जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 क्या विजिलेंस रिपोर्ट में पुख्ता हो चुके वन निगम के महाघोटाले के बाद अब कोर्ट की चौखट पर बेनकाब होंगे फर्जी श्रमिकों के आका?
हजूर 👉 क्या उत्तराखंड वन निगम के दफ्तरों में इन दिनों भ्रष्टाचार का कीड़ा इस कदर कुलबुला रहा है, जिसने महकमे के नुमाइंदों के चेहरों से शराफत का नकाब नोंचकर फेंक दिया है? क्या जंगल की खाक छानकर, पत्थरों पर पसीना बहाकर अपने बाल-बच्चों का पेट पालने वाले असली और गरीब मजदूरों के हक पर बेशर्मी से डाका डाला गया है, जिसकी दास्तां सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएं? क्या कागजों के पन्नों पर रचे गए इस मायाजाल की जब परतें एक-एक कर उघड़ीं, तो अंदर का नजारा देख अक्ल सुन्न नहीं हो गई? क्या कुदाल और फावड़ा उठाने की उम्र में जो मासूम बच्चे अभी किताबों से दोस्ती कर रहे थे, वे कागजों पर वन निगम के पक्के ‘दिहाड़ी मजदूर’ बन बैठे? क्या शहर की पॉश कॉलोनियों में एसी कमरों और चमचमाती लग्जरी गाड़ियों की सैर करने वाली करोड़पति घरानों की मेमसाहबें और तिजोरी पर कुंडली मारकर बैठे रईस बुजुर्ग भी इस फर्जीवाड़े की सूची में बाकायदा मजूरी करते नहीं पाए गए? क्या असली गरीबों का हक मारकर लाखों-करोड़ों की यह मलाई सीधे इन रसूखदारों और कारिंदों के बैंक खातों में नहीं डकार ली गई, और क्या पूरे महकमे में किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी?
हजूर 👉 क्या जब आरटीआई की फाइलों के बक्से खुले और इस महाघोटाले के एक-एक सुबूत बाहर आए, तो लगा कि अब इन अनियमितताओं में शामिल लोगों की उल्टी गिनती शुरू हो गई है? क्या शिकायतकर्ता ने दूध का दूध और पानी का पानी करते हुए प्रमुख सचिव वन से लेकर उत्तराखंड वन निगम के एमडी तक, तमाम बड़े साहबों की मेजों पर सबूतों का ऐसा अंबार लगा दिया कि हड़कंप मच जाना चाहिए था? क्या उम्मीद थी कि इस बेरहम लूट पर किसी बड़े प्रशासनिक बुलडोजर की गाज गिरेगी और ये कारगुजारियां करने वाले सीधे कानून के शिकंजे में आएंगे? लेकिन हुक्मरानों की देहरी पर फाइल पहुंचते ही क्या इंसाफ का पहिया उल्टी दिशा में घूमने नहीं लगा? क्या पूरे एक साल से जांच के नाम पर ऐसा घटिया नौटंकी का खेल नहीं खेला गया, जिससे साफ हो गया कि मकसद मामलों को सुलझाना नहीं, बल्कि पूरी फाइल को ही ठंडे बस्ते में दफन कर देना था? क्या एक साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी किसी जांच अधिकारी ने मुख्य शिकायतकर्ता को बुलाकर उसके दो शब्द बयान कलमबंद करने की जहमत उठाई? क्या आरटीआई के वे जिंदा और चीखते-चिल्लाते सबूत फाइलों में कैद होकर नहीं रह गए और क्या करप्शन के इस काले कारनामे को महकमे के भीतर ही दबाने की साजिशें परवान नहीं चढ़ती रहीं?
हजूर 👉 क्या मामले की गंभीरता को देखते हुए जब विजिलेंस उत्तराखंड ने इस पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच की, तो दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो गया? क्या विजिलेंस की निष्पक्ष जांच में फर्जीवाड़े के तथ्य पूरी तरह सही नहीं पाए गए और क्या विजिलेंस ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट उत्तराखंड शासन को प्रेषित नहीं कर दी? क्या कायदे से विजिलेंस की रिपोर्ट में घोटाला साबित होने के बाद शासन स्तर से दोषियों पर गाज नहीं गिरनी चाहिए थी और कड़ी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी? लेकिन क्या सिस्टम का काला खेल यह नहीं था कि शासन ने वह विजिलेंस रिपोर्ट कार्रवाई के लिए वापस वन निगम को ही सौंप दी? क्या वन निगम के हुक्मरानों ने उस रिपोर्ट पर कड़ा एक्शन लेने के बजाय, गेंद को फिर उन्हीं अधिकारियों-कर्मचारियों के पाले में नहीं डाल दिया जिनके पास पहले से ही इस जांच को लटकाने का काम चल रहा था?
