हजूर 👉कॉर्बेट फॉल में खुलेगा कुनबे की ‘लॉटरी’ का राज👉 नए सत्र के साथ कोटेशन की मटकी फोड़ने की तैयारी!

जंगल जासूस 👉

हजूर 👉कॉर्बेट फॉल में खुलेगा कुनबे की ‘लॉटरी’ का राज👉 नए सत्र के साथ कोटेशन की मटकी फोड़ने की तैयारी!

हजूर 👉 सरकारी फाइलों की धूल और दफ्तरों के बंद कमरों में चल रही चर्चाओं के बीच कालाढूंगी रेंज का नया पर्यटन सत्र दस्तक दे रहा है। सैलानियों को सामने कॉर्बेट फॉल का झरना, हरियाली और जंगल सफारी दिखाई देगी, लेकिन पर्दे के पीछे नजर रहेगी उन कोटेशन प्रक्रियाओं पर, जिनके जरिए पर्यटन स्थलों पर होने वाले विभिन्न कार्यों का रास्ता तय होता है। इस बार असली सवाल यही है👉क्या मैदान में नए खिलाड़ी उतरेंगे या पुराने चेहरे ही फिर पूरी बाजी अपने नाम करेंगे?

हजूर 👉 कॉर्बेट फॉल वन विभाग के लिए महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। वर्ष 2022-23 में यहां से करीब 50.59 लाख रुपये राजस्व मिलने की रिपोर्ट सामने आई थी। जब किसी पर्यटन स्थल से इतनी बड़ी आमदनी होती है तो जाहिर है कि उसके रखरखाव, सफाई, सुरक्षा, बैरियर, रास्तों और अन्य व्यवस्थाओं पर भी सरकारी धन खर्च होता है। यहीं से सवाल उठता है कि राजस्व से होने वाले खर्च की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और काम किन लोगों तक पहुंचता है?

हजूर 👉 नियमों के तहत राजस्व का उपयोग संबंधित पर्यटन स्थल की व्यवस्थाओं और विकास कार्यों में किया जाता है तो फिर हर साल होने वाले कामों की प्रक्रिया भी सवालों से ऊपर होनी चाहिए। लेकिन असली जिज्ञासा अब यह है कि क्या इस बार कोटेशन प्रक्रिया वास्तव में खुली प्रतिस्पर्धा होगी? कौन-कौन फर्में हिस्सा लेंगी, उनकी दरें क्या होंगी और अंततः काम किसके हिस्से में जाएगा👉इन सवालों का जवाब कागजों से ही निकलेगा।

हजूर 👉 पिछले वर्षों की प्रक्रिया को लेकर यदि एक ही परिवार, एक ही कारोबारी समूह या आपस में जुड़े लोगों से संबंधित फर्मों की भागीदारी बार-बार सामने आती रही हो, तो इस बार उन रिकॉर्डों की तुलना करना बेहद दिलचस्प होगा। फर्मों के नाम अलग-अलग, पते अलग-अलग और लिफाफे अलग-अलग👉लेकिन संचालक, संपर्क या हित कहीं आपस में जुड़े तो नहीं? यही वह कड़ी है जिसे दस्तावेजों के जरिए जांचना जरूरी है।

हजूर 👉 कागजों में कई कोटेशन होना अपने आप में पारदर्शिता की अंतिम गारंटी नहीं है। असली तस्वीर तब सामने आती है जब पिछले वर्षों के कोटेशन, फर्मों के नाम, जीएसटी विवरण, पते, दरें, तुलनात्मक विवरण, स्वीकृति आदेश और भुगतान रिकॉर्ड को एक साथ रखकर देखा जाए। अगर हर बार अलग-अलग कामों में वही सीमित समूह घूम-फिरकर सामने आता है, तो यह महज संयोग है या प्रक्रिया की कोई विशेष प्रवृत्ति—इसका जवाब विभागीय रिकॉर्ड ही दे सकते हैं।

हजूर 👉 अब नजर कॉर्बेट हेरिटेज जंगल सफारी पर भी है। कालाढूंगी और आसपास के पर्यटन क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ने के साथ व्यवस्थाओं और उनसे जुड़े खर्च का दायरा भी महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए यहां होने वाली प्रत्येक कोटेशन प्रक्रिया पर भी वही सवाल लागू होता है👉कौन आया, किसने कितना रेट दिया और आखिर काम किसके नाम हुआ?

हजूर 👉 इस बार कहानी सिर्फ कोटेशन खुलने तक सीमित नहीं रहेगी। असली पड़ताल तो उसके बाद होगी। कितनी फर्मों ने हिस्सा लिया? कौन-कौन पात्र था? सबसे कम दर किसकी थी? काम किसे मिला? पिछले वर्षों में इन्हीं फर्मों का रिकॉर्ड क्या रहा? और क्या अलग-अलग फर्मों के पीछे कोई साझा संबंध दिखाई देता है? इन सवालों के जवाब अगर रिकॉर्ड में मिल गए तो कॉर्बेट फॉल की ‘कोटेशन मटकी’ से निकलने वाले राज भी ज्यादा देर छिपे नहीं रहेंगे।

हजूर 👉जंगल जासूस की नजर अब इसी पर है👉इस बार ‘कुनबे’ की लॉटरी खुलती है या खुलती है कोटेशन प्रक्रिया की असली पारदर्शिता!

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