बागेश्वर की सियासत में वन विभाग के बड़े अफसर की एंट्री की चर्चा, 2027 से पहले गरमाया राजनीतिक बाजार

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हजूर👉सूत्रों के अनुसार उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनावी मौसम भले अभी दूर हो, लेकिन बागेश्वर की पहाड़ियों में राजनीतिक चर्चाओं का तापमान बढ़ने लगा है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित बागेश्वर विधानसभा सीट पर इस बार चर्चा किसी घोषित प्रत्याशी की नहीं, बल्कि वन महकमे के एक वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी के संभावित राजनीतिक भविष्य को लेकर है। विभागीय और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेजी से घूम रही है कि सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच रहे एक वरिष्ठ अधिकारी भविष्य में बागेश्वर की सियासत में कदम रख सकते हैं। हालांकि अभी तक संबंधित अधिकारी की ओर से कोई राजनीतिक घोषणा सामने नहीं आई है और न ही किसी राजनीतिक दल ने उन्हें संभावित उम्मीदवार बताया है। लिहाजा फिलहाल यह मामला राजनीतिक चर्चाओं और अटकलों तक ही सीमित है।

हजूर👉बागेश्वर की सीट का इतिहास भी ऐसा है कि यहां कुर्सी विरासत में नहीं मिलती, जनता के दरबार में हिसाब देना पड़ता है। उत्तराखंड बनने के बाद इस सीट ने कई बार राजनीतिक समीकरण बदले हैं। वर्ष 2002 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की, 2007 में भाजपा ने वापसी की, 2012 में मुकाबला बेहद करीबी रहा, जबकि 2017 और 2022 में भाजपा ने मजबूत बढ़त के साथ सीट अपने कब्जे में रखी। वर्ष 2023 के उपचुनाव में भी मुकाबला दिलचस्प रहा और भाजपा की पार्वती दास ने लगभग 2,405 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। यानी बागेश्वर की जनता चुनाव दर चुनाव अपना अलग राजनीतिक संदेश देती रही है।

हजूर👉 अब सवाल यह है कि अगर कोई वरिष्ठ नौकरशाह सचमुच राजनीति के मैदान में उतरता है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी? सरकारी कुर्सी और चुनावी चौपाल में जमीन-आसमान का अंतर होता है। फाइलों पर निर्णय लेने का प्रशासनिक अनुभव निश्चित रूप से बड़ी ताकत हो सकता है, लेकिन चुनाव में जनता अधिकारी नहीं, अपना प्रतिनिधि चुनती है। यहां वर्षों का जनसंपर्क, गांव-गांव की पकड़, लोगों के सुख-दुख में मौजूदगी और स्थानीय मुद्दों की समझ ज्यादा मायने रखती है। बागेश्वर में रोजगार, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और सीमांत गांवों की समस्याएं पहले से ही बड़े मुद्दे हैं। इसलिए किसी भी नए राजनीतिक चेहरे को इन सवालों का जवाब जमीन पर देना होगा।

हजूर👉वन महकमे से जुड़े संभावित राजनीतिक चेहरे के सामने एक और बड़ा सवाल होगा और वह है जंगल तथा जनता का रिश्ता। बागेश्वर में मानव वन्यजीव संघर्ष कोई कागजी मुद्दा नहीं है। गुलदार और भालू की घटनाएं ग्रामीणों की सुरक्षा, खेती और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। ऐसे में यदि कोई पूर्व वन अधिकारी भविष्य में राजनीतिक मैदान में आता है तो उससे स्वाभाविक रूप से यह उम्मीद भी की जाएगी कि वह वन्यजीव संरक्षण और ग्रामीण सुरक्षा के बीच ऐसा संतुलन बनाए जिसकी मांग पहाड़ लंबे समय से करता आया है। जंगल की फाइलों से निकलकर अगर राजनीति की चौपाल तक पहुंचना है तो वन और ग्रामीण दोनों की भाषा समझनी होगी।

हजूर👉 सूत्रों के हवाले से चल रही चर्चा का सबसे दिलचस्प पहलू संबंधित अधिकारी की हालिया तैनाती और क्षेत्र से जुड़ी गतिविधियों को बताया जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में कुछ लोग इसे भविष्य की तैयारी के संकेत के रूप में देख रहे हैं, जबकि दूसरा पक्ष इसे महज प्रशासनिक संयोग मान रहा है। यही वजह है कि इस समय किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। जब तक अधिकारी स्वयं राजनीतिक भूमिका की घोषणा नहीं करते, सेवा से अलग होने की कोई आधिकारिक प्रक्रिया सामने नहीं आती या कोई राजनीतिक दल उन्हें उम्मीदवार घोषित नहीं करता, तब तक इसे सिर्फ चर्चा ही माना जाना चाहिए।

हजूर👉बागेश्वर की राजनीति में नाम से ज्यादा काम बोलता है। यहां जनता किसी अधिकारी, नेता या नए चेहरे को केवल उसके पद के आधार पर स्वीकार कर लेगी, ऐसा मानना राजनीतिक भूल हो सकती है। अगर भविष्य में कोई वरिष्ठ वन अधिकारी चुनावी मैदान में उतरता है तो उसे भी बाकी उम्मीदवारों की तरह जनता की अदालत में जाना होगा। गांवों की चौपाल, बेरोजगार युवाओं के सवाल, पलायन से खाली होते गांव, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं और मानव वन्यजीव संघर्ष उसके सामने वास्तविक परीक्षा बनकर खड़े होंगे।

हजूर👉 फिलहाल बागेश्वर में चुनावी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन चर्चाओं ने राजनीतिक जंगल में हलचल जरूर पैदा कर दी है। सवाल बड़ा है कि क्या यह महज अफसरशाही के गलियारों से निकली एक राजनीतिक अफवाह है, क्या सेवानिवृत्ति के बाद किसी नए राजनीतिक सफर की जमीन तैयार हो रही है, या फिर आने वाले समय में बागेश्वर को कोई नया चेहरा मिलने वाला है। इसका जवाब वक्त देगा। फिलहाल इतना जरूर है कि 2027 की चुनावी बिसात बिछने से पहले ही बागेश्वर का राजनीतिक तापमान बढ़ने लगा है।

हजूर 👉जंगल जासूस की नजर अब इस कहानी के अगले पत्ते पर है। क्योंकि राजनीति के जंगल में चर्चा बहुत होती है, लेकिन असली दहाड़ तब सुनाई देती है जब कोई नाम अफवाह से निकलकर आधिकारिक मैदान में उतरता है।

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