जंगल जासूस 👉
हजूर 👉 ‘एक रुपये’ का टेंडर निरस्त, फिर भी डिपो में गर्जे पंजे! आरएम दफ्तर की नाक के नीचे कागजी मजदूरों का करोड़ों का महाघोटाला, RTI में जवाब देने से कतराए आरएम और डीएसएम; सरकारी भुगतान को बता दिया ‘निजी सूचना’?
हजूर 👉 उत्तराखंड वन विकास निगम के भीतर चल रहा खेल अब सिर्फ एक प्रशासनिक लापरवाही है या सरकारी खजाने पर मारा गया एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक डाका जिसे देखकर बड़े-बड़े शातिर अपराधियों के भी पसीने छूट जाएं? आरएम ऑफिस से महज 20 मीटर की दूरी पर जब मशीनी पंजे दिन-रात दहाड़ रहे हों, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक क्यों नहीं होगा कि जिम्मेदार अधिकारियों की नजर वहां तक आखिर क्यों नहीं पहुंच रही? विक्रय प्रभाग के रामनगर, कालाढूंगी और चांदनी डिपो में मशीनों से लकड़ी की ग्रेडिंग का मामला हो या फिर लॉगिंग प्रभाग में जंगलों के बीचों-बीच मशीनों से जड़ खुदान का काम, टेंडर निकालने और फिर अचानक उसे निरस्त कर देने का यह जादुई नाटक कोई इत्तेफाक है या बाजार की कम से कम दरों का पता लगाने की एक गुप्त चालाकी? क्या निगम की अपनी सरकारी नॉर्म्स दरें आसमान छूने के कारण टेंडर निरस्त होते ही वही ठेकेदार पिछले दरवाजे से एंट्री मारते हैं और कम दरों पर मशीनों से धड़ल्ले से काम शुरू करा दिया जाता है?
हजूर 👉 क्या जनवरी 2026 में निकाले गए ‘एक रुपये के टेंडर’ से लेकर आज डिपो में गरज रहे पंजों तक की पूरी कहानी इसी सिंडिकेट को जोड़ती है? टेंडर निरस्त होने के बावजूद उसी ठेकेदार से जुड़े चार पंजे और अन्य मशीनें किस आदेश, किस तय दर और किस कार्यादेश के तहत कालाढूंगी डिपो में काम कर रही हैं, इसका कोई जवाब विभागीय अफसरों के पास क्यों नहीं है? चांदनी डिपो में तो पहले भी लकड़ी से भरे ट्रक में मशीनी पंजों से लोडिंग का मामला गर्मा चुका है, तो फिर पूर्व में एसओजी की कार्रवाई के बावजूद जांच को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया गया? वहीं कालाढूंगी डिपो में आरटीओ की ओर से चालान काटे जाने के बावजूद आज भी ये भारी-भरकम पंजे बेखौफ कैसे गरज रहे हैं? जब इस पूरे घालमेल के संबंध में डीएसएम रामनगर से आधिकारिक पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उनका फोन व्यस्त आने और बात करने से कतराने का रवैया क्या यह जाहिर नहीं करता कि दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है?
हजूर 👉 लेकिन असली तड़का तो तब लगता है जब इस पूरे खेल का सरकारी फाइलों में इंद्राज किया जाता है। रामनगर, कालाढूंगी और चांदनी डिपो के मौकों पर विशालकाय लोहे की मशीनें और पंजों से दिन-रात काम लिया जा रहा होता है, लेकिन वन निगम के मस्टर रोल और रजिस्टरों में यह क्यों लिखा जाता है कि यह काम कड़कड़ाती धूप और सर्दी में गरीब ‘विभागीय श्रमिकों’ ने अपने हाथों से कुल्हाड़ी और आरी चलाकर किया है? जब काम मशीनें कर रही हैं तो क्या कागजों में लिखे मजदूरों के नाम फर्जी होना तय नहीं था, और क्या इस फर्जीवाड़े का असली रंग तब नहीं उघड़ा जब उन कागजी मजदूरों के नाम पढ़े गए?
