हजूर 👉कालाढूंगी में फिर चली तस्करों की आरी, गेट के पास सागौन का राज नहीं खुला अब साल भी धराशायी

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जंगल जासूस 👉

 

हजूर 👉कालाढूंगी में फिर चली तस्करों की आरी, गेट के पास सागौन का राज नहीं खुला अब साल भी धराशायी?

 

हजूर 👉कालाढूंगी रेंज में एक बार फिर अवैध पातन का मामला सामने आने से वन विभाग की गश्त और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। ताजा मामला साल के पेड़ से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि रात के अंधेरे में तस्कर जंगल में पहुंचे, साल का पेड़ काटा, उसके गिल्टे तैयार किए और वाहन में लादकर लकड़ी बाहर निकाल ले गए। सवाल सीधा है कि जब जंगल की रखवाली के लिए गश्त व्यवस्था मौजूद है तो तस्करों को पेड़ काटने से लेकर लकड़ी बाहर ले जाने तक इतना समय कैसे मिल गया?

 

हजूर 👉मामला इसलिए और गंभीर है क्योंकि पूर्व में भी कालाढूंगी रेंज में सागौन के पेड़ों का अवैध पातन सामने आया था। बताया जाता है कि वन क्षेत्राधिकारी जीवन उप्रेती के रेंज का कार्यभार संभालने के महज दो से चार दिन के भीतर ही तस्करों ने सागौन के पेड़ों को निशाना बनाया था। हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि जिन स्थानों पर वे सागौन के पेड़ काटे गए थे, वे वन उपज निकाशी गेट से कुछ ही दूरी पर थे। यानी जिस व्यवस्था में वन उपज की आवाजाही पर नजर रखी जानी चाहिए, उसके आसपास ही पेड़ों की कटाई का मामला सामने आया और आज तक उसका पूरा खुलासा नहीं हो पाया।

 

हजूर 👉अब पुराने मामले के बाद ताजा साल कटान ने सवाल और गहरा कर दिया है। तस्कर रात में जंगल में आए होंगे, पेड़ काटा होगा, उसके गिल्टे बनाए होंगे, उन्हें उठाकर वाहन तक पहुंचाया होगा और फिर वाहन से बाहर भी निकले होंगे। यह काम कुछ मिनटों का नहीं है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि संबंधित बीट में उस समय गश्त कहां थी? क्या रात्रि गश्त हो रही थी? क्या गश्ती दल ने संवेदनशील क्षेत्र की निगरानी की? क्या वन उपज निकाशी गेट और आसपास के रास्तों पर निगरानी व्यवस्था सक्रिय थी? यदि गश्त थी तो तस्कर बच निकले कैसे?

 

हजूर 👉हर बार अज्ञात के खिलाफ वन अधिनियम में मुकदमा दर्ज हो जाता है। मुकदमा दर्ज करना जरूरी है, लेकिन असली सवाल उसके बाद शुरू होता है। अज्ञात आरोपी आखिर कब ज्ञात होगा? लकड़ी कहां गई? वाहन कौन सा था? लकड़ी किस रास्ते से बाहर निकली? और क्या पुराने सागौन कटान तथा ताजा साल कटान के बीच कोई संबंध है? यदि पुराने मामले का आज तक खुलासा नहीं हुआ और अब फिर पेड़ कट गया तो केवल मुकदमा दर्ज कर देना वन सुरक्षा की सफलता नहीं माना जा सकता। जंगल को कागज का पन्ना नहीं, तस्करों तक पहुंचने वाली कार्रवाई चाहिए।

 

हजूर 👉व्यंग्य में कहें तो जंगल का कटा हुआ साल अब शायद वन विभाग से पूछ रहा होगा कि साहब, मेरी रखवाली कौन कर रहा था? अगर गश्त जंगल में हो रही थी तो तस्करों को इतनी आसानी कैसे मिली और अगर तस्कर पेड़ काटकर गिल्टे बनाकर वाहन में लादकर बाहर निकल गए तो फिर गश्त की प्रभावशीलता पर सवाल उठना लाजिमी है। स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों और रेंज अधिकारी के बीच कथित खींचतान की चर्चाएं भी हैं, हालांकि इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में बेहतर होगा कि विभाग चर्चाओं के बजाय रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर साफ करे कि संबंधित क्षेत्र में गश्त और निगरानी वास्तव में कितनी प्रभावी थी।

 

हजूर 👉अब कालाढूंगी रेंज की असली परीक्षा है। वन विभाग चाहे तो ताजा मामले के साथ पुराने सागौन कटान की फाइल भी दोबारा खंगाल सकता है। घटनास्थल की जांच, गश्त रजिस्टर की पड़ताल, वन उपज निकाशी गेट की निगरानी व्यवस्था, लकड़ी बाहर ले जाने वाले संभावित रास्तों की जांच, वाहन की पहचान और लकड़ी की बरामदगी से तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है। क्योंकि पेड़ काटना तस्करों की जीत है, लेकिन तस्करों तक पहुंचना वन विभाग की असली जीत होगी। सवाल अब सिर्फ इतना है👉गश्त जंगल में हो रही है या सिर्फ कागजों में? पहले गेट के पास सागौन कटे, राज नहीं खुला👉अब साल कट गया। अगर इस बार भी कहानी अज्ञात पर खत्म हुई तो कालाढूंगी के जंगल के वृक्षों का भगवान ही मालिक है।

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