जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 जान हथेली पर, नौकरी अधर में: 2018 की कटऑफ का ‘गेम’👉 क्या 2025 में मिलेगा वन वाचरों को उनका हक?
हजूर 👉उत्तराखंड के वन विभाग का पारा इस वक्त सातवें आसमान पर चढ़ चुका है और चारों तरफ हड़कंप सा मचा हुआ है। बरसों से जान जोखिम में डालकर घने जंगलों, खूंखार जानवरों और वन माफिया के बीच ड्यूटी देने वाले कर्मचारियों के सब्र का बांध अब पूरी तरह टूट कर बिखर गया है। सेवा तो पूरे जीवन भर पक्की ली जा रही है, लेकिन जब अधिकार देने की बारी आई तो नौकरी का दर्जा आज भी वही का वही कच्चा छोड़ दिया गया। सालों से नियमित होने की आस में आंखें बिछाए बैठे इन संविदा और दैनिक वेतनभोगी कर्मियों के अरमानों पर उस समय वज्रपात हो गया, जब हाईकोर्ट के सामने सरकार की तरफ से कोई ठोस जवाब या पुख्ता रुख पेश ही नहीं किया जा सका। अदालत ने भी सरकार के इस सुस्त रवैये पर सख्त रुख अपनाते हुए दो हफ्ते की मोहलत का कड़ा झटका दिया है और अगली तारीख तय कर दी है।
हजूर 👉इस पूरे अदालती संग्राम और सड़कों से लेकर कमरों तक सुलगती नाराजगी की असली वजह है सरकार की विवादास्पद नियमावली 2025। याचिकाकर्ता पृथ्वी सिंह राणा और उनके साथी जब अपने निर्भीक वकील विनोद फुलारा के जरिए अदालत के दरवाजे पर पहुंचे, तो सरकारी सिस्टम के दांव-पेचों की परतें उधड़कर सामने आ गईं। याचिका में सरकार द्वारा तय की गई उस पुरानी और अजीबोगरीब कटऑफ तारीख पर सीधा हमला बोला गया है, जिसने सैकड़ों समर्पित कर्मचारियों के करियर पर अनिश्चितता का काला साया मंडरा दिया है। सरकार ने अपनी शर्तों की दीवार खड़ी करते हुए 4 दिसंबर 2018 की रेखा खींच दी है और फरमान सुना दिया कि सिर्फ वही कर्मी पक्के होंगे जिन्होंने उस तारीख तक अपने 10 साल का कठिन कार्यकाल पूरा कर लिया था।
हजूर 👉बस इसी एक शर्त ने बारूद में चिंगारी का काम कर दिया और कर्मचारियों के बीच आक्रोश की आग भड़क उठी। याचिकाकर्ताओं का सबसे तीखा और सीधा सवाल यही है कि जब सरकार नियम और कानून ही दिसंबर 2025 में तैयार कर रही है, तो फिर कर्मचारियों के भविष्य का फैसला करने के लिए सात साल पुराना 2018 का पैमाना क्यों जबरन थपा जा रहा है। क्या 2018 से लेकर 2025 के बीच इन कर्मियों ने जो खून-पसीना बहाया, जंगलों में गश्त लगाई और अपनी पूरी जवानी विभाग के नाम कर दी, उस मेहनत की सरकारी नजर में कोई कीमत ही नहीं बची।
हजूर 👉वन विभाग की यह नौकरी कोई वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर फाइलों को इधर-उधर खिसकाने का आसान खेल नहीं है। यह तो हर लम्हा मौत से आंखें मिलाने और खतरे के साये में जीने का नाम है। कड़कड़ाती ठंड हो, मूसलाधार बारिश हो या फिर जंगल को राख कर देने वाली भीषण आग, यही कर्मचारी जान पर खेलकर सबसे पहले मोर्चे पर डटे रहते हैं। शिकारियों से लोहा लेना हो, तस्करों की गोलियों का सामना करना हो या खूंखार वन्यजीवों से गांवों की रक्षा करनी हो, ये जांबाज हमेशा अगली कतार में खड़े मिलते हैं। लेकिन जब इनकी वफादारी और सेवा का इनाम देने का वक्त आया, तो पुरानी तारीखों का मायाजाल बुनकर इनके हक पर डाका डालने का पूरा इंतजाम कर दिया गया।
हजूर 👉अदालत में याचिकाकर्ताओं का रुख बेहद आक्रामक और स्पष्ट है। उनकी एक ही दोटूक मांग है कि 4 दिसंबर 2018 की इस अन्यायपूर्ण कटऑफ तारीख को तुरंत प्रभाव से खारिज करके कूड़ेदान में फेंका जाए। इसके बजाय जिस तारीख को नियमावली जारी हुई है, यानी दिसंबर 2025 को ही असली कटऑफ रेखा माना जाए। अगर यह मांग मान ली जाती है, तो बरसों से अंधियारे में भटक रहे सैकड़ों परिवारों की जिंदगी में एक झटके में खुशहाली का नया सवेरा आ जाएगा।
हजूर 👉अब यह जंग केवल अदालती दलीलों और धाराओं का खेल नहीं रह गई है, बल्कि यह उन जांबाज रखवालों की इज्जत, वजूद और रोजी-रोटी की सीधी लड़ाई बन चुकी है। दिन में जंगल की ड्यूटी के दौरान शिकारी और जानवरों का खतरा मंडराता है, तो रात को घर लौटकर रोजी-रोटी छीन जाने का खौफ पीछा करता है। पूरे प्रदेश के कर्मचारियों की धड़कनें अब हाईकोर्ट की अगली तारीख पर टिकी हुई हैं। देखना बेहद दिलचस्प होगा कि दो हफ्ते बाद जब सरकारी फाइलों का पुलिंदा अदालत के सामने खुलेगा, तब सरकार अपनी पुरानी जिद्द पर अड़ी रहती है या फिर इन बेबाक रखवालों के वर्षों के पसीने की कद्र करते हुए 2025 का नया रास्ता खोलती है।

