जंगल जासूस 👉
हजूर 👉जंगल फाइलों से नहीं, वनकर्मियों के कलेजे से बचता है: कुमाऊं के जांबाजों को आखिर कब मिलेगा स्थायी सम्मान?
हजूर 👉कुमाऊं की बर्फीली हवाओं, घने जंगलों और दुर्गम पगडंडियों के बीच जब रात का सन्नाटा छाता है, तब शहरों की चकाचौंध से दूर वन आरक्षी, वन दरोगा और फायर वॉचर अपनी जान हथेली पर रखकर गश्त पर निकलते हैं। इनके पास न तो बड़े-बड़े भाषणों के लिए कोई मंच होता है, न कैमरों की चकाचौंध और न ही अपनी बहादुरी का ढोल पीटने का वक्त। इनके हिस्से में सिर्फ एक ही चीज़ आती है👉कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा। सच तो यह है कि जंगलों की असली ताकत वातानुकूलित कमरों में बैठे अफसरों की फाइलों में नहीं, बल्कि इन्हीं मैदानी सिपाहियों के पसीने, छाले और बेखौफ जज्बे में छिपी होती है।
हजूर 👉आंकड़े गवाही देते हैं कि यह खाकी वर्दी कितनी बड़ी चुनौती और जोखिम का नाम है। सितंबर 2024 तक के उपलब्ध विभागीय रिकॉर्ड बताते हैं कि राज्य गठन के बाद से अब तक 29 वनकर्मी ड्यूटी के दौरान अपनी शहादत दे चुके हैं, जिनमें से अकेले 16 जांबाज कुमाऊं की पावन धरती से थे। वन्यजीवों के खूनी हमले हों, जंगल की बेकाबू आग हो या वन तस्करों से सीधी मुठभेड़👉इन जांबाजों ने कभी पीछे हटना नहीं सीखा। 29 परिवारों ने अपने चिराग खोए, लेकिन व्यवस्था आज भी किसी वन आरक्षी या फायर वॉचर को केवल उसके छोटे पद से आंकने की भूल करती है। उस साधारण सी दिखने वाली वर्दी के पीछे कितना बड़ा त्याग छिपा है, इसकी कीमत कोई अपनी जान देकर ही समझ सकता है।
हजूर 👉बिनसर वन्यजीव अभयारण्य की उस खौफनाक आग को पूरा प्रदेश कभी नहीं भूल सकता, जहां जून 2024 में लपटों से जूझते हुए 4 वनकर्मियों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी और 4 अन्य गंभीर रूप से झुलस गए। धुएं के गुबार और भड़कती लपटों के सामने खड़े वे शूरवीर यह सोचकर नहीं लड़ रहे थे कि अखबारों में उनकी तस्वीर छपेगी या उन्हें कोई तमगा मिलेगा। उनका इकलौता मकसद उस जंगल को बचाना था, जिसे वे अपने कलेजे से लगाकर रखते हैं। आग से लोहा लेने वाला फायर वॉचर हो या कड़कड़ाती ठंड में रातभर जागने वाला आरक्षी, इनकी ड्यूटी को महज एक ‘सरकारी नौकरी’ कहना इनके बेमिसाल बलिदान का सरासर अपमान होगा।
हजूर 👉वर्ष 2023 में 15 अगस्त के पावन अवसर पर हल्द्वानी से सम्मान की एक ऐसी शानदार लहर उठी थी, जिसने जमीनी कर्मचारियों के दिलों में गर्व का नया उजाला भर दिया था। उस समय तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (CCF) पी.के. पात्रो, वन संरक्षक (CF) दीप चंद्र आर्या तथा तत्कालीन DFO संदीप कुमार, प्रकाश आर्या, दीगान्त नायक और शिवराज सिंह जैसे संवेदनशील अधिकारियों ने प्रशासनिक दीवारों को तोड़कर पहली बार मैदानी वनकर्मियों को सार्वजनिक मंच पर लाकर सम्मानित किया था। उस ऐतिहासिक पहल ने जंगल के असली रक्षकों को यह अहसास कराया कि उनका खून-पसीना बेकार नहीं जा रहा है। एक साधारण वनकर्मी के लिए भरे मंच पर अपना नाम सुनना सिर्फ कागज का टुकड़ा पाना नहीं होता, बल्कि उसके बच्चों, परिवार और पूरे महकमे के लिए सीना चौड़ा कर देने वाला ऐतिहासिक लम्हा होता है।
हजूर 👉फिर सवाल यह उठता है कि अधिकारियों की यह बेहतरीन सोच एक स्थायी परंपरा क्यों नहीं बन पाई? अधिकारी आते-जाते रहते हैं, तबादलों के दौर चलते हैं और कुर्षियां बदल जाती हैं, लेकिन जंगल तो वहीं खड़ा रहता है। आग किसी अफसर का ट्रांसफर देखकर नहीं भड़कती, वन तस्कर नई पोस्टिंग का इंतजार नहीं करते और न ही जंगली जानवर सरकारी कैलेंडर देखकर अपनी चाल बदलते हैं। जब खतरे हर पल एक जैसे हैं, तो 2023 में शुरू हुई उस शानदार सोच को हर साल एक मजबूत और अनिवार्य व्यवस्था क्यों नहीं बनाया जाता? यह किसी एक अफसर पर सवाल नहीं, बल्कि पूरे विभाग की नीयत से सीधा जवाब मांगने का वक्त है।
हजूर 👉अब समय आ गया है कि मैदानी शेरों का सम्मान किसी साहब की व्यक्तिगत मर्जी पर निर्भर न रहे, बल्कि विभाग का पक्का कानून बने। CCF स्तर से लेकर CF और DFO स्तर तक हर साल स्वतंत्रता दिवस से पहले प्रत्येक रेंज से निष्ठावान कर्मचारियों का पारदर्शी चयन हो और स्वतंत्रता दिवस पर उन्हें वह मान-सम्मान मिले जिसके वे हकदार हैं। शहीद होने के बाद मोमबत्तियां जलाना और दो मिनट का मौन रखना आसान है, लेकिन असली व्यवस्था वही है जो अपने जवानों के जीवित रहते उनकी पीठ थपथपाना जाने। जंगल फाइलों और भाषणों से नहीं बचते साहब, जंगल बचते हैं तो उस वनकर्मी के कलेजे और हौसले से जो हर खतरे के सामने सीना तानकर खड़ा रहता है!

