जंगल जासूस 👉
हजूर 👉किशनपुर की कुर्सी बनी ‘हॉट सीट’!👉9 सितंबर को हाईकोर्ट में सामने आएगा ट्रांसफर विवाद का अगला अध्याय?
हजूर👉 उत्तराखंड का प्रशासनिक गलियारा इन दिनों किसी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म के सेट जैसा नजर आ रहा है👉हर कुछ दिनों में नया आदेश, नई तैनाती और उसके साथ एक नया सवाल। जंगल में पेड़ अपनी जगह शांत खड़े हैं, वन्यजीव अपने रास्ते पर हैं, लेकिन उन्हीं जंगलों के बीच रेंज अधिकारियों की बदलती तैनातियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इस कहानी के केंद्र में है किशनपुर रेंज की कुर्सी। उपलब्ध घटनाक्रम के मुताबिक 7 जुलाई को घनानन्द चन्याल को किशनपुर से बाराकोली भेजा गया, 13 अगस्त को बाराकोली से रनसाली स्थानांतरण का आदेश सामने आया और 24 अगस्त को एक अन्य आदेश के जरिए उन्हें फिर किशनपुर भेजे जाने की स्थिति बनी। यानी कुछ ही सप्ताह में किशनपुर👉बाराकोली👉रनसाली और फिर किशनपुर का सिलसिला सामने आया। ट्रांसफर के इस बदलते नक्शे को देखकर मुस्कुराने का मन जरूर करता है👉गूगल मैप भी शायद पूछ ले, “साहब, इस बार डेस्टिनेशन पक्का समझूं?”
हजूर👉 इसी घटनाक्रम के बीच महेन्द्र सिंह रैकुनी की ओर से नैनीताल हाईकोर्ट में विशेष याचिका संख्या 575/2026 दाखिल किए जाने की बात सामने आई है। याचिका में स्थानांतरण से जुड़े आदेशों और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। 3 सितंबर को मामला मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष आया और अगली सुनवाई के लिए 9 सितंबर की तारीख सामने है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि याचिका में लगाए गए आधार और आरोप न्यायालय के समक्ष विचाराधीन दावे हैं; उन्हें अंतिम रूप से स्थापित तथ्य मानना अभी उचित नहीं होगा। अदालत के समक्ष रखे जाने वाले दस्तावेज और दोनों पक्षों की दलीलें ही मामले की तस्वीर को अधिक स्पष्ट करेंगी।
हजूर👉 इस विवाद में 13 अगस्त के आदेश से जुड़ी अनुमोदन और अनुपालन की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। यदि किसी आदेश की निर्धारित प्रक्रिया, सक्षम स्तर के अनुमोदन अथवा उसके अनुपालन को लेकर कोई विवाद है, तो उसका वास्तविक परीक्षण संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और लागू नियमों के आधार पर ही हो सकता है। दूसरी ओर प्रशासनिक पक्ष से यह तर्क सामने आ सकता है कि प्रभागीय वनाधिकारी को कार्यहित, प्रशासनिक आवश्यकता और वन सुरक्षा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपने प्रभाग के भीतर अधिकारियों की तैनाती में बदलाव करने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए फिलहाल इसे सीधे तौर पर सही या गलत ठहरा देना जल्दबाजी होगी। असली सवाल यह है कि जिस प्रशासनिक अधिकार का प्रयोग किया गया, उसका इस्तेमाल निर्धारित नियमों और प्रक्रिया के अनुरूप हुआ या नहीं। इसका जवाब अदालत के समक्ष उपलब्ध रिकॉर्ड और दलीलों से ही निकलना है।
हजूर👉 अब नजरें 9 सितंबर पर हैं। उस दिन अदालत के सामने स्थानांतरण आदेशों, उनकी प्रक्रिया और संबंधित प्रशासनिक अधिकारों से जुड़े पहलुओं पर आगे सुनवाई होगी। अदालत का आदेश ही यह स्पष्ट करेगा कि इस चरण पर मामले में आगे की प्रशासनिक स्थिति क्या होगी। फिलहाल किशनपुर की कुर्सी जरूर ‘हॉट सीट’ बनी हुई है और जंगल जासूस को बस इतना ही कहना है👉पेड़ अपनी जगह स्थिर हैं, वन्यजीव अपनी चाल में हैं और कुर्सी बेचैनी में है कि अगला आदेश किसके नाम आएगा! लेकिन अंतिम तस्वीर अदालत के आदेश के बाद ही साफ होगी। तब तक इस पूरी कहानी को आरोप और निष्कर्ष के बजाय सवाल, दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया की नजर से देखना ही सबसे सुरक्षित और निष्पक्ष रास्ता है?



