हजूर 👉 ​रामनगर वन निगम में आश्रित नौकरी का महाभारत 👉दो पत्नियों के दावे में उलझा मासूमों का निवाला

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉 ​रामनगर वन निगम में आश्रित नौकरी का महाभारत 👉दो पत्नियों के दावे में उलझा मासूमों का निवाला

हजूर 👉सरकारी नौकरी का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि यह अक्सर पारिवारिक रिश्तों की जटिलता को सड़क और अदालत तक खींच लाता है। रामनगर और कालाढूंगी के बीच घूमती यह कहानी एक ऐसे ही कड़वे सच को सामने लाती है, जहाँ एक इंसान की मौत के बाद उसकी जगह मिलने वाली नौकरी दो परिवारों के बीच जंग का मैदान बन चुकी है। कालाढूंगी वन निगम में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर तैनात रहे प्रेम राम की जीवन लीला समाप्त हो गई। उनकी मौत के साथ ही उनके परिवार के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन असली नाटकीय मोड़ तब आया जब उनके खाली हुए पद पर कब्जा जमाने के लिए दो-दो दावेदार आमने-सामने आ गए।

हजूर 👉कहानी की बुनावट काफी उलझी हुई है। कागजी और व्यावहारिक जिंदगी के दो अलग-अलग छोर इस पूरे विवाद की धुरी हैं। वन निगम के रिकॉर्ड और घटनाक्रम के मुताबिक, कर्मचारी की पहली पत्नी उससे अलग हल्द्वानी में रह रही थी। वहीं प्रेम राम अपनी दूसरी पत्नी के साथ कालाढूंगी में रहकर अपना जीवन बिता रहे थे। दूसरी पत्नी से उनके चार बच्चे हैं, जिनमें तीन बेटियां और एक बेटा शामिल हैं, जबकि पहली पत्नी से भी एक बेटी है। जब तक कर्मचारी जीवित था, जीवन की गाड़ी किसी तरह खिंच रही थी। कानून और अदालत के आदेशों के तहत कर्मचारी के वेतन से एक तय हिस्सा काटकर अलग रह रही पहली पत्नी को भरण-पोषण के रूप में दिया जाता था। यानी जीवित रहते हुए भी कर्मचारी की जिंदगी में कानूनी खींचतान का सिलसिला जारी था।

हजूर 👉असली बवंडर कर्मचारी की मौत के बाद उठा। पति का साया सिर से उठते ही कालाढूंगी में चार बच्चों के साथ रह रही महिला ने आश्रित कोटे से नौकरी पाने के लिए वन निगम के दफ्तर में अपने दस्तावेज जमा किए। परिवार को उम्मीद थी कि इस नौकरी के सहारे जिंदगी की नई शुरुआत हो सकेगी और बच्चों का पेट भर जाएगा। विभाग ने इस अर्जी पर कागजी कार्रवाई शुरू ही की थी कि अचानक हल्द्वानी से पहली पत्नी ने दस्तखत कर दिए और उसी नौकरी पर अपना सीधा कानूनी हक ठोक दिया। एक ही पद और दो दावेदार, वो भी दोनों कानूनी और सामाजिक तर्कों के साथ आमने-सामने। इस दोहरे दावे ने वन निगम के अधिकारियों के हाथ-पांव फुला दिए।

हजूर 👉विभागीय स्तर पर जब इस उलझन का कोई रास्ता नहीं निकला, तो नौकरी की यह फाइल दफ्तर की अलमारी से बाहर निकलकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने लगी। मामला सबसे पहले परिवार न्यायालय की चौखट पर पहुंचा। वहाँ बात सुलझने के बजाय और उलझ गई, जिसके बाद अब दोनों पक्ष अपने-अपने भारी-भरकम कागजात और वकीलों के साथ जिला न्यायालय में डटे हुए हैं। वन निगम के सामने सबसे बड़ी धर्मसंकट यह है कि जब तक अदालत से स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हो जाती, तब तक किसी भी एक महिला के पक्ष में फैसला लेना सीधे तौर पर नए कानूनी बवंडर को न्योता देना होगा। रामनगर वन निगम के अधिकारियों और डीएसएम मुदित आर्या की मानें तो विभाग फिलहाल कानूनी राय ले रहा है और उसकी मजबूरी यह है कि वह अदालत के अंतिम आदेश के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकता।

हजूर 👉कानून अपनी जगह पर अडिग है, अदालत अपनी गति से काम कर रही है और विभाग नियमों की किताब थामे बैठा है, लेकिन इस पूरी कागजी जंग के बीच सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि चार छोटे-छोटे मासूम बच्चों का भविष्य दांव पर लग चुका है। पिता की मौत के बाद घर में कमाई का कोई जरिया नहीं बचा है। हालात इतने विकट हो चुके हैं कि कालाढूंगी में रह रही महिला को अपने चार बच्चों का पेट पालने और घर की रसोई चलाने के लिए जंगल से सूखी लकड़ियां बीनकर बाजार में बेचनी पड़ रही हैं। दिन भर की कड़ी मशक्कत के बाद मिलने वाले दो-तीन सौ रुपये से किसी तरह चूल्हा जल रहा है।

हजूर 👉एक तरफ अदालती फाइलों में दलीलें और तारीखें दर्ज हो रही हैं, तो दूसरी तरफ उन बच्चों की पढ़ाई और राशन का हिसाब रोजाना बिगड़ रहा है। कागजी पत्नी कौन है और वास्तविक हकदार कौन, इसका फैसला तो कानून की तराजू पर ही होगा, लेकिन इस कानूनी जंग ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जब तक न्याय का फैसला आएगा, तब तक उन मासूम बच्चों के बचपन और भविष्य का क्या होगा, जो बिना किसी गलती के इस व्यवस्था और पारिवारिक विवाद की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं।

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