हजूर 👉कुर्बानी उत्तराखंड की, कमाई का खेल किसका?

जंगल जासूस👉

हजूर 👉कुर्बानी उत्तराखंड की, कमाई का खेल किसका?

हजूर 👉लालकुआं वन निगम में रकम बढ़ती गई👉जांच सिमटती गई! डिपो-04 और 05 की फाइलों ने उठाए बड़े सवाल,?

हजूर 👉उत्तराखंड का निर्माण किसी सौगात में नहीं मिला था। इस राज्य की नींव में जनता का कड़ा संघर्ष, लाठियां, जेल और अनगिनत परिवारों की कुर्बानियां दर्ज हैं। सपना साफ था👉पहाड़ के जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक और सही हिसाब राज्य के लोगों का होगा। लेकिन लालकुआं वन विकास निगम के डिपो-04 और 05 में सामने आ रहे वित्तीय गड़बड़ियों के मामले ने इस जन-भरोसे को हिलाकर रख दिया है। जनवाणी समाचार पत्र में छपी रिपोर्ट और सोशल मीडिया पर तैर रही अखबारी कटिंग से आरटीआई दस्तावेजों का जो सच सामने आ रहा है, वह करीब 1.67 करोड़ रुपये के वित्तीय फेरबदल और 22 बड़े खरीदारों की संदिग्ध भूमिका की तरफ इशारा करता है। विशेष ऑडिट और शुरुआती सख्ती के बाद मामला अचानक ठंडा कैसे पड़ गया, यह सवाल अब जनचर्चा के केंद्र में है।

हजूर 👉सरकारी फाइलों में दर्ज तारीखों को अगर सिलसिलेवार देखें, तो इस पूरे घटनाक्रम का मोड़ बेहद चौंकाने वाला है। 25 अगस्त 2023 से डिपो-04 और 05 का विशेष ऑडिट शुरू किया गया और महज चार दिन बाद 29 अगस्त को 22 क्रेताओं पर कानूनी शिकंजा कसने, पुलिस कार्रवाई करने और उन्हें ब्लैकलिस्ट करने के सख्त आदेश जारी हुए। मगर इसके बाद पर्दे के पीछे जो खेल हुआ, उसने पूरे तंत्र की नीयत पर सवाल दाग दिए हैं। सख्त आदेशों के बावजूद सात प्रमुख फर्मों👉बिशनदास नय्यर, राजेंद्र सिंह (लालकुआं), सनराइज इंडस्ट्रीज, हरियाणा इंडस्ट्रीज, खान टिंबर (किच्छा), बाबा नीम करौली टिंबर और श्री बाबा टिंबर को जब्त लकड़ी और वनोपज उठाने की हरी झंडी दे दी गई। इतना ही नहीं, 5 अक्टूबर 2023 को पत्र जारी कर इन्हें आगे भी खरीदारी की छूट दे दी गई। आखिर किस प्रशासनिक दबाव या सांठगांठ के तहत कार्रवाई की तलवार को अचानक राहत के परवाने में बदल दिया गया, यह जांच का सबसे बड़ा विषय है?

हजूर 👉फाइलों से निकला वसूली का गणित भी कम उलझा हुआ नहीं है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इन सात फर्मों पर 45,51,076 रुपये की मोटी धनराशि वसूली योग्य पाई गई थी। इस आंकड़े में बिशनदास नय्यर पर 7,731 रुपये, राजेंद्र सिंह पर 14,55,768 रुपये, सनराइज इंडस्ट्रीज पर 38,444 रुपये, हरियाणा इंडस्ट्रीज पर 8,42,624 रुपये, खान टिंबर पर 9,04,452 रुपये, बाबा नीम करौली टिंबर पर 7,46,727 रुपये और श्री बाबा टिंबर पर 5,55,330 रुपये का बकाया सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है। इसमें ब्याज, अर्थदंड, जीएसटी और मंडी शुल्क का बकाया अलग से जुड़ता है। जब माल जब्त था और देनदारी साफ तय थी, तो बिना वसूली पूरा माल किसके आदेश से रिलीज हुआ? यह सीधा नुकसान जनता के खजाने का है, जिसकी भरपाई का जवाब अब तक गायब है?

हजूर 👉मामले का अगला पन्ना 15 अक्टूबर 2024 की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक से खुलता है। कुमाऊं के तत्कालीन प्रबंध निदेशक धीरज पांडे की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में सात क्रेताओं की जब्त वनोपज रिलीज करने के तत्कालीन क्षेत्रीय प्रबंधक के विवादित आदेश पर असहमति जताई गई और फैसले की समीक्षा के निर्देश दिए गए। यानी जिस आदेश के बल पर करोड़ों का माल डिपो से बाहर चला गया, वह प्रशासनिक स्तर पर ही त्रुटिपूर्ण और असंगत माना गया। अब सवाल उठता है कि अगर फैसला गलत था, तो उससे निगम को पहुंचे वित्तीय नुकसान की भरपाई किस अधिकारी की जेब या पेंशन से होगी? सिर्फ कागजी समीक्षा से सरकारी राजस्व के नुकसान की भरपाई संभव नहीं है?

हजूर 👉लेकिन सबसे बड़ा रहस्यमयी पहलू डिपो संख्या 04 की जांच को लेकर है। आंतरिक लेखा परीक्षा (इंटरनल ऑडिट ) में यह बात सामने आ चुकी थी कि डिपो-04 में हुई गड़बड़ियां डिपो-05 से भी कहीं अधिक बड़ी और गंभीर थीं। इसके बावजूद जांच एजेंसियों का पूरा ध्यान केवल डिपो-05 तक सीमित रखकर क्यों समेट दिया गया? जब दोनों डिपो एक ही परिसर और एक ही प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, तो फिर डिपो-04 की फाइलों और स्टॉक रजिस्टरों को जांच के घेरे से बाहर रखने का कानूनी आधार क्या है? क्या डिपो-04 की फाइलें खुलने पर कुछ बड़े नामों के चेहरे बेनकाब होने का डर है?

हजूर 👉यह पूरा मामला महज खातों की लिखापढ़ी या लाखों-करोड़ों के आंकड़ेबाजी का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के राज्य आंदोलन के आदर्शों और राजकीय संसाधनों की डकैती से जुड़ा है। यदि आरटीआई से निकले ये दस्तावेज सच बयां कर रहे हैं, तो जांच का दायरा डिपो-04 और जिम्मेदार अफसरों तक तुरंत बढ़ना चाहिए। उत्तराखंड की जनता ने शहादत और संघर्ष राज्य के विकास के लिए दिया था, न कि वन निगम की आड़ में चल रहे इस तरह के घालमेल के लिए। अब देखना यह है कि जांच एजेंसियां और शासन फाइलों के पन्नों में दबी इस पूरी सच्चाई को सामने लाते हैं या यह मामला भी कागजी खानापूर्ति की भेंट चढ़ जाता है।

 

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