जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 देहरादून के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर वन प्रबंधन की रणनीतियां बनाना और पहाड़ के दुर्गम गांवों में उन रणनीतियों को लागू करना, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। पौड़ी के खाण्ड्यूंसैण में पांच वर्षीय मासूम बच्ची की गुलदार के हमले में मौत के बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इसी अंतर को एक बार फिर उजागर कर दिया। बच्ची की मौत से आक्रोशित ग्रामीणों के बीच गढ़वाल वन प्रभाग के डीएफओ महातिम यादव स्वयं पहुंचे। उनसे सवाल हुए, विरोध हुआ और फिर मामला कथित धक्का-मुक्की तथा मारपीट तक पहुंच गया। जिस अधिकारी से जनता जवाब मांग रही थी, वही अधिकारी कथित तौर पर भीड़ के आक्रोश का शिकार हो गया। यह घटनाक्रम केवल एक अधिकारी के साथ हुए दुर्व्यवहार का मामला नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल है जिसमें संकट के समय मैदान में मौजूद अधिकारी सामने होता है और नीतिगत फैसले लेने वाले चेहरे अक्सर पर्दे के पीछे रह जाते हैं।
हजूर 👉 वन प्रेमियों के बीच इस घटना को लेकर एक दिलचस्प मगर गंभीर तंज सुनाई दे रहा है। उनका कहना है कि वन विभाग में अधिकारी की जिम्मेदारी भी गजब है। गुलदार आबादी में आ जाए तो डीएफओ जवाब दें, ग्रामीण नाराज हो जाएं तो डीएफओ मौके पर पहुंचें, संसाधनों की कमी हो तो भी डीएफओ व्यवस्था संभालें और अगर भीड़ का गुस्सा फूट पड़े तो अपनी सुरक्षा का इंतजाम भी खुद करें। सवाल यह है कि आखिर विभागीय जवाबदेही का पूरा बोझ स्थानीय अधिकारी के कंधों पर ही क्यों दिखाई देता है? जिस अधिकारी को सरकार ने क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी है, उसे काम करने के लिए आवश्यक संसाधन, प्रशिक्षित अमला और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना भी तो उच्चाधिकारियों की जिम्मेदारी है। आदेश जारी करने वाली कुर्सी और आदेश लागू करने वाले अधिकारी के बीच की यह दूरी अब चर्चा का विषय बननी चाहिए।
हजूर 👉 डीएफओ महातिम यादव के साथ हुई घटना के संबंध में दी गई तहरीर पर कांग्रेस नेता विनोद दनोसी समेत अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। एसडीओ आयशा बिष्ट और तहसीलदार को कमरे में बंद किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। पुलिस मामले की जांच कर रही है। इस पूरे प्रकरण में एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है। जनता को विभाग से सवाल पूछने, अधिकारियों से जवाब मांगने और लापरवाही के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन किसी अधिकारी के साथ कथित मारपीट या धक्का-मुक्की को जनहित की अभिव्यक्ति नहीं कहा जा सकता। विरोध की वैधता उसकी मांगों से तय होती है, हिंसा से नहीं। यदि मौके पर पहुंचे अधिकारी ही सुरक्षित नहीं रहेंगे तो भविष्य में किसी संवेदनशील घटना के दौरान प्रशासनिक संवाद और अधिक कठिन हो सकता है।
हजूर 👉 वन प्रेमियों का एक और तंज उन लोगों के लिए है जो वन्यजीव संरक्षण की चर्चा तो बड़े उत्साह से करते हैं, लेकिन वन्यजीवों और इंसानी आबादी के बीच बढ़ते संघर्ष को संभालने वाले कर्मचारियों की परिस्थितियों पर अपेक्षित ध्यान नहीं देते। बाघ और गुलदार की तस्वीरों पर संरक्षण की बहस खूब होती है, लेकिन जंगलों में गश्त करने वाले वनकर्मियों, रात में घटनास्थल पर पहुंचने वाली टीमों और ग्रामीणों के बीच जाकर हालात संभालने वाले अधिकारियों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वन्यजीवों का संरक्षण और मानव जीवन की सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी उद्देश्य नहीं हैं। दोनों को साथ लेकर चलना ही वन प्रबंधन की वास्तविक कसौटी है।
हजूर 👉 उधर उत्तरांचल फॉरेस्ट मिनिस्ट्रियल संगठन ने कर्मचारियों के समर्थन में काली पट्टी बांधकर विरोध दर्ज कराया है। संगठन के अध्यक्ष कपिल थपलियाल ने 18 नवंबर तक मांगों पर कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में पूर्ण कार्य बहिष्कार की चेतावनी दी है। यह घटनाक्रम विभाग के भीतर बढ़ती असहजता का संकेत है। यहां देहरादून के उच्चाधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात अधिकारियों के पास कितने प्रभावी संसाधन हैं, वन्यजीवों की निगरानी के लिए कैमरा ट्रैप और पिंजरों की उपलब्धता क्या है, प्रशिक्षित त्वरित प्रतिक्रिया दल कितने सक्रिय हैं और कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था है। वन प्रेमियों का व्यंग्य भी इसी बिंदु पर है कि फाइलों में जंगल की सुरक्षा का पूरा खाका तैयार हो सकता है, लेकिन जब अधिकारी को गांव की सड़क पर खड़ा होना पड़ता है तो उसे विभागीय व्यवस्था का वास्तविक चेहरा दिखाई देता है।
हजूर 👉 पौड़ी की घटना ने दो अलग-अलग लेकिन समान रूप से महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखे हैं। एक तरफ वन्यजीव हमलों से ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती है, दूसरी तरफ उन अधिकारियों और कर्मचारियों का सम्मान तथा संरक्षण है जो इन परिस्थितियों में अपनी ड्यूटी निभाते हैं। पांच वर्षीय बच्ची की मौत का दुख किसी प्रशासनिक बयान से कम नहीं हो सकता और डीएफओ के साथ कथित दुर्व्यवहार को भी सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कानून अपना काम करे, जांच निष्पक्ष हो और जिम्मेदारी जहां बनती है वहां तय हो। लेकिन देहरादून के बड़े साहबों को भी यह समझना होगा कि वन विभाग केवल आदेशों और बैठकों से नहीं चलता। उसकी असली परीक्षा उन जंगलों और गांवों में होती है जहां अधिकारी अपने निर्णयों का परिणाम सीधे जनता के सामने झेलते हैं। वन प्रेमियों का अंतिम तंज शायद इसी व्यवस्था के नाम है कि जंगल में गुलदार की निगरानी के लिए कैमरे लगाए जा रहे हैं, लेकिन मैदान में काम करने वाले अधिकारियों की सुरक्षा पर निगरानी कौन रख रहा है?



