हजूर 👉 लीज की जमीन या अरबों की सरकारी संपत्ति? कागजों में वन विभाग, स्टांप पेपर पर कथित सौदे और थाने में FIR👉जंगल जासूस ने खोली पुरानी फाइल!

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जंगल जासूस 👉

हजूर 👉 लीज की जमीन या अरबों की सरकारी संपत्ति? कागजों में वन विभाग, स्टांप पेपर पर कथित सौदे और थाने में FIR👉जंगल जासूस ने खोली पुरानी फाइल!

हजूर 👉 नैनीताल से तराई के जंगलों तक फैली वन विभाग की लीज भूमि की कहानी अब सिर्फ धूल खाती फाइलों और पुराने नक्शों का किस्सा नहीं रही। आज के संभावित बाजार मूल्य से देखा जाए तो इन जमीनों की कीमत करोड़ों से निकलकर अरबों रुपये तक पहुंचने का अनुमान हो सकता है, हालांकि इसका वास्तविक मूल्य आधिकारिक मूल्यांकन से ही तय होगा। कहीं लीज की अवधि समाप्त हो चुकी है, कहीं नवीनीकरण वर्षों से लंबित है, कहीं अतिक्रमण का सवाल है तो कहीं स्टांप पेपर और नोटरी दस्तावेजों के जरिए कथित जमीन सौदों की शिकायतें पुलिस तक पहुंच चुकी हैं। जंगल जासूस का पहला सवाल यही है👉जब जमीन का मालिकाना रिकॉर्ड वन विभाग के पास है, तो लीज समाप्त होने के बाद उसका धरातली हिसाब आखिर कितना साफ है?

हजूर 👉 नैनीताल वन प्रभाग के उपलब्ध पुराने आंकड़े इस कहानी को और दिलचस्प बनाते हैं। वर्ष 2007 में करीब 59.9315 हेक्टेयर, 2009 में 59.9310 हेक्टेयर, जबकि 2017 में करीब 33.4865 हेक्टेयर लीज भूमि का आंकड़ा सामने आता है। इन आंकड़ों में आए अंतर की वजह लीज समाप्ति, भूमि वापसी, रिकॉर्ड में बदलाव अथवा कोई अन्य प्रशासनिक कारण रहा👉इसका स्पष्ट और समेकित ब्यौरा सामने आना चाहिए। सवाल यह नहीं कि कागज पर कितने हेक्टेयर लिखे हैं, असली सवाल है👉आज मौके पर वन विभाग की कितनी लीज भूमि कहां और किस स्थिति में मौजूद है?

हजूर 👉 मार्च 2024 तक करीब 16.8272 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी, जबकि जून 2023 में अभियान के दौरान करीब 5 हेक्टेयर भूमि खाली कराने की कार्रवाई का भी उल्लेख मिलता है। वहीं वन विभाग की ओर से लीजधारकों को समय-समय पर नोटिस दिए जाने की कार्रवाई भी होती रही है। इसलिए जंगल जासूस यह नहीं पूछ रहा कि नोटिस क्यों नहीं दिए गए; सवाल इससे आगे का है👉नोटिस के बाद कितनी जमीन खाली हुई, कितने मामलों का निस्तारण हुआ, कितनी लीज का नवीनीकरण हुआ और कितनी जमीन पर आज भी विवाद या कब्जे की स्थिति बनी हुई है?

हजूर 👉 अब बागजाला की फाइल खोलिए, कहानी और पेचीदा हो जाती है! तराई पूर्वी वन प्रभाग के बागजाला क्षेत्र में वर्ष 1978 में 64 परिवारों को करीब 66.96 हेक्टेयर भूमि लीज पर दिए जाने का मामला सामने आता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस लीज की अवधि 2008 में समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद नवीनीकरण और भूमि की वर्तमान स्थिति को लेकर सवाल बने रहे। इसी बीच शिकायतों में स्टांप पेपर और नोटरी दस्तावेजों के माध्यम से कथित खरीद-फरोख्त के आरोप भी सामने आए। यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि महज स्टांप पेपर या नोटरी दस्तावेज अपने आप सरकारी वन भूमि पर वैध मालिकाना हक स्थापित नहीं करते। ऐसे किसी भी दावे की वैधता संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और लागू कानून से ही तय होगी।

हजूर 👉 और जब जमीन की कहानी थाने पहुंची तो मामला और गंभीर हो गया! कथित जमीन सौदों से जुड़ी शिकायतों के आधार पर काठगोदाम थाने में धोखाधड़ी सहित धाराओं में FIR दर्ज होने की जानकारी सामने आई। अब पुलिस जांच का विषय यह है कि संबंधित दस्तावेज किसने बनाए, किस आधार पर लेन-देन हुआ, संबंधित जमीन की वास्तविक कानूनी स्थिति क्या थी और किसी विक्रेता के पास उसे बेचने अथवा हस्तांतरित करने का अधिकार था भी या नहीं। इन आरोपों की सच्चाई और किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा। लेकिन इतना जरूर है कि मामला पुलिस तक पहुंचना लीज भूमि के रिकॉर्ड और निगरानी को और गंभीरता से देखने की जरूरत बताता है।

हजूर 👉 गेठिया हो या बागजाला👉अरबों की संभावित सरकारी संपत्ति का हिसाब सिर्फ फाइलों के भरोसे कैसे चलेगा? वन और राजस्व विभाग को मिलकर लीज भूमि की GPS आधारित पैमाइश, डिजिटल मैपिंग और पक्के सीमांकन की दिशा में पूरा रिकॉर्ड तैयार करना चाहिए। किस खसरे की कितनी जमीन लीज पर गई, लीज कब समाप्त हुई, नोटिस कब दिया गया, नवीनीकरण हुआ या नहीं, वर्तमान कब्जा किस स्थिति में है और जमीन वन विभाग को वापस मिली या नहीं👉यदि ये जानकारियां एक डिजिटल रिकॉर्ड में उपलब्ध हों तो विवाद और कथित अवैध सौदों की गुंजाइश काफी कम हो सकती है।

हजूर 👉 अब वक्त है ‘लीज भूमि महाऑडिट’ का! 1947 से 2026 तक वन विभाग की कितनी जमीन लीज पर दी गई, किसे दी गई, कितनी अवधि के लिए दी गई, कितनी लीज समाप्त हुई, कितनों का नवीनीकरण हुआ, कितनी भूमि वापस मिली, कितनी पर अतिक्रमण दर्ज है और कितने मामले पुलिस या अदालत तक पहुंचे👉इसका एकीकृत और पारदर्शी हिसाब जनता के सामने आना चाहिए। जहां कथित खरीद-फरोख्त की शिकायतें हैं वहां निष्पक्ष जांच हो और आरोप प्रमाणित होने पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो। क्योंकि यह सिर्फ कुछ हेक्टेयर जमीन का मामला नहीं है👉 संभावित बाजार मूल्य के लिहाज से यह अरबों रुपये की सरकारी वन संपत्ति की सुरक्षा का सवाल हो सकता है। जंगल जासूस की नजर अब उसी फाइल पर है👉लीज तो खत्म होती रही साहब, मगर जमीन का पूरा हिसाब कब खुलेगा?

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