हजूर 👉 क्या इस फर्जीवाड़े में नाबालिग बच्चों के पहचान पत्रों और आधार कार्ड की जन्मतिथि से छेड़छाड़ कर उन्हें बाकायदा बालिग दिखाया गया और उनके खातों में सरकारी धन की बंदरबांट की गई, जो सीधे तौर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (कूटरचना), 468 (धोखाधड़ी के लिए कूट रचित दस्तावेज) और 471 (फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल) का खुला और साफ उल्लंघन नहीं है? क्या इस पूरे गंदे खेल को पर्दे के पीछे से बचाने के लिए प्रशासनिक कायदे-कानूनों की ऐसी धज्जियां नहीं उड़ाई गईं कि कायदा भी शर्म से पानी-पानी हो जाए? क्या महकमे के सेवा नियमों की बुनियादी एबीसीडी यह नहीं कहती कि जब किसी अफसर की गर्दन जांच के घेरे में हो, तो इंसाफ का तकाजा है कि जांच उससे कम से कम एक कदम ऊपर के वरिष्ठ अधिकारी के हाथ में सौंपी जाए ताकि दूध में पानी न मिल सके? लेकिन क्या हल्द्वानी के तत्कालीन क्षेत्रीय प्रबंधक यानी आरएम मयंक शंकर झा ने इन सारे नियमों को कचरे के डिब्बे में नहीं फेंक दिया? क्या जिस तत्कालीन डीएलएम के काले कारनामों और कारगुजारियों पर उंगलियां उठ रही थीं, आरएम साहब ने उस फाइल को किसी सीनियर अफसर को सौंपने या खुद जांचने के बजाय, उल्टे उसी के समकक्ष यानी उसी रैंक के दूसरे डीएलएम की झोली में नहीं डाल दिया? क्या अब यह सवाल नहीं उठता कि जब विजिलेंस जैसी सर्वोच्च जांच एजेंसी अपनी जांच रिपोर्ट सौंपकर घोटाले पर मुहर लगा चुकी है, तो फिर आखिर वन निगम के भीतर यह कौन सी और किस बात की ‘आंतरिक जांच’ का नाटक चलाया जा रहा है? क्या विजिलेंस की स्पष्ट रिपोर्ट के बाद भी मामला लटकाकर जांच का स्वांग रचना सिर्फ और सिर्फ दोषियों को बचाने और समय बिताने की एक सोची-समझी प्रशासनिक चाल नहीं है? क्या जांच के नाम पर यह खेल नहीं हुआ कि शिकायतकर्ता से ही स्टाम्प पेपर पर लिखवाकर औपचारिकताएं पूरी कराई गईं? क्या मतलब साफ नहीं था कि जिम्मेदार की जांच उसी स्तर के अधिकारी से कराई गई ताकि कोई दाग दामन पर न आए?
हजूर 👉 क्या यह अंधेरगर्दी और भ्रष्टाचार का यह नासूर सिर्फ एक डिपो तक सीमित है, या वन निगम के दूसरे डिपो में भी फर्जी श्रमिकों के नाम पर सरकारी तिजोरी लूटने का यह धंधा धड़ल्ले से फल-फूल रहा है? क्या जब विजिलेंस की रिपोर्ट आने के बाद भी महकमे के चौधरियों ने खुद इंसाफ की हत्या कर दी और इन लोगों को खुला अभयदान दे दिया, तो क्या अब शिकायतकर्ता ने भी इन अफसरों को सीधी टक्कर देने की ठान नहीं ली है? क्या विजिलेंस की रिपोर्ट, धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत जालसाजी के दस्तावेज, आरटीआई के तीखे सबूतों, बैंक के फर्जी लेन-देन और इस नियम-विरुद्ध जुगाड़ वाली फर्जी जांच की पूरी कुंडली अब सीधे अदालत की चौखट पर पेश होने नहीं जा रही है? क्या बस कुछ ही दिनों की बात नहीं है, जब यह काला चिट्ठा माननीय न्यायालय की मेज पर खुलेगा, तो विजिलेंस रिपोर्ट को दबाकर एक ही रैंक के अफसरों की मिलीभगत से फाइल दबाने वाले इन तमाम जिम्मेदार हुक्मरानों की रातों की नींद नहीं उड़ेगी? क्या कोर्ट के इस हंटर के चलने पर अब यह देखना बेहद दिलचस्प नहीं होगा कि इस महाघोटाले के असली आका और उनके पीछे छिपे कौन-कौन से बड़े चेहरे बेनकाब होकर सामने आते हैं?



