हजूर👉उत्तराखंड के जंगलों में बाघ की दहाड़ सुनाई दे तो समझिए जंगल जिंदा है, लेकिन जब उसी बाघ की खाल, हड्डियां और अंग तस्करों के हाथ लगें तो समझिए जंगल के बाहर लालच का शिकारी तंत्र सक्रिय है। पिछले वर्षों में उत्तराखंड में तेंदुए की खाल, बाघ की खाल व हड्डियां, हाथी दांत और भालू के अंगों की बरामदगी के मामले सामने आए हैं। वर्ष 2023 में खटीमा में करीब 11 फुट लंबी बाघ की खाल और लगभग 15 किलो हड्डियां बरामद होने का मामला सामने आया, जबकि उसी वर्ष बाजपुर में दो बाघों की खाल और करीब 35 किलो हड्डियां बरामद होने की रिपोर्ट आई। सवाल सिर्फ यह नहीं कि माल किसके पास मिला👉सवाल यह है कि जंगल में शिकार किसने किया और इस माल को बाजार तक पहुंचाने वाला असली चेहरा कौन था?
हजूर👉कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वर्ष 2021 में पिथौरागढ़ में संयुक्त कार्रवाई के दौरान तेंदुए की खाल, 27 दांत और दो भालू के पित्त बरामद होने का अभिलेख सामने आता है। यानी तस्करों की नजर सिर्फ खाल पर नहीं, वन्यजीव के शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर है। बाघ हो या तेंदुआ, जंगल में इनकी कीमत जीवन और पारिस्थितिकी संतुलन में है, लेकिन तस्करी के काले बाजार में इनके अंगों की कीमत लगाई जाती है। बाघ को जंगल का राजा कहने वाला समाज अगर उसकी खाल का खरीदार भी बन जाए तो असली खतरा जंगल में नहीं, इंसान की लालच भरी सोच में है।
हजूर 👉अब जरा अंतरराष्ट्रीय काले बाजार का खेल समझिए। पुराने अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में बाघ की खाल के लिए 20 हजार अमेरिकी डॉलर तक और कच्ची बाघ की हड्डियों के लिए करीब 1,200 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम तक के अवैध बाजार मूल्य के उदाहरण मिलते हैं। हाथी दांत और पैंगोलिन के शल्कों के लिए भी बड़ी रकम के पुराने अंतरराष्ट्रीय अनुमान दर्ज हैं। ध्यान रहे, ये पुराने अनुमान हैं, कोई सरकारी या वर्तमान बाजार दर नहीं। लेकिन इन आंकड़ों से इतना जरूर समझ आता है कि वन्यजीवों का शिकार सिर्फ बंदूक का मामला नहीं👉इसके पीछे पैसा, मांग और बिचौलियों का बड़ा खेल हो सकता है। जंगल में एक बाघ की जान जाती है और कहीं दूर बैठे किसी लालची व्यक्ति के लिए वही मौत कथित कमाई का सौदा बन जाती है।
हजूर👉अदालत ने भी ऐसे मामलों में शिकंजा कसा है। हरिद्वार की अदालत ने तेंदुए की खाल और हड्डियों की तस्करी के एक मामले में दो दोषियों को सात-सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। यह फैसला एक सीधा संदेश है👉अगर जांच मजबूत हो, सबूत पुख्ता हों और अभियोजन प्रभावी हो तो वन्यजीव अपराधी कानून से बच नहीं सकते। लेकिन जंगल जासूस का सवाल फिर वही है👉क्या हर मामले में जांच आखिरी कड़ी से आगे बढ़कर असली संचालक तक पहुंचती है? क्योंकि माल लेकर चलने वाला पकड़ा गया और मामला बंद हो गया तो असली खेल खेलने वाला कहीं और बैठकर अगली चाल चल सकता है।
हजूर👉2026 में भी वन्यजीव अंगों की बरामदगी की खबरें सामने आना चिंता की बात है। पौड़ी में तेंदुए की खाल और खटीमा क्षेत्र में हाथी दांत से जुड़े मामले सामने आए। यानी गिरफ्तारी और बरामदगी के बावजूद खतरा खत्म नहीं हुआ। अब हर कार्रवाई की असली सफलता यह होनी चाहिए कि जांच केवल वाहक तक न रुके। पैसा किसने लगाया? सौदा किसने कराया? माल कहां से आया? खरीदार कौन था? ये सवाल जांच की रीढ़ बनने चाहिए। जंगल में कैमरा ट्रैप से बाघ की चाल पकड़ी जा सकती है, तो तस्करी के नेटवर्क में पैसों की चाल भी पकड़ी जानी चाहिए।
हजूर 👉अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बताता है कि यह खेल किसी एक राज्य की सीमा में बंद नहीं है। वर्ष 2018 की एक बड़ी वैश्विक कार्रवाई में 92 देशों की एजेंसियां शामिल हुईं और करीब 1,974 बरामदगी के साथ लगभग 1,400 संदिग्धों की पहचान हुई। बड़ी मात्रा में हाथी दांत और पैंगोलिन शल्क समेत वन्यजीव सामग्री पकड़ी गई। यानी वन्यजीव तस्करी की जड़ें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक जाती हैं। उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यहां जंगल से लेकर अंतरराज्यीय सीमाओं तक निगरानी और खुफिया तंत्र को मजबूत रखना और भी जरूरी हो जाता है। क्योंकि तस्कर रास्ता ढूंढता है, जंगल विभाग को उससे पहले रास्ता बंद करना होगा।
हजूर 👉अब जंगल जासूस सरकार और वन विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल रखता है👉वर्ष 2000 से आज तक उत्तराखंड में वन्यजीव अंगों की तस्करी के कितने मामले दर्ज हुए? कितने आरोपी गिरफ्तार हुए? कितनों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल हुआ? कितनों को सजा हुई और कितने मामले आज भी लंबित हैं? सबसे महत्वपूर्ण👉कितने मामलों में केवल माल ढोने वाला पकड़ा गया और कितने मामलों में कथित मुख्य संचालक तक कानून पहुंचा? क्योंकि खाल बरामद होना खबर है, लेकिन पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश असली खबर है। बाघ, तेंदुआ, हाथी और दूसरे वन्यजीव उत्तराखंड की प्राकृतिक विरासत हैं। जंगल में उनकी दहाड़ बचाना है तो सिर्फ शिकारी की बंदूक नहीं, उस बंदूक के पीछे चल रहे पैसों के खेल को भी पकड़ना होगा। यही होगी जंगल की असली जीत और तस्करों के खेल की असली हार।

