हजूर 👉लालकुआं डिपो में घोटाले का जिन्न बोतल फोड़कर बाहर!👉 1.67 करोड़ का खेल, 45 लाख के बकाएदार और 71 लाख की वसूली👉वाह रे सरकारी हिसाब!

जंगल जासूस👉

हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के लालकुआं स्थित डिपो संख्या 04 और 05 में हुए करोड़ों रुपये के वित्तीय घोटाले का जिन्न एक बार फिर पूरी ताकत के साथ बोतल से बाहर आ चुका है। महकमे के शांत गलियारों से लेकर शासन के उच्च अधिकारियों के कमरों तक इस बात की जबरदस्त हलचल है कि जिस फाइल पर पर्दा डालकर दफन करने की पूरी तैयारी हो चुकी थी, उस पर अब भारी-भरकम कानूनी शिकंजा कस दिया गया है। सूत्रों का दावा है कि इस पूरे महाघोटाले की परतें उघाड़ने और साक्ष्यों के विलोपन को उजागर करने के लिए एक बेहद मजबूत, तथ्यपरक और कानूनी रूप से सख्त शिकायती पत्र सीधे जांच एजेंसियों की मेज पर पहुंचा दिया गया है। इस शिकायती पत्र के सामने आते ही निगम के संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और अनुचित लाभ लेने वाले दागदार ठेकेदारों के पसीने छूट सकते हैं।

हजूर 👉 अंदरखाने से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, इस बहुचर्चित प्रकरण का असली घटनाक्रम साल 2023 के मानसून के दौरान शुरू हुआ था। डिपो संख्या 05 में अनियमितताओं की पहली आहट मिलते ही कराई गई दो दिवसीय प्रारंभिक जांच में ही लगभग 1.67 करोड़ रुपये से अधिक की सीधी राजस्व हानि सामने आ गई थी। इसके तुरंत बाद जब दोनों डिपो का विशेष आंतरिक ऑडिट शुरू कराया गया, तो सामने आया कि वित्तीय धांधली का यह खेल केवल कुछ लाख रुपये तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार प्रशासनिक ढांचे में ऊपर तक फैले हुए थे। ऑडिट रिपोर्ट के आंकड़ों ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए निर्धारित नियमों और वित्तीय प्रक्रियाओं को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया था।

हजूर 👉 सूत्रों के हवाले से सबसे सनसनीखेज खुलासा उस प्रशासनिक मेहरबानी को लेकर सामने आ रहा है, जो घोटाला साबित होने के बाद बकाएदारों पर दिखाई गई। शिकायती पत्र में तत्कालीन क्षेत्रीय प्रबंधक को इस पूरे मामले का मुख्य जिम्मेदार माना गया है, जिनकी भूमिका की गहन जांच की मांग की गई है। आरोप है कि जब ऑडिट में करोड़ों रुपये के गबन और बकाया राशि पर मुहर लग चुकी थी, तब तत्कालीन क्षेत्रीय प्रबंधक के विवादित आदेश के जरिए सात प्रमुख बकाएदार व्यापारिक फर्मों को अभयदान दे दिया गया। इन चहेते बकाएदारों को न केवल डिपो में जब्त की गई लकड़ी और वनोपज को उठाने की खुली छूट दी गई, बल्कि भविष्य में होने वाली नीलामियों में दोबारा बोली लगाने का अवसर भी दे दिया गया। प्रशासनिक विशेषज्ञ हैरान हैं कि बिना संपूर्ण बकाया राशि सुरक्षित कराए और बिना वित्त अनुभाग की लिखित सहमति के सरकारी माल को विमुक्त करने का यह सौदा किसके इशारे पर हुआ था, जबकि आज भी इन पर 45 लाख रुपये से अधिक की देनदारी बकाया दर्ज है।

