हजूर 👉तराई में आधी रात बजता है ‘मौत का फोन’ और वन विभाग बोलता है👉“घबराइए मत, टीम निकल चुकी है!” देहरादून की फाइलों से लेकर जहरीले फन तक, वन विभाग के ‘स्नेक कमांडो’ का ऐसा जलवा कि सांप भी बोले👉भाई, आज फिर विभाग आ गया!

जंगल जासूस👉

 

हजूर 👉तराई में आधी रात बजता है ‘मौत का फोन’ और वन विभाग बोलता है👉“घबराइए मत, टीम निकल चुकी है!👉देहरादून की फाइलों से लेकर जहरीले फन तक, वन विभाग के ‘स्नेक कमांडो’ का ऐसा जलवा कि सांप भी बोले👉भाई, आज फिर विभाग आ गया!

हजूर 👉 उत्तराखंड की तराई में गर्मी जब सिर के ऊपर अंगारे बरसाती है और भादों की रात में बादल ऐसे गरजते हैं कि खिड़कियां तक कांप जाएं, उसी वक्त जंगल और खेतों की सरहद से निकलकर कई बार एक ऐसा मेहमान इंसानी घर में दाखिल हो जाता है जिसे देखकर अच्छे-अच्छों की हवाईयां उड़ जाती हैं। रसोई में कोबरा फन फैलाए बैठा है, लकड़ी के ढेर के नीचे करैत ने डेरा डाल रखा है और खेत की मेड़ पर रसेल वाइपर ऐसे पड़ा है जैसे उसे जमीन का पट्टा मिल गया हो। घरवाले चार कदम दूर खड़े और साहबजादे विषधर महाराज पूरे आत्मविश्वास में। उस वक्त परिवार के किसी सदस्य की उंगली फोन पर जाती है और वन विभाग का नंबर घूमता है। बस फिर क्या है👉घर में भगदड़ का माहौल और दूसरी तरफ वन विभाग की रेस्क्यू मशीनरी सक्रिय। जनता के लिए वह फोन नंबर उस समय किसी हेल्पलाइन से कम नहीं लगता।

हजूर 👉 वन विभाग की असली ‘फील्ड टेस्टिंग’ फाइलों में नहीं, ऐसे ही मौकों पर होती है। देहरादून के दफ्तर में बैठकर जंगल की बातें करना आसान है, लेकिन तराई की उमस, कीचड़, घुप अंधेरा और सामने फन उठाए विषधर👉यहां नौकरी का असली इम्तिहान शुरू होता है। सूचना मिलते ही विभागीय स्तर पर टीम को सक्रिय किया जाता है। वरिष्ठ अधिकारी दिशा देते हैं, वन संरक्षक और डीएफओ स्तर पर निगरानी रहती है, रेंजर और वन दरोगा मैदानी अमले को निर्देश देते हैं और फिर असली ‘हीरो’ पहुंचता है—वह वाचर या प्रशिक्षित स्नेक रेस्क्यू कर्मी, जिसके सामने सांप का फन होता है और पीछे डरे हुए परिवार की उम्मीद। ऊपर से आदेश और नीचे रेस्क्यू स्टिक👉यही है सरकारी मशीनरी का वह संस्करण जिसे जनता अपनी आंखों से देखती है।

हजूर 👉 तराई में जंगल और आबादी के बीच दूरी कई जगह इतनी कम है कि कभी हाथी खेत में पहुंच जाता है, कभी गुलदार गांव के रास्ते पर दिखाई देता है और कभी नागराज साहब बिना निमंत्रण के घर में चेकिंग करने पहुंच जाते हैं। लेकिन सांप के मामले में अब समझदारी का एक नया रास्ता भी दिखाई देता है। सांप दिखा तो डंडा उठाने के बजाय फोन उठाइए। प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम को बुलाइए। कोबरा हो, करैत हो या कोई अन्य विषैला सांप👉रेस्क्यू करने वाला कर्मचारी अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए उसे पकड़ने की कोशिश करता है। फिर परिस्थितियों और विभागीय प्रोटोकॉल के अनुसार उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ने की कार्रवाई की जाती है। यानी इंसान की जान बचाने के साथ-साथ बेजुबान जीव को भी अनावश्यक मौत से बचाने की कोशिश। यह काम सुनने में जितना आसान लगता है, मौके पर उतना ही जोखिम भरा होता है।

हजूर 👉 अब जरा उस वाचर का ‘नाइट ड्यूटी पैकेज’ देखिए। रात के बारह बजे फोन आया👉साहब, घर में सांप है।👉साहब ने न पूछा कि सांप ने खाना खाया है या नहीं, न यह पूछा कि वह किस जाति का है। बस रेस्क्यू किट उठाई और निकल पड़े। वहां पहुंचकर सबसे पहले आसपास खड़े लोगों को पीछे हटाना, सांप की स्थिति समझना और फिर सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू करना। सामने वाला जीव यह नहीं बताता कि वह जहरीला है या नहीं और वाचर को यह सुविधा नहीं मिलती कि पहले पूरी रिसर्च करके फिर फन के पास जाएं। यही कारण है कि प्रशिक्षित रेस्क्यू कर्मचारी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। न कैमरे की जरूरत, न तालियों की, न सोशल मीडिया लाइव की। काम हुआ और टीम वापस। अगले फोन तक फिर वही कहानी।

