हजूर 👉 खाकी वर्दी से सियासत की सीढ़िया👉 रिटायरमेंट के मुहाने पर खड़े अधिकारियों और रेंजरों को क्यों भा रही है विधायकों वाली लाल बत्ती?

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉 उत्तराखंड विधानसभा का चुनाव शंखनाद करने को तैयार खड़ा है, और इस महासमर में अपनी किस्मत आजमाने के लिए सैकड़ों प्रत्याशी जनता की अदालत में ताल ठोकेंगे। अंत में ईवीएम की मशीनें खुलेंगी और इन तमाम दावेदारों में से छंटकर सिर्फ सत्तर भाग्यशाली चेहरे ही अगले पांच साल के लिए विधानसभा की आलीशान कुर्सियों पर काबिज हो पाएंगे। सत्ता की इस मलाईदार कुर्सी की भूख ऐसी है कि अब सिर्फ पारंपरिक नेता ही नहीं, बल्कि महकमों की एसी कुर्सियों पर बैठकर लाल फीताशाही चलाने वाले अधिकारी भी खाकी और सरकारी गाड़ियां छोड़कर सीधे जनता के सेवक बनने के सपने बुनने लगे हैं। तराई के जंगलों में अपनी धाक जमाने वाले एक रेंजर साहब भी इसी चुनावी समर में अपनी राजनीतिक किस्मत चमकाने के लिए पूरी तरह बेताब बैठे हैं। जनाब ने चुनावी वैतरणी पार करने के लिए अपना वही पुराना गृह क्षेत्र चुन लिया है, जहां वे पिछले कई लंबे सालों से एक ही रेंज में जमे रहकर अपने लिए राजनीतिक गलियारे और जमीन की खाद-पानी का पुख्ता बंदोबस्त करते रहे हैं।

हजुफ 👉 लेकिन तराई के इन रेंजर साहब की इस चुनावी कूद-फांद को कोई इकलौता वाकया मत समझिए, क्योंकि उत्तराखंड के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों व्यवस्था से सियासत में छलांग लगाने की एक पूरी बाढ़ सी आई हुई है। महकमे के भीतर चर्चा गर्म है कि वन विभाग के ही एक मौजूदा आईएफएस अधिकारी भी इस चुनावी दंगल में ताल ठोकने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। सबसे मजेदार और चौंकाने वाला गणित यह है कि उनका सरकारी सेवा से रिटायरमेंट ठीक चुनाव से तीन महीने पहले होने वाला है, यानी साहब ने खाकी और सरकारी फाइलों से विदाई लेने की तारीख और राजनीतिक अखाड़े में उतरने का मुहूर्त एकदम नफे-तुले तरीके से फिट कर रखा है। और तो और, इस प्रशासनिक फौज से सियासत में कूदने की तैयारी करने वाले वे अकेले नहीं हैं; एक पूर्व आईएफएस अधिकारी महाशय तो सीमांत जिले पिथौरागढ़ की किसी हॉट सीट से पहले ही अपनी चुनावी जमीन मजबूत करके ताल ठोकने में पहले से ही जुटे हुए हैं। यानी उत्तराखंड में अब ब्यूरोक्रेसी और सियासत का यह कॉकटेल ऐसा रंग जमा रहा है कि रिटायरमेंट के करीब पहुंचते ही या नौकरी की चौखट लांघते ही अधिकारी सीधे विधायक बनने के ख्वाब देखने लगे हैं।

हजूर 👉 तराई वाले रेंजर साहब का यह चुनावी गणित भी अपने आप में कम दिलचस्प नहीं है। जो साहब अब तक जंगलों की सीमाएं तय करते थे, लकड़ी और ठेकों का हिसाब रखते थे और मातहतों की परेड कराते थे, वे अब सीधे जनता के बीच जाकर वोट मांगने का ख्वाब देख रहे हैं। बरसों-बरस एक ही इलाके में जमे रहने का फायदा उन्हें यह मिला कि इलाके की रग-रग से वाकिफ होने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का पूरा चूल्हा भी वहीं जलता रहा। लेकिन साहब को यह भूलना नहीं चाहिए कि महकमे की चारदीवारी और सरकारी गश्त के दायरे में हुक्म चलाना अलग बात है, और चुनाव के मैदान में जनता के तीखे सवालों के सामने सीना तानकर खड़ा होना बिल्कुल अलग दुनिया है। जब पब्लिक सड़क, बदहाल शिक्षा, बेरोजगारी और इलाज के अभाव पर कॉलर पकड़ेगी, तो वहां न तो कोई विभागीय फाइल काम आएगी और न ही रेंजर साहब का पुराना रौब किसी काम आएगा।

हजूर 👉 अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इन सरकारी और पूर्व-सरकारी नुमाइंदों को अचानक जनता के कल्याण की इतनी गहरी पीर क्यों जाग उठी है? क्या महकमों की कुर्सियों में अब वो रुतबा नहीं रहा जो विधायक की लाल बत्ती और मान-सम्मान में नजर आता है? तराई के रेंजर साहब से लेकर मैदान मारने को तैयार आईएफएस और पिथौरागढ़ में ताल ठोकने वाले पूर्व आईएफएस तक, सबकी फेरिस्त यही बताती है कि उत्तराखंड की राजनीति अब विशुद्ध रूप से जनता की सेवा कम और अफसरशाही से रिटायर या छिटककर आने वालों का नया गलियारा बनती जा रही है। राजनीतिक दलों के दरवाजे भी ऐसे ‘काबिल’ चेहरों के स्वागत के लिए पलकें बिछाए बैठे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकारी सिस्टम की नस-नस से वाकिफ ये चेहरे चुनाव जीतने का शॉर्टकट साबित हो सकते हैं। और जरा सोचिए कि अगर ये अफसरशाही के रास्ते से निकलकर विधायक बन गए और इत्तेफाक से हाथ में वन विभाग की ही कमान यानी ‘वन मंत्री’ की कुर्सी आ गई, तो इस महकमे का भगवान ही मालिक है! जरा उस विडंबना पर गौर कीजिए👉जिस रेंजर या अधिकारी ने कल तक अपनी रेंज में बैठकर राजनीतिक रोटियां सेकी थीं, अगर वही महाशय कल को मंत्री बनकर उसी महकमे के सबसे बड़े मालिक की कुर्सी पर बैठ जाएं, तो फिर नियम कायदों और जनता में क्या फर्क रह जाएगा? तब तो जो मातहत कल तक साहब की डांट खाते थे, वे मंत्री बनने के बाद उन्हीं साहब को सलामी ठोकेंगे और महकमा कहेगा👉’जिधर देखो, उधर अपने ही लोग बैठे हैं!’ अगर ऐसा जादुई करिश्मा हो गया तो उत्तराखंड के जंगलों और व्यवस्था की खैरियत पूछने वाला कोई नहीं बचेगा, क्योंकि तब प्रशासनिक मेहरबानी और फाइलें दबाने के पुराने हुनर का बाकायदा मंत्री स्तर पर नवीनीकरण हो जाएगा?

 

 

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