत या जांच है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अगर काम में कोई खोट था तो रिकॉर्ड सामने रखा जाए। लेकिन अगर कोई ठोस शिकायत या जांच नहीं है और वित्तीय नतीजे मुनाफे की कहानी कह रहे हैं, तो फिर पांच महीने का यह अटैचमेंट किस प्रशासनिक मजबूरी का हिस्सा है? क्या निगम को घाटा ही पसंद है और मुनाफे से एलर्जी?
हजूर 👉जंगल जासूस का सवाल बिल्कुल साफ है👉अगर नियम-कानून से काम करना अफसर का फर्ज था, निगम का राजस्व बचाना उसकी जिम्मेदारी थी और घाटे वाले प्रभाग को लाभ में लाना उसकी उपलब्धि थी, तो फिर पांच महीने के अटैचमेंट का असली राज क्या है? वन निगम प्रशासन को अब एक पन्ने का आदेश और संबंधित प्रभाग के वित्तीय आंकड़े सार्वजनिक करके इस पूरे सस्पेंस का पर्दाफाश कर देना चाहिए।

