जंगल जासूस 👉
हजूर 👉देवभूमि के हरे सोने की लूट 👉 फाइलों के मकड़जाल में कैद छब्बीस सालों का महाघोटाला?
हजूर 👉उत्तराखंड के ये हरे-भरे जंगल, जो कभी इस पहाड़ी प्रदेश की आबोहवा और तरक्की का आधार बनने वाले थे, पिछले छब्बीस सालों में अफसरों, ठेकेदारों और नेताओं के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गए। राज्य बना तो सोचा था कि लकड़ी बिकेगी तो सूबे की तिजोरी भरेगी, सड़कों और स्कूलों के लिए पैसा आएगा, लेकिन यहाँ तो खेल ही उल्टा पड़ गया। पेड़ों की कटाई से लेकर नीलामी तक, और डिपो से लेकर सरकारी रजिस्टरों तक, हर जगह सिर्फ एक ही खेल चलता रहा और वह था कागजी हेरफेर और गोलमाल का खेल।
हजूर 👉लालकुआं डिपो संख्या चार और पांच की जो कहानी है, वह तो इतनी चटपटी और हैरान करने वाली है कि कोई फिल्मी पटकथा भी इसके आगे फीकी नजर आए। अब जरा गहराई से समझिए कि वहाँ क्या गुल खिलाया गया। पाँच लाख रुपये की सरकारी लकड़ी की बोली लगती है, ठेकेदार माल उठाता है, लेकिन जब कागजों का पन्ना पलटता है तो बिल पर दर्ज रकम सिर्फ तीन लाख रुपये दिखती है। अब कोई पूछे कि साहब बाकी का दो लाख रुपये कहाँ गायब हो गया, क्या उसे हवा निगल गई या किसी की जेब में समा गया? कर्मचारी संघ ने जब चीख-चीखकर ढिंढोरा पीटा कि यह सिर्फ एक-दो लाख का मामला नहीं बल्कि पूरे दस करोड़ रुपये से ज्यादा का महाघोटाला है, तब जाकर महकमे की नींद टूटी। फिर शुरू हुआ जाँच का नाटक। विशेष आंतरिक ऑडिट की बात हुई, एसआईटी की टीम बनाई गई, बयान दर्ज हुए, लेकिन जब नतीजा सार्वजनिक करने की बारी आई तो पूरी की पूरी फाइल ही ठंडे बस्ते के हवाले कर दी गई।
हजूर 👉अब जरा रुख कीजिए तराई पश्चिमी वन प्रभाग यानी रामनगर का, जहाँ की दास्तान सुनकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाएँ। साल 2022-23 के उस कुख्यात लॉगिंग लॉट का जब संयुक्त निरीक्षण हुआ, तो जंगल के सन्नाटे में जो काला सच छुपा था, वह बाहर निकल आया। एक दो नहीं, बल्कि पूरे 137 हरे-भरे पेड़ों का अवैध कटान कर दिया गया। इतना ही नहीं, कोसी नदी का सीना चीरकर अवैध खनन का काला कारोबार भी बेखौफ चलता रहा। जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया और तत्कालीन लॉगिंग प्रबंधक पर गाज गिरी, तो एक करोड़ ग्यारह लाख छब्बीस हजार रुपये की भारी-भरकम पीडी यानी वसूली की मांग दर्ज की गई। लेकिन हमारे देश के सरकारी अफसर कानून के पेंच में कितने माहिर होते हैं, उसकी मिसाल देखिए। साहब पर जैसे ही वसूली का डंडा पड़ा, वे झट से आर्बिट्रेशन यानी मध्यस्थता की शरण में चले गए। अब आम आदमी अगर अपने बिजली का बिल न भरे तो उसका कनेक्शन तुरंत काट दिया जाता है, लेकिन यहाँ करोड़ों के घपले में शामिल अफसर आराम से मध्यस्थता की मेज पर बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हैं और मामला बरसों-बरस तक लटका रहता है।
हजूर 👉कहानी सिर्फ लालकुआं या रामनगर में खत्म नहीं होती। उत्तराखंड के गठन से लेकर आज तक, चाहे परिसंपत्ति समायोजन का दौर रहा हो, हरिद्वार का खनन प्रभाग हो, टोंस का दुर्गम लॉगिंग क्षेत्र हो या फिर जगह-जगह लगे हुए खनन गेट, हर जगह से करोड़ों रुपये के वारा-न्यारा होने की खबरें आती रही हैं। कर्मचारी संघों के दावे मानें तो यह पूरा गोलमाल 20 से 25 करोड़ रुपये से ऊपर बैठता है। लेकिन दुख की बात यह है कि जब भी किसी मामले में विजिलेंस या एसआईटी बैठती है, तो ऐसा लगता है मानो जाँच का मकसद सच सामने लाना नहीं, बल्कि मामले को इतना उलझा देना है कि लोग धीरे-धीरे उसे भूल जाएँ।
हजूर 👉एक ही घोटाले पर ऑडिट रिपोर्ट कुछ कहती है, एसआईटी कुछ और लिखती है, विभागीय जाँच में किसी छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बना दिया जाता है, और बड़े-बड़े आका मलाई खाकर साफ निकल जाते हैं। फाइलों का यह खेल ऐसा है कि शिकायत आई तो फाइल खुली, जाँच हुई तो दूसरी फाइल बनी, पत्राचार हुआ तो तीसरी फाइल तैयार हुई, लेकिन जब जनता पूछती है कि भाईसाहब असल नुकसान कितना हुआ और कितना पैसा सरकारी खजाने में वापस आया, तो जवाब में सिर्फ खामोशी मिलती है।
हजूर 👉उत्तराखण्ड राज्य को बने हुए छब्बीस साल बीतने जा रहे हैं, लेकिन वन निगम के खातों का यह अधूरा और गोलमोल हिसाब आज भी उत्तराखंड की जनता के मुँह पर तमाचा है। जंगल में एक-एक पेड़ का नंबर दर्ज होता है, डिपो में हर गिल्टे की नाप-जोख होती है, फिर भी जब करोड़ों के घपले का हिसाब माँगिए तो कोई जवाब देने को तैयार नहीं होता। अब वक्त आ गया है कि फाइलों के इस मकड़जाल को तोड़ा जाए और राज्य गठन से लेकर अब तक के तमाम मामलों का कच्चा चिट्ठा सरेआम जनता के सामने रखा जाए, ताकि पता तो चले कि इस हरे सोने को लूटने वाले असली डकैत कौन थे?



