जंगल जासूस 👉
हजूर 👉टाइगर रिजर्व में बजट ‘लापता’👉केंद्र से आए 5.31 करोड़, लेकिन वन विभाग का खर्च निकला ‘शून्य’
हजूर 👉वन विभाग के दफ़्तरों में इन दिनों एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। अफ़सरों के कमरों में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा चल रही है और चाय की चुस्कियों के बीच फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल पर किसी कछुए की चाल से भी धीमी रेंग रही हैं। बाहर जंगल में बाघ अपने इलाके का चक्कर काटते-काटते थक जाए, लेकिन दफ़्तर के साहबों की कलम का पहिया टस से मस होने को तैयार नहीं। मामला ही कुछ ऐसा है। केंद्र सरकार ने जब उत्तराखंड के जंगलों की सुरक्षा के लिए 5.31 करोड़ रुपये का बजट भेजा, तो लगा कि अब तो कॉर्बेट से लेकर राजाजी तक की तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन जनाब, यह उत्तराखंड का वन विभाग है, यहाँ पैसा आ भी जाए तो सरकारी मशीनरी उसे खर्च न करने का रिकॉर्ड बनाने में जुट जाती है।
हजूर 👉छह अगस्त तक जब बही-खाता खुला, तो अफ़सरों की कारगुज़ारी देखकर हर कोई सन्न रह गया। केंद्र से आई साढ़े पांच करोड़ की भारी-भरकम रकम पर विभाग कुंडली मारकर बैठा था और खर्च के कॉलम में बड़ा सा अंडा यानी शून्य टंगा हुआ था। कागज़ों में तो ऐसी-ऐसी तरकीबें लिखी थीं कि मानों हर बाघ के पीछे एक सुरक्षाकर्मी खड़ा कर दिया जाएगा, जंगलों की आग बुझाने के लिए आसमान से पानी बरसा दिया जाएगा और प्यासे जानवरों के लिए नए-नए स्विमिंग पूल जैसे तालाब खुदवा दिए जाएंगे। पर हकीकत यह निकली कि एक नया कैमरा तक नहीं खरीदा गया, न ही गश्ती गाड़ियों में पेट्रोल भरा गया। पैसा सरकारी खजाने में ऐसा सोया कि जागा ही नहीं।
हजूर 👉जब दिल्ली के राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए को इस कारनामे की भनक लगी, तो वहां बैठे अफ़सरों का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। एनटीसीए के अपर महानिदेशक ने ऐसा कड़ा पत्र लिखा कि उसकी गूंज सीधे उत्तराखंड के मुख्य सचिव की मेज तक सुनाई दी। दिल्ली से आए इस सीधे हंटर ने वन विभाग के ठंडे पड़े गलियारों में हड़कंप मचा दिया। सवाल सीधा था कि जब बजट की कमी का रोना रोते हो और पैसा दे दिया गया, तो फिर वह जंगल के बजाय दफ़्तरों की फाइलों में क्यों चक्कर काट रहा है?
हजूर 👉जंगल का कानून दफ़्तर के कैलेंडर से नहीं चलता। वहां बाघों को शिकारियों से बचाना हो, गर्मियों में बूंद-बूंद पानी का इंतज़ाम करना हो या वनाग्नि से पेड़-पौधों की हिफ़ाज़त करनी हो, हर काम के लिए तुरंत पैसे की ज़रूरत होती है। अफ़सरों की इस लापरवाही का ख़ामियाज़ा सिर्फ़ बाघों को ही नहीं, बल्कि हाथियों, हिरणों और पूरे जंगल को भुगतना पड़ रहा है। सबसे बड़ा डर यह है कि अगर यह पैसा समय पर खर्च न हुआ और हिसाब-किताब दिल्ली नहीं भेजा गया, तो अगली बार केंद्र सरकार फूटी कौड़ी भी देने से पहले सौ बार सोचेगी। अब देखना यह है कि दिल्ली की इस लताड़ के बाद सुस्त पड़ी अफ़सरशाही की नींद टूटती है या फिर 5.31 करोड़ की यह भारी-भरकम राशि लालफीताशाही के जंगल में ही गुम होकर रह जाएगी।