हजूर 👉 असली कमाल यहां यह है कि इस पूरे खेल में दोनों तरफ जिंदगी दांव पर होती है। घबराया इंसान सांप को मारने की कोशिश करे तो खतरा बढ़ सकता है और सांप को पकड़ने के लिए बिना प्रशिक्षण आगे बढ़ना भी जानलेवा हो सकता है। इसलिए प्रशिक्षित रेस्क्यू व्यवस्था सिर्फ वन्यजीव संरक्षण नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। एक तरफ परिवार को सुरक्षित किया जाता है और दूसरी तरफ सांप को अनावश्यक रूप से मारे जाने से बचाने की कोशिश की जाती है। यही वह जगह है जहां वन विभाग की भूमिका सिर्फ ‘जंगल बचाने वाले विभाग’ से आगे बढ़कर ‘मानव और वन्यजीव के बीच टकराव कम करने वाले विभाग’ की बन जाती है। जंगल जासूस की नजर में यही वह काम है जिसकी चर्चा चमकदार प्रेस नोट से ज्यादा जनता के घरों में होती है।

हजूर 👉 और अगर कहानी में दुर्भाग्य से सांप का काटना शामिल हो जाए तो मामला और गंभीर हो जाता है। सर्पदंश के मामलों में सबसे पहली प्राथमिकता चिकित्सा सहायता है। इसके साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़े राज्य के लागू नियमों के तहत पात्र मामलों में राहत और सहायता के प्रावधान भी हैं। यानी परिवार पर मुसीबत टूटने के बाद सरकारी व्यवस्था का काम सिर्फ सांप पकड़कर फोटो खिंचवाना नहीं, बल्कि पात्रता और नियमों के अनुसार पीड़ित तक सहायता पहुंचाने की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाना है। यही संवेदनशीलता किसी विभाग की असली पहचान बनाती है। संकट के समय जनता को यह महसूस होना चाहिए कि वह अकेली नहीं है और सरकारी व्यवस्था उसके साथ खड़ी है।

हजूर 👉 अब जरा उस दूरदर्शी सोच को सलाम कीजिए जिसने यह समझा कि हर सांप को देखते ही मार देना संरक्षण नहीं है। प्रशिक्षित लोगों की टीम बनाना, उन्हें रेस्क्यू की जिम्मेदारी देना, मैदानी कर्मचारियों को संसाधन उपलब्ध कराना और जनता को यह भरोसा देना कि सांप दिखे तो वन विभाग को सूचना दी जा सकती है👉यह सोच आज कई इलाकों में काम आती दिखाई देती है। अधिकारी बदलेंगे, रेंजर बदलेंगे, डीएफओ बदलेंगे, पोस्टिंग की कुर्सियां बदलेंगी, लेकिन अगर व्यवस्था चलती रहे और जनता को उसका लाभ मिलता रहे तो यही किसी नीति की असली परीक्षा और सफलता है। जंगल जासूस उन अधिकारियों को भी सलाम करता है जिन्होंने ऐसी व्यवस्थाओं को शुरू करने, बनाए रखने या मजबूत करने में भूमिका निभाई हो और उन मैदानी कर्मचारियों को भी, जो इसका सबसे कठिन हिस्सा अपने कंधों पर उठाते हैं।

हजूर 👉 देहरादून से लेकर तराई की आखिरी बस्ती तक वन विभाग की इस पूरी चेन का हर किरदार अपनी जगह महत्वपूर्ण है। बड़े साहब दिशा देते हैं, वन संरक्षक निगरानी करते हैं, डीएफओ प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालते हैं, रेंजर और दरोगा मैदानी व्यवस्था को चलाते हैं और अंत में वह वाचर पहुंचता है जिसे देखकर घरवाले राहत की सांस लेते हैं। जहां विभाग से गलती होगी, जंगल जासूस सवाल पूछेगा और जहां विभाग का कर्मचारी रात के अंधेरे में अपनी जान जोखिम में डालकर जनता और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा की कोशिश करेगा, वहां उसकी पीठ भी ठोकेगा। क्योंकि पत्रकारिता का मतलब सिर्फ गलती पकड़ना नहीं, सही काम की पहचान करना भी है।

हजूर 👉 इसलिए आज जंगल जासूस की कलम से एक जोरदार सलाम उन गुमनाम वनकर्मियों के नाम, जिनकी ड्यूटी का कोई चमकदार मंच नहीं होता। न कोई लाल कालीन, न कोई बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस और न कोई वीआईपी स्वागत। बस फोन बजता है और वे निकल पड़ते हैं। सामने फन उठाए कोबरा हो तो भी काम वही, रात के अंधेरे में करैत हो तो भी काम वही और खेत की मेड़ पर वाइपर हो तो भी जिम्मेदारी वही। जनता डरकर फोन करे और दूसरी तरफ से जवाब मिले👉“घबराइए मत, वन विभाग की टीम पहुंच रही है।” यही भरोसा किसी सरकारी विभाग की असली पूंजी है। बाघ की दहाड़ पर तालियां बजाने वाले बहुत मिलेंगे, हाथी की चिंघाड़ पर कैमरे बहुत चलेंगे, लेकिन रात के सन्नाटे में जहरीले फन के सामने खड़े उस वाचर की कहानी कौन लिखेगा? जंगल जासूस लिखेगा। क्योंकि जंगल की हिफाजत सिर्फ बड़े जानवरों से नहीं होती, कभी-कभी एक छोटे से फन के सामने खड़े होने वाले बड़े जिगरे से भी होती है। ऐसे हर जांबाज को जंगल जासूस का सलाम।

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