जंगल जासूस 👉
हजूर 👉हुक्म ऊपर का, कुर्सी नीचे की! तबादला आदेश निकला, डेडलाइन गई और कुर्सियां बोलीं👉हम यहीं ठीक छौं
हजूर 👉 उत्तराखंड के वन महकमे में इन दिनों तबादलों की कहानी देखकर कुमाऊं की एक पुरानी कहावत याद आ रही है👉“जै बण, तै बण; आपुण ठौर कभै नी छण।” मतलब, जंगल चाहे जितना बदल जाए, अपना ठिकाना छोड़ने में मन आसानी से नहीं मानता। महीनों की कवायद के बाद फॉरेस्ट गार्ड, फॉरेस्टर, डिप्टी रेंजर और रेंजरों की तबादला सूचियां बनीं, लिखित आदेश निकले और विभागाध्यक्ष स्तर से 30 सितंबर तक कार्यमुक्त करने की समय सीमा भी तय कर दी गई। लेकिन कुछ जगहों से अब भी पुराने तैनाती स्थल पर कर्मचारियों के बने रहने की जानकारी सामने आ रही है। कागज पर तबादला हो गया, मगर जमीन पर कुर्सी अभी वहीं है। इसे प्रशासनिक देरी कहिए या प्रक्रिया की मजबूरी, लेकिन वन महकमे की यह तस्वीर सवाल जरूर पूछती है कि आखिर आदेश की रफ्तार मैदान में पहुंचकर धीमी क्यों पड़ गई।
हजूर 👉 30 सितंबर की डेडलाइन इस कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय है। विभागाध्यक्ष स्तर से साफ समय सीमा तय हुई कि संबंधित कर्मचारियों को कार्यमुक्त कर नई तैनाती पर भेजा जाए। तारीख बीती, अक्टूबर आ गया, लेकिन कई जगह प्रक्रिया पूरी होने की जानकारी अब भी बाकी है। मुख्यालय को अब संबंधित वन क्षेत्रों से रिपोर्ट मांगनी पड़ रही है कि कहां आदेश लागू हुआ और कहां कार्यमुक्ति नहीं हो सकी। कुमाऊं में एक और कहावत कही जाती है👉“बैल बणै गौं, घास बणै ठौं।” यानी काम का नाम तो बड़ा, लेकिन असली काम अपनी जगह अटका रह जाए। यहां भी तबादले की सूची तो निकल गई, मगर उसकी असली परीक्षा जमीन पर होनी बाकी है।
हजूर 👉 मानव संसाधन से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी संभाल रहे CCF पीके पात्रो के मुताबिक समय सीमा समाप्त होने के बाद संबंधित वन क्षेत्रों से रिपोर्ट मांगी जा रही है। इससे पहले भी कार्यमुक्ति के संबंध में मुख्यालय स्तर से पत्राचार किया गया था। अब रिपोर्ट बताएगी कि कहां प्रक्रिया पूरी हुई और कहां देरी हुई। हर मामले में कारण अलग हो सकते हैं और बिना रिपोर्ट के किसी अधिकारी या कर्मचारी पर जिम्मेदारी तय करना उचित नहीं होगा। मगर वन विभाग का अनुशासन सिर्फ जंगल में गश्त और वन्यजीवों की निगरानी से नहीं चलता, वह दफ्तर के आदेशों के पालन से भी दिखाई देता है। वन्यजीव को रेडियो कॉलर लगाकर उसकी हरकत तक ट्रैक की जा सकती है, तो फिर तबादला आदेश की लोकेशन तलाशने के लिए रिपोर्ट क्यों मांगनी पड़े, यही सवाल इस पूरे मामले का असली मजा है।
हजूर 👉 तबादला सिर्फ कागज पर नाम और जगह बदलने का खेल नहीं है। पुरानी जगह से कार्यमुक्ति, जिम्मेदारी का हस्तांतरण और नई जगह कार्यभार ग्रहण करना पूरी प्रक्रिया की कड़ियां हैं। इनमें एक कड़ी अटकी तो पूरा तबादला अधूरा रह जाता है। यही वजह है कि 30 सितंबर की समय सीमा गुजरने के बाद अब मुख्यालय की नजर रिपोर्ट पर है। वन महकमे में अनुशासन का मतलब सिर्फ जंगल में नियम लागू करना नहीं, बल्कि अपने ही आदेशों को जमीन पर उतारना भी है। आखिर जंगल में नियमों की अनदेखी हो तो वन्यजीव विभाग से सवाल होता है और दफ्तर में आदेश की अनदेखी हो तो सवाल व्यवस्था से होना स्वाभाविक है।
हजूर 👉 अब देखना यह है कि रिपोर्ट आने के बाद कहानी किस मोड़ पर जाती है। कितने कर्मचारी कार्यमुक्त हुए, कितने पुराने स्थान पर हैं और देरी की वजह क्या रही, यह तस्वीर रिपोर्ट के बाद साफ होगी। फिलहाल कुमाऊं की बोली में कहें तो “बण में डांडो बदलि ग्यो, पण बाट उही रै ग्यी।” यानी जंगल का रास्ता बदलने की तैयारी तो हुई, लेकिन चाल अभी वहीं की वहीं है। वन महकमे की इस तबादला कहानी का चटपटा सार यही है👉आदेश ऊपर से चला, डेडलाइन तक पहुंचा, मगर जमीन पर आते-आते उसकी सांस फूल गई। अब रिपोर्ट बताएगी कि रास्ता कठिन था या सफर में कहीं ठहराव ज्यादा हो गया।



