हजूर 👉 500 रुपये की हत्था जोड़ी 5 हजार में! जसपुर में आस्था के नाम पर चल रहा था काले कारोबार का खेल?

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जंगल जासूस👉

हजूर 👉 उत्तराखंड के जंगलों में महकती हवाओं के बीच इन दिनों एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसे देखकर ऐसा लगता है कि जंगल के कानून के रखवाले आंखें मूंदे बैठे हैं और अपराधी अपनी धुन में मस्त हैं। मामला जसपुर का है, जहां दीपावली के मुहाने पर खड़े होकर मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने महकमे को एक ऐसा सतर्कता अलर्ट थमाया था कि लगा था अब परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा। लेकिन, ठीक पच्चीस अक्टूबर को जसपुर में कोतवाली पुलिस और एसओजी काशीपुर की संयुक्त टीम ने जिस तरह से छापा मारा, उसने वन विभाग की इस कागजी सतर्कता की ऐसी बखिया उधेड़ी कि सारा सच सामने आ गया। पुलिस ने एक संदिग्ध को धर दबोचा और उसके पास से जो बरामद किया, उसे देखकर अच्छे-अच्छे सूरमाओं के होश उड़ गए। एक सौ चौदह जोड़े हत्था जोड़ी, जंगली सूअर का एक दांत और पांच मोती शंख👉 यह कोई बच्चों का खेल नहीं, बल्कि वन्यजीवों की बर्बादी का एक जीता-जागता और खौफनाक सबूत है।

हजूर 👉 अब सवाल यह उठता है कि जब खाकीधारी पुलिस अपनी मुस्तैदी से अदमय साहस से इस काले कारोबार का पर्दाफाश कर सकती है, तो जंगल की असली रखवाली का ठेका लेने वाला वन के हुकुमरान क्या गहरी नींद में सो रहे था? मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक का वह आदेश आखिर फाइलों में कहां दबा रह गया था? क्या वह चेतावनी सिर्फ इसलिए जारी की जाती है ताकि अफसर अपनी एसी कमरों की कुर्सियों पर बैठकर यह दिखा सकें कि उन्होंने अपना काम कर दिया है? आज के इस आधुनिक और डिजिटल दौर में जहां एक क्लिक पर पूरी दुनिया की खबर सेकंडों में पहुंच जाती है, क्या वह सरकारी फरमान जिम्मेदार रेंजरों और प्रभागीय अधिकारियों तक नहीं पहुंच पाया था? और अगर पहुंच गया था, तो क्या उसे डस्टबिन की शोभा बढ़ाने के लिए छोड़ दिया गया था? विभागीय रिकॉर्ड उठाकर देख लिया जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा कि आदेश किसने दबाया और किसकी सुस्ती की वजह से यह रैकेट फलफूल रहा था।

हजूर 👉 काशीपुर के अपर पुलिस अधीक्षक स्वप्न किशोर सिंह ने खुद इस मामले का वीडियो और प्रेस नोट जारी कर सनसनीखेज खुलासे किए हैं, जिससे इस पूरी कार्रवाई पर मुहर लग गई है। जसपुर कोतवाली पुलिस और एसओजी काशीपुर की संयुक्त टीम द्वारा पकड़े गए इस मामले में आरोपी बड़े शातिराना अंदाज में इस खेल को अंजाम दे रहा था। तंत्र-मंत्र और धन प्राप्ति के नाम पर मासूम और भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाकर इन दुर्लभ चीजों को ऊंची कीमतों पर बेचा जा रहा था। इस धंधे के लिए उसने किसी गुप्त अड्डे का नहीं, बल्कि आधुनिक इंस्टाग्राम का इस्तेमाल किया। अपराधी सोशल मीडिया पर खुलेआम रील्स और विज्ञापनों के जरिए वन्यजीवों के अंगों का सौदा कर रहे थे, और वन विभाग के खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी। विडंबना देखिए कि पुलिस जब्ती करती है, आरोपी को जेल भेजती है और अपनी पीठ थपथपाती है, जबकि वन विभाग के अधिकारी केवल विज्ञप्तियां जारी करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं क्या? 

हजूर 👉 मामला अब पुलिस के आधिकारिक खुलासे और बयानों के बाद और अधिक गंभीर हो चुका है, और असली खेल इसके आगे का है। क्या जांच एजेंसियां और वन विभाग यह साबित कर पाएंगे कि वह एक सौ चौदह जोड़े हत्था जोड़ी सचमुच किसी संरक्षित वन्यजीव से जुड़े हैं या फिर यह सिर्फ बाजजारू ठगी का सामान था? असली मास्टरमाइंड कौन है, यह माल कहां से लाया गया था और इस आपूर्ति शृंखला की जड़ें उत्तराखंड के किन-किन जंगलों तक फैली हुई हैं? इन सवालों के जवाब अनुमानों से नहीं बल्कि ठोस सबूतों से मिलने चाहिए।

हजूर 👉 कल पढ़िए जंगल जासूस में 👉 हरिद्वार से जुड़े हैं तार?

 

Advertisement
Advertisement
❌ Content Protection Enabled: Right-click & text copying is disabled on this website.