हजूर 👉 यह मामला केवल डिपो संख्या 05 तक सीमित नहीं है, बल्कि डिपो संख्या 04 की कहानी इससे भी अधिक चौंकाने वाली और संदिग्ध मानी जा रही है। सूत्रों का कहना है कि विशेष ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट संकेत मिले थे कि डिपो संख्या 04 में हुई वित्तीय गड़बड़ियों का दायरा डिपो संख्या 05 की तुलना में दोगुने से भी अधिक बड़ा था। यानी वहां सरकारी राजस्व का नुकसान और भी भारी स्तर पर हुआ था। इसके बावजूद डिपो संख्या 04 के महत्वपूर्ण अभिलेखों, लेजर खातों और वहां तैनात उत्तरदायी अधिकारियों की भूमिका की जांच को रहस्यमयी ढंग से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इस बात को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर डिपो संख्या 04 की फाइलों पर पर्दा क्यों डाला गया और वहां के जिम्मेदारों पर कार्रवाई करने से हाथ क्यों पीछे खींचे गए।

हजूर 👉 इसके अलावा, पूरे प्रकरण में विभागीय कार्रवाई और जांच की निष्पक्षता पर सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब आरोपियों की खातिरदारी का नया अध्याय शुरू हुआ। घोटाले में नाम आने पर जिन कार्मिकों को आनन-फानन में निलंबित कर वाहवाही लूटी गई थी, उन्हें कुछ ही समय बाद चुपचाप बहाल कर दिया गया। बहाली के बाद उन्हें पुनः उसी संवेदनशील बिक्री प्रभाग में तैनात कर दिया गया जहां बैठकर अनियमितताओं की पटकथा लिखी गई थी। हद तो तब हो गई जब इनमें से एक कार्मिक को पदोन्नति देकर प्रभागीय लेखाकार का प्रभार तक सौंप दिया गया, जिससे मुख्य साक्ष्यों और रिकॉर्ड्स के साथ छेड़छाड़ की प्रबल आशंका पैदा हो गई। वहीं दूसरी ओर, विशेष ऑडिट में देनदारी तय होने के बावजूद एक अन्य सेवानिवृत्त अधिकारी के देयकों का भुगतान किन परिस्थितियों में किया गया, यह भी जांच के घेरे में आ गया है।

हजूर 👉 सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसी के समक्ष प्रस्तुत इस विस्तृत शिकायती पत्र में स्पष्ट मांग की गई है कि तत्कालीन क्षेत्रीय प्रबंधक सहित पूरे मामले के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को जांच के केंद्र में रखा जाए। इसे महज एक विभागीय लापरवाही मानकर बंद करने के बजाय आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, कूटरचना और गबन की सुसंगत धाराओं के तहत देखा जाए। शिकायत में मांग की गई है कि निगम मुख्यालय से विशेष ऑडिट की मूल रिपोर्ट, क्रेतावार लेजर, नीलामी पंजी और माल विमुक्ति के विवादित आदेशों की मूल फाइलों को तुरंत कब्जे में लेकर निष्पक्ष वित्तीय सत्यापन कराया जाए। साथ ही सात क्रेताओं पर बकाया 45.51 लाख रुपये और तत्कालीन डिपो अधिकारी पर निर्धारित 71.10 लाख रुपये से अधिक की वसूली की वर्तमान स्थिति जांचकर सरकारी धन की शत-प्रतिशत रिकवरी कराई जाए।

हजूर 👉 अब देखना यह दिलचस्प होगा कि लालकुआं डिपो के इस बहुचर्चित घोटाले में आए इस नए भूचाल के बाद जांच एजेंसियां और शासन में बैठे बड़े साहब क्या रुख अपनाते हैं। क्या इस बार कार्रवाई की गाज घोटाले के असली सूत्रधारों और बड़ी मछलियों पर गिरेगी, या फिर यह जिन्न भी किसी नई फाइल के नीचे दबा दिया जाएगा, इस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं। कागजों पर धूल फांकती फाइलें भले ही चुप बैठी हों, लेकिन जब कानून का शिकंजा कसता है, तो हिसाब की एक-एक पाई का जवाब देना ही पड़ता है।

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