जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 ठेकेदारों की एफडीआर पर पड़ा ताला, पर ‘लकी कुनबे’ के लिए खुली कोटेशन की लॉटरी! वन संरक्षक और 👉सीएम पोर्टल की चौखट पर पहुंची कालाढूंगी रेंज में धांधली की शिकायत?
हजूर 👉 रामनगर वन प्रभाग की कालाढूंगी रेंज में जेसीबी मशीनों की गड़गड़ाहट से ज्यादा जोर-शोर अब उन बंद फाइलों से उठ रहा है, जहां कोटेशन के नाम पर किस्मत का सिकंदर बार-बार एक ही कुनबे को बनाया जा रहा है। इस समूचे खेल की सबसे कड़वी और सनसनीखेज सच्चाई तब बेनकाब होती है, जब बड़े-बड़े निर्माण और विकास कार्यों के खुले टेंडर कराने के बजाय उन्हें जानबूझकर छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ दिया जाता है। पश्चिमी वृत्त, हल्द्वानी के वन संरक्षक नितीश मणि त्रिपाठी के समक्ष कालाढूंगी निवासी वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार मनोज कुमार पंत द्वारा दर्ज कराई गई लिखित शिकायत ने इस पूरे प्रकरण को प्रशासनिक जांच के सीधे घेरे में ला खड़ा किया है। नियम कहते हैं कि बड़े बजट के कामों के लिए खुला टेंडर होना चाहिए ताकि ई-टेंडरिंग के जरिए हर किसी को निष्पक्ष मौका मिले, लेकिन खुली प्रतिस्पर्धा के इसी पारदर्शी दरवाजे को बंद करने के लिए टेंडर की बलि चढ़ाकर कोटेशन की चोरगली निकाली जाती है, ताकि पूरी बाजी को बंद कमरों में अपनी सहूलियत के हिसाब से सेट किया जा सके।
हजूर 👉 इसी चोरगली के रास्ते उन आम ठेकेदारों की गाढ़ी कमाई पर डाका डाला जाता है, जो रामनगर वन प्रभाग में पंजीकृत होने के नाम पर करीब एक लाख रुपये की एफडीआर जमा करते हैं। यह एक लाख रुपये का सिक्योरिटी डिपॉजिट ठेकेदार इस उम्मीद में जमा करता है कि अब उसे प्रभाग के हर छोटे-बड़े काम में बोली लगाने का बराबर अधिकार मिल गया। लेकिन असलियत में यह भारी-भरकम एफडीआर किसी अधिकार की चाबी नहीं, बल्कि उस तमाशे की महंगी एंट्री फीस साबित होती है जिसमें आम ठेकेदारों को सिर्फ दर्शक दीर्घा में बिठा दिया जाता है। टेंडर को तोड़कर जैसे ही कोटेशन प्रक्रिया अपनाई जाती है, प्रभाग में दर्ज दर्जनों पंजीकृत ठेकेदारों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी जाती और सूचना का पूरी तरह से गला घोंट दिया जाता है।
हजूर 👉 सूचना के इस सुनियोजित सन्नाटे के बीच कोटेशन के फॉर्म केवल तीन-चार पसंदीदा फर्मों को चुपके से थमा दिए जाते हैं। बाकी पंजीकृत ठेकेदार अपने दफ्तरों में बैठकर काम निकलने का इंतजार ही करते रह जाते हैं और पीछे-पीछे कार्यादेश भी जारी हो जाते हैं। जब जंगल में जेसीबी गरजने लगती है, तब जाकर आम ठेकेदारों को पता चलता है कि उनके हक का काम किसी बंद कमरे में निपटाया जा चुका है। कागजों का पेट भरने और सरकारी नियम की खानापूर्ति के लिए जिन तीन-चार फर्मों के रेट फाइल में लगाए जाते हैं, उनकी परतें उधेड़िए तो एक ही कुनबे का तिलस्म साफ नजर आने लगता है। शिकायतकर्ता मनोज पंत ने भी वन संरक्षक से मांग की है कि पिछले तीन वर्षों के पूरे ग्राफ को खंगाला जाए ताकि पता चले कि यह महज कोई संयोग है या एक सुनियोजित व्यवस्था।
हजूर 👉 अलग-अलग लिफाफों और भिन्न नामों से दाखिल किए गए इन कोटेशन पर्चों की अगर निष्पक्ष जांच हो, तो कागजों पर भले अलग-अलग मालिक दिखें, लेकिन उनके बैंक खाते, पते, दस्तखत और रिश्तेदारी का तार एक ही परिवार और कारोबारी समूह से जाकर जुड़ता है। यानी टेंडर को टुकड़ों में तोड़ना और फिर चुनिंदा फर्मों के बीच प्रतिस्पर्धा का झूठा नाटक रचना👉यह सब केवल एक ही कुनबे की तिजोरी भरने का रचा गया स्वांग है। अपनी एक लाख की एफडीआर फंसाकर खाली हाथ बैठे ठेकेदारों का सब्र अब जवाब दे चुका है, और इसी हताशा में कुछ लोग अपना पंजीकरण तक वापस ले रहे हैं। वन संरक्षक द्वारा दिए गए जांच के आदेशों के बाद अब गेंद विभाग के पाले में है; तीन साल का रिकॉर्ड सामने आते ही फाइलों में दफन यह राज खुद-ब-खुद चीखकर सच बोल पड़ेगा।