हजूर 👉 क्या निगम के अपने अभिलेख और दफ्तर की अलमारियां इस बात की चीख-चीखकर गवाही नहीं दे रहीं कि जिन नामों पर हर महीने सरकारी तिजोरी से करोड़ों रुपये का भुगतान हो रहा है, वे कोई गरीब, बेबस या नंगे पैर घूमने वाले मजदूर नहीं हैं? कागजों में कुल्हाड़ी और आरी चला रहे ये ‘मजदूर’ असल में शहर के बड़े-बड़े बिजनेसमैन, एसी दफ्तरों में बैठने वाले सर्विसमैन, कॉलेज जाने वाले नौजवान स्टूडेंट, भारी-भरकम टैक्स भरने वाले आयकरदाता, बिस्तर पर पड़ी वृद्ध महिलाएं और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्ग क्यों बने हुए हैं? हद तो तब हो जाती है जब वन निगम की नीलामियों में हर साल करोड़ों रुपये की लकड़ी पर बोली लगाने वाले नामचीन अग्रवाल और गुप्ता परिवारों के करोड़पति महिला-पुरुष भी कागजों में रामनगर और कालाढूंगी जैसे डिपो के भीतर गड्ढे खोदते और लकड़ी के भारी लट्ठों को खिसकाते हुए पाए जाते हैं; जो सेठ लग्जरी गाड़ियों से उतरकर करोड़ों के सौदे करते हैं, वे वन निगम की फाइलों में रोजाना दिहाड़ी पर मजदूरी कैसे कर रहे हैं?
हजूर 👉 क्या बात यहीं खत्म हो जाती है, या जड़ खुदान और लकड़ी के वॉल्यूम के आकलन में भी आंकड़ों का बहुत बड़ा खेल चल रहा है? जंगल से निकली वास्तविक मात्रा की तुलना में डिपो के स्टॉक रजिस्टर में जड़ों के चट्टों का आकार और वॉल्यूम अत्यधिक बढ़ाकर क्यों दर्ज किया जाता है? यहां तक कि निकासी अभिलेखों में एक ट्रक की वास्तविक क्षमता से कई गुना अधिक, यानी 100 से 120 घनमीटर तक माल दर्ज होने की बात सामने आ रही है, जो कि भौतिक रूप से किसी भी परिवहन वाहन के लिए कैसे संभव हो सकता है? यदि ट्रकों की वास्तविक क्षमता, चट्टों के भौतिक माप, माप पुस्तिकाओं और निकासी रवन्नों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो क्या करोड़ों रुपये का यह कागजी घोटाला बेनकाब नहीं हो जाएगा?
हजूर 👉 अब यह समझना क्या मुश्किल है कि जब सूचना के अधिकार (RTI) के तहत आहरण-वितरण अधिकारी से इन तथाकथित मजदूरों के बैंक खातों, मस्टर रोल और भुगतानों का हिसाब मांगा जाता है, तो आरएम और डीएसएम जैसे जिम्मेदारों के हाथ-पांव क्यों फूलने लगते हैं? लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी मिलकर आरटीआई कानून 2005 की सरेआम धज्जियां उड़ाते हुए, सरकारी धन से हुए भुगतान और कार्यपालक रिकॉर्ड की जानकारी को ‘निजी सूचना’ (Personal Information) बताने का हास्यास्पद व गैर-कानूनी बहाना बनाकर सच को तिजोरी में बंद करने में क्यों जुटे हैं? क्या सरकारी खजाने से हुए भुगतान और फर्जी मजदूरी के इस घपले में सीधा व्यापक जनहित, लोकहित और राज्य के वित्तीय हित नहीं जुड़े हुए हैं?
हजूर 👉 क्या माननीय प्रधानमंत्री और माननीय मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ के नारों की धज्जियां वन निगम के ये अफसर अपने बंद कमरों में बैठकर नहीं उड़ा रहे हैं? सरकारी पैसे की यह खुली बंदरबांट और फर्जी रसूखदारों के नाम पर बैंक खातों में धन ट्रांसफर करने का यह रैकेट क्या एक संगठित आपराधिक षड्यंत्र नहीं है? इस काले कारनामे पर पर्दा डालने में जुटे अधिकारियों के खिलाफ अब सक्षम स्तर पर अपीलीय और कानूनी जंग क्यों न छेड़ी जाए? यदि टेंडर निरस्तीकरण आदेश, मशीनों के प्रवेश-निकास रिकॉर्ड, मस्टर रोल, स्टॉक रजिस्टर और निकासी रवन्नों की एक साथ जांच करा ली जाए, तो क्या यह साफ नहीं हो जाएगा कि डिपो में केवल लोहे के पंजे नहीं चल रहे, बल्कि उनके पीछे बड़े-बड़े सफेदपोशों के हाथ हैं? क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि कागजों पर ‘मजदूर’ बने इन सेठों और उन्हें संरक्षण देने वाले आकाओं को कानून का कड़ा सबक सिखाया जाए